सीहोर, मध्य प्रदेश के भैरुंदा ब्लॉक के कोसमी गांव में 11 अक्टूबर की सुबह, 12 आदिवासी परिवारों ने जिन झोपड़ियों में अपने बच्चों के लिए खाना बनाया था, अब वो मलबे में बदल चुकी हैं। दोपहर 2 बजे वन विभाग की टीम ने वन भूमि पर अतिक्रमण बताकर उनके घर तोड़ दिए, खेतों में लगी फसल उजाड़ दी और सिंचाई के कुएं मिट्टी से भर दिए। यहां रहने वाली एक प्रभावित महिला कहती हैं, “हमें अपना सामान भी नहीं लेने दिया, घर से घसीटकर बाहर निकाल दिया।”
यह गांव केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के संसदीय क्षेत्र विदिशा में आता है। देर शाम वो घटना स्थल पर पहुंचे, इस कार्रवाई को अन्यायपूर्ण बताया और पीड़ितों को न्याय का भरोसा दिया।
ग्राउंड रिपोर्ट ने कोसमी गांव पहुंचकर आदिवासी परिवारों की स्थिति को समझा और वन विकास निगम का पक्ष जाना।
क्या है पूरा घटनाक्रम?

सीहोर डिस्ट्रिक्ट फॉरेस्ट ऑफिसर तरुण कुमार के मुताबिक लाड़कुई वन परिक्षेत्र की कोसमी बीट के कक्ष क्रमांक आरएफ 426 में 186.960 हेक्टेयर संरक्षित वन भूमि है।
वो आगे बताते हैं कि वर्ष 2020 में वन विभाग ने यह ज़मीन वन विकास निगम को सौंपी थी। यहां 135 हेक्टेयर के हिस्से में सागौन का प्लांटेशन किया गया था। वन विकास निगम का दावा है कि सिंगपुर के 12 परिवारों ने वर्ष 2022 के बाद प्लांटेशन नष्ट कर 31.48 हेक्टेयर वन भूमि पर कब्ज़ा कर लिया।
हालांकि ग्रामीण कहते हैं कि वो वर्ष 2004 से यहां रह रहे हैं। ग्रामीणों ने हमें वर्ष 2005 की दंड पर्चियां दिखाईं, जो वन विभाग ने उन्हें दी थीं। यहां रहने वाले विमलेश वर्मा ने हमें व्यक्तिगत वनाधिकार के लिए किया गया दावा पत्र भी दिखाया, जो उन्होंने 9 मार्च 2024 को दाखिल किया था।

ग्राउंड रिपोर्ट ने वन विभाग और ग्रामीणों के दावों को जांचने के लिए गूगल अर्थ की हिस्टोरिकल सैटेलाइट इमेजरी का इस्तेमाल किया और पाया कि वर्ष 2022 में ही इस ज़मीन पर कब्ज़ा दिखाई देता है। इसके पहले के वर्षों में, जैसे 2018 में, यहां कोई निर्माण या कब्ज़ा दिखाई नहीं देता।
निगम के अनुसार 17-18 अगस्त 2025 को तीन वन अपराध प्रकरण इन परिवारों के खिलाफ दर्ज किए गए। 3 दिसंबर 2025 को भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 80 (अ) के तहत नोटिस जारी किया गया। इसके बाद 7 सितंबर 2026 को बेदखली का अंतिम आदेश जारी किया गया।

लाड़कुई वन परिक्षेत्र अधिकारी (रेंजर) जया यादव के मुताबिक निगम ने 9 अक्टूबर 2026 को एसडीओ भैरुंदा, तहसीलदार और थाना प्रभारी लाड़कुई को पत्र लिखकर कार्रवाई के लिए बल मांगा और इसके बाद 11 अक्टूबर को अतिक्रमण हटाने का काम किया। वो कहती हैं, “ग्रामीणों द्वारा कब्ज़े के कोई वैध दस्तावेज़ पेश नहीं किए गए थे। इस पूरी कार्रवाई की वीडियोग्राफी की गई है।”

कोसमी गांव में जहां कभी 12 परिवार अपना जीवन यापन कर रहे थे, वहां अब हर तरफ कच्चे घरों का मलबा और गृहस्थी का सामान बिखरा दिखाई देता है। महिलाएं पेड़ के नीचे तिरपाल टांगकर अपने बच्चों को संभाल रही हैं। कई लोग मुख्य सड़क पर स्थित वन विकास निगम के कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे हैं।

धरने पर बैठे गांव के पूर्व सरपंच विक्रम सिंह बारेला कहते हैं, “हमारे साथ जो हुआ वो बेहद अन्यायपूर्ण था। हम अपने खेती के काम में व्यस्त थे, जब वन विभाग ने कार्रवाई की। रेंजर ने छोटी सी बच्ची को बाल पकड़कर घर से बाहर निकाला। जिस कुएं से 11 परिवारों के लोग पानी पीते थे, उसे तोड़ दिया। लाल तुअर की फसल खेतों में लहलहा रही थी, उसे नष्ट कर दिया।”

विक्रम बताते हैं कि वन विभाग ने बिना नोटिस कार्रवाई की है; जो नोटिस आया था, वह पहले का है। वो कई पीढ़ियों से इस जगह पर रह रहे हैं। उन्होंने वनाधिकार पट्टे के लिए दावा किया, लेकिन यह मामला अभी अदालत में लंबित है।
समाचार पत्र पत्रिका ने वन विभाग के हवाले से दावा किया है कि जिन 12 लोगों पर वन विभाग ने कार्रवाई की है, उनमें से 9 लोगों के पहले से सिंगपुर में पक्के मकान बने हैं। इसमें पूर्व सरपंच विक्रम बारेला का भी नाम है।
हमने जब विक्रम से अपना पक्का घर होने पर सवाल किया, तो उन्होंने बताया, “मेरा बड़ा परिवार है। मैंने एक प्लॉट लेकर सिंगपुर में पीएम आवास योजना से मकान बनाया है, क्योंकि यहां कोसमी में पीएम आवास नहीं मिल रहा था। कुछ लोग सिंगपुर में रहते हैं, बाकी परिवार के सदस्य यहीं जीवन यापन करते हैं।”
राजनीतिक घमासान
आदिवासियों के घरों को तोड़ने की जानकारी जब केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान तक पहुंची, तो वो प्रभावितों से मिलने पहुंचे। उन्होंने कहा कि लोगों के वर्षों पुराने घर गिरा दिए गए, फसलें कुचल दी गईं और कुएं तक मिट्टी से पाट दिए गए। यह कार्रवाई शर्मनाक है। ऐसा करने वालों को भगवान भी माफ नहीं करेगा। वो कहते हैं, “मेरे क्षेत्र में जुल्म की इंतहा हुई है, अन्याय की पराकाष्ठा हुई है।”
कोसमी गांव शिवराज सिंह चौहान के संसदीय क्षेत्र विदिशा में आता है। उन्होंने पीड़ित परिवारों के लिए भोजन की व्यवस्था की, न्याय दिलाने के लिए हर संभव प्रयास का आश्वासन दिया और अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ गए।

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस मामले पर कहा, “अगर हमारी पार्टी के वरिष्ठ नेता कुछ कह रहे हैं तो उसे सुनने में कोई बुराई नहीं है। मैंने जांच के आदेश दिए हैं, जांच में सब दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा।”
इधर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा, “मोहन-मामा की आपसी खींचतान में आदिवासी परिवार उजड़ रहे हैं।”
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने भी मामले का संज्ञान लेते हुए मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। आयोग ने मुख्य सचिव, डीजीपी, वन विभाग के प्रमुख सचिव, सीहोर कलेक्टर और एसपी समेत संबंधित अधिकारियों से 3 दिन में जवाब मांगा है।
सवाल घटते वनक्षेत्र का भी

सीहोर जिले के लाड़कुई वनक्षेत्र में पेड़ों की अवैध कटाई की खबरें लगातार अखबारों में छपती रही हैं। अगर सैटेलाइट इमेजरी से इस वन क्षेत्र की हिस्टोरिकल तस्वीरें देखें, तो फॉरेस्ट रेंज में कई जगह खेत नज़र आते हैं, जो पहले के वर्षों में यहां नहीं थे। वन विभाग के आधिकारिक आंकड़ों पर गौर करें तो मध्य प्रदेश में 6,37,629.23 हेक्टेयर वन भूमि पर अतिक्रमण है।
शिवराज सिंह चौहान के गृह जिले सीहोर की बात करें तो यहां 22,494.35 हेक्टेयर और उनके संसदीय क्षेत्र विदिशा में 19,840.39 हेक्टेयर वन भूमि पर कब्ज़ा हो चुका है।
इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2023 के मुताबिक सीहोर जिले में कुल वन क्षेत्र 1,352.57 वर्ग किलोमीटर है। यह वन क्षेत्र सीहोर के कुल क्षेत्रफल का 20.56 प्रतिशत है। 2021 की तुलना में वन क्षेत्र में 4.17 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है।
वहीं सीहोर के बुधनी ब्लॉक की बात करें, जहां से शिवराज पूर्व में विधायक रहे, यहां का कुल वन क्षेत्र 7.46 वर्ग किलोमीटर है। अब यहां कोई घना जंगल नहीं बचा है; मध्यम रूप से घना जंगल 3.07 वर्ग किलोमीटर और खुला जंगल 4.39 वर्ग किलोमीटर है।

ये आंकड़े सवाल खड़े करते हैं कि क्या शिवराज अपने संसदीय क्षेत्र और विधानसभा क्षेत्र में वनों के संरक्षण में असफल रहे हैं? इसके साथ ही वो क्यों इन आदिवासियों को वनाधिकार नहीं दिला पाए? क्योंकि अगर आज कोसमी के आदिवासियों के पास वनाधिकार पट्टे होते तो उन्हें इस तरह हटाया नहीं जा सकता था और उन्हें अपने अधिकारों के लिए शिवराज सिंह चौहान या मोहन यादव के दखल की ज़रूरत नहीं होती।
फिलहाल कोसमी के आदिवासी परिवार न्याय के लिए धरने पर बैठे हैं। उन्होंने अपने वनाधिकार की मांग की है, मांग पूरी न होने पर 25 हज़ार लोगों के साथ भोपाल जाने की बात कही है। मोहन यादव सरकार ने जांच के आदेश दिए हैं। गांव की प्रभावित महिलाएं कहती हैं कि उनका घर और खेती सब कुछ उजाड़ दी गई। उन्हें नहीं पता कि आगे क्या होगा।
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