नेपाल में बाढ़ से तबाही, दिल्ली में बारिश का रेड अलर्ट, मुंबई में तापमान का रिकॉर्ड, बालाघाट में जंगली भैंसे छोड़े गए। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
नेपाल के गोरखा जिले में रविवार सुबह बुढी गंडकी नदी में अचानक आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। बाढ़ में करीब 40 घर और छह पुल बह गए, जबकि जलविद्युत ढांचे को भी नुकसान पहुंचा। अधिकारियों के मुताबिक, करीब 10 लोग लापता हैं और 150 से अधिक विदेशी पर्यटक प्रभावित क्षेत्र में फंसे हुए हैं।
12 अक्टूबर की सुबह दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम में तेज बारिश और गरज-चमक के कारण कई इलाकों में जलभराव हुआ। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने दिल्ली के लिए रेड अलर्ट जारी करते हुए 15 मिमी प्रति घंटे से अधिक बारिश और 62–87 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने की चेतावनी दी।
मुंबई के सांताक्रूज में अधिकतम तापमान 38 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। यह पिछले 11 वर्षों में अक्टूबर का दूसरा सबसे अधिक तापमान है। यह तापमान सामान्य से 4.9 डिग्री सेल्सियस अधिक था।
जम्मू-कश्मीर में नए कानून के तहत कृषि भूमि और बागों का व्यावसायिक इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई है। इससे बागों और खेतों की जमीन पर ऊंची इमारतों तथा अन्य व्यावसायिक निर्माण का रास्ता खुल सकता है। विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि इससे फल उत्पादन वाली जमीन घट सकती है, स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है और क्षेत्र के पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ सकता है।
काजीरंगा से लाए गए 8 जंगली भैंसों को बालाघाट जिले के जंगलों में छोड़ा गया। इन्हें 5 महीने के क्वारंटीन के बाद अब 17 हेक्टेयर के बड़े बाड़े में रखा गया है। कान्हा नेशनल पार्क में अगले 3 वर्षों में 50 जंगली भैंसें बसाने का लक्ष्य है।
शाजापुर जिले के बड़ी पोलाय में 176 काले हिरणों का सुरक्षित रेस्क्यू किया गया। इसके लिए केवल 2 से 5 फीट ऊपर हेलीकॉप्टर उड़ाकर अफ्रीकी बोमा तकनीक का उपयोग हुआ। रेस्क्यू किए गए सभी हिरणों को कूनो नेशनल पार्क भेजा गया है।
विस्तृत चर्चा
नेपाल में भूस्खलन के बाद बूढ़ी गंडक नदी का जलस्तर अचानक बढ़ने से बिहार में बाढ़ की चिंता बढ़ गई है। विस्तार से बताएंगे पल्लव जैन।
नेपाल में भूस्खलन के बाद बाढ़
11 अक्टूबर की सुबह नेपाल के गोरखा जिले में बूढ़ी गंडकी नदी के तटीय इलाकों में पानी, कीचड़, बड़े पत्थरों और मलबे का अचानक तीव्र बहाव आया, जिससे स्थानीय बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, सरी बास के ऊपरी हिस्से में हुए भूस्खलन ने चुमके खोला धारा के रास्ते को अवरुद्ध कर दिया था। अधिकारियों को अंदेशा है कि चेकम पार्क के निकट बनी अस्थायी प्राकृतिक रुकावट टूटने की वजह से यह भारी सैलाब अचानक नीचे की ओर बह निकला। इस घटना के बाद भारत के बिहार राज्य में भी सतर्कता बरतते हुए चेतावनी जारी की गई, क्योंकि वहाँ से जुड़ी कई नदियों का जलस्तर बढ़ने की संभावना थी।
नुकसान और प्रभाव
बाढ़ के तीव्र बहाव के कारण घाटी में व्यापक क्षति दर्ज की गई:
बुनियादी ढांचे का नुकसान: लगभग 40 घरों को क्षति पहुंची, साथ ही छह पुल और एक हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट क्षतिग्रस्त हुए।
प्रभावित लोग: 10 लोग लापता बताए गए और 150 से अधिक विदेशी पर्यटक इस क्षेत्र में फंस गए।
जनहानि: गनीमत रही कि इस भीषण आपदा में किसी की भी जान जाने (मृत्यु) की सूचना नहीं मिली।
पूर्व चेतावनी प्रणाली का असर
स्थानीय नागरिकों को सुबह लगभग 6:00 बजे दो बार स्वचालित एसएमएस (SMS) अलर्ट प्राप्त हुए। इन चेतावनियों के कारण लोगों को समय रहते सुरक्षित और ऊंचे स्थानों पर जाने का मौका मिल गया।
भौतिक नुकसान के बावजूद, अर्ली वार्निंग सिस्टम ने जीवन बचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और हिमालयी क्षेत्रों में इस प्रणाली को और अधिक सुदृढ़ व विस्तृत करने की आवश्यकता है।
भूवैज्ञानिक और जलवायु संबंधी कारक
इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित विशेषज्ञों की राय और उत्तराखंड ओपन यूनिवर्सिटी के ‘स्कूल ऑफ अर्थ एंड एनवायरमेंटल साइंसेज’ के डायरेक्टर पी.डी. पंत के विश्लेषण के आधार पर कई महत्वपूर्ण तकनीकी बिंदु साझा किए गए:
ग्लेशियर और तलछट (Sediments): ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों की हलचल और कटाव से भारी मात्रा में ढीली चट्टानें और मिट्टी जमा हो जाती हैं।
ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव: बढ़ते तापमान के कारण बर्फ पिघलने की गति तेज हो रही है, जिससे चट्टानों और बर्फ के बीच की यांत्रिक पकड़ कमजोर हो जाती है।
गाढ़े घोल (Slurry) का निर्माण: बारिश या पानी के अचानक बहाव से ऊपरी ढलानों का ढीला मलबा नीचे खिसकता है। घाटी में नीचे उतरते समय यह बहाव और अधिक सेडिमेंट्स, विशाल पत्थरों व पेड़-पौधों को समेटकर एक गाढ़े घोल (स्लरी) में तब्दील हो जाता है, जिससे इसका विनाशकारी प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। गोरखा बाढ़ के दृश्यों में भी भारी मात्रा में सेडिमेंट्स का बहाव स्पष्ट देखा गया।
क्षेत्रीय संवेदनशीलता और सबक
गोरखा की यह आपदा भोटे कोशी नदी की भयानक बाढ़ के महज 45 दिन बाद घटित हुई, जिसमें 1,450 लोगों की मौत हुई थी। चर्चा के अनुसार, यद्यपि गोरखा घटना के सटीक स्थानीय कारणों की पूरी पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन बार-बार होने वाली ऐसी घटनाएं पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी हैं। पिघलते ग्लेशियर, ढीली मिट्टी, मौसम की मार और कमजोर ढलानों का यह संयोजन व्यापक पर्यावरणीय निगरानी और बेहतर आपदा तैयारियों की तत्काल मांग करता है।
ग्राउंड रिपोर्ट की बात
पर्यावरण सिर्फ खबर नहीं, यह हमारी सांसों का सवाल है। ग्राउंड रिपोर्ट की कोशिश है कि इन मुद्दों को ज़मीनी स्तर पर उठाया जाए और चुनावी एजेंडे का हिस्सा बनाया जाए। अगर आप पर्यावरण पत्रकारिता को ज़रूरी मानते हैं, तो इस एपिसोड को शेयर करें और हमें अपना फीडबैक भेजें।
ग्राउंड रिपोर्ट का डेली इंवायरमेंट न्यूज़ पॉडकास्ट ‘पर्यावरण आज’ Spotify, Amazon Music, Jio Saavn, Apple Podcast, पर फॉलो कीजिए।
Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India
We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.
Connect With Us
Send your feedback at greport2018@gmail.com
Newsletter
Subscribe our weekly free newsletter on Substack to get tailored content directly to your inbox.
When you pay, you ensure that we are able to produce on-ground underreported environmental stories and keep them free-to-read for those who can’t pay. In exchange, you get exclusive benefits.
Your support amplifies voices too often overlooked, thank you for being part of the movement.



