वेस्टर्न घाट्स के इको-सेंसिटिव एरिया को सीमित करने का अनुरोध, यूपी के 32 जिलों में बाढ़ का खतरा, केदारनाथ में इस बार दोगुने से भी ज्यादा, बांधवगढ़ में एंथ्रेक्स संक्रमण का खतरा। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
केरल सरकार ने केंद्र से पश्चिमी घाट के इको-सेंसिटिव एरिया (ESA) को केवल 8,590.69 वर्ग किमी तक सीमित करने का अनुरोध किया है। राज्य ने आवासीय क्षेत्रों, कृषि भूमि और बागानों (plantations) को अंतिम अधिसूचना से बाहर रखने की सिफारिश की है।
यूपी के 50 शहरों में लगातार 24 घंटे से मूसलाधार बारिश जारी है, जिससे राज्य के 32 जिलों में बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। राजधानी लखनऊ सबसे ज्यादा प्रभावित रही, जहाँ जानकीपुरम एक्सटेंशन और कुर्सी रोड पर भारी जलभराव हुआ। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने 25, 26 और 27 सितंबर तक भारी बारिश जारी रहने की चेतावनी देते हुए गैर-जरूरी यात्रा न करने की सलाह दी है।
अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच केदारनाथ धाम में 50.30 मीट्रिक टन कचरा उत्पन्न हुआ। यह मात्रा वर्ष 2025 के पूरे यात्रा सीजन के कुल संग्रह से 2.5 गुना से भी अधिक है। इस वर्ष कुल 20 मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा निकला, जिसमें से 18.5 मीट्रिक टन (92.5%) का प्रसंस्करण हो चुका है और 1.5 टन शेष है।
BMC Plant Biology (2026) में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, गुजरात में प्राकृतिक खेती से हल्दी की पैदावार पारंपरिक रासायनिक खेती की तुलना में लगभग दोगुनी दर्ज की गई। प्राकृतिक खेती से प्रति हेक्टेयर 40 टन से अधिक ताजा हल्दी मिली, जबकि पारंपरिक रासायनिक खेती में यह केवल 19.3 टन प्रति हेक्टेयर थी। प्राकृतिक खेती से किसानों को प्रति हेक्टेयर ₹10.5 लाख से अधिक का शुद्ध लाभ हुआ।
मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के ताला हाथी कैंप में 4 महीने पहले मृत हथिनी में एंथ्रेक्स संक्रमण की पुष्टि हुई है; राज्य के किसी नेशनल पार्क या सेंचुरी में यह पहला मामला है। एंथ्रेक्स स्पोर्स के फैलाव को रोकने के लिए ताला कैंप के 2,500 वर्ग मीटर (50×50 मीटर) क्षेत्र को 3 साल के लिए चेनलिंक फेंसिंग से सील कर दिया गया है।
भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर और उज्जैन में बिजली के तारों के जाल को हटाकर अंडरग्राउंड नेटवर्क बिछाया जाएगा। केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के निर्देश पर 90 दिनों में विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) तैयार होगी। इससे आंधी-बारिश में फॉल्ट घटेंगे।
विस्तृत चर्चा
रिपोर्टर की डायरी: कश्मीर में फसल कटाई के मौसम में भालू के हमले
कश्मीर में रहते हुए, अगस्त और सितंबर का महीना आते ही फसल कटाई (ऑटम) के मौसम की शुरुआत हो जाती है। मेरे गृह जिले गांदरबल में इस समय के दौरान मानव और वन्यजीवों के आमने-सामने आने और संघर्ष की घटनाओं में चिंताजनक वृद्धि देखी जाती है। जब स्थानीय धान के खेतों और सेब के बागों के आसपास भालुओं के देखे जाने की खबरें आने लगीं, तो मैंने यह जांचने और रिपोर्ट करने का फैसला किया कि ये घटनाएं इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही हैं।
ज़मीनी हकीकत — मोहम्मद मकबूल भट्ट का मामला
अपनी जांच के दौरान, मुझे इन आंकड़ों के पीछे का एक मानवीय चेहरा मिला: मोहम्मद मकबूल भट्ट, जिन पर हाल ही में एक एशियाई काले भालू (Asiatic Black Bear) ने हमला कर दिया था। घटना की विस्तृत जानकारी लेने के लिए मैंने उनके बेटे से संपर्क किया। उन्होंने बताया कि हालांकि हमले के दौरान भट्ट के हाथों में गंभीर चोटें आईं, लेकिन खुशकिस्मती से उनका चेहरा बच गया। कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों से मिली जानकारियों से यह पुष्टि हुई कि यह घटना एक व्यापक, मौसमी पैटर्न का हिस्सा थी।
मुख्य कारण का खुलासा — विशेषज्ञों की राय
इन घटनाओं के अचानक बढ़ने के कारणों को समझने के लिए, मैंने वन्यजीव अधिकारियों और शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (SKUAST) के वन्यजीव विभाग के प्रोफेसर डॉ. खुरशीद अहमद से परामर्श किया। डॉ. खुरशीद ने बताया कि अगस्त से नवंबर के अंत तक फसल कटाई के पीक सीजन के दौरान भालुओं की गतिविधियां काफी बढ़ जाती हैं। इन महीनों में किसान धान और मक्के जैसी फसलों के काम में लगातार लगे रहते हैं। उसी समय, सेब के बागों में गिरे हुए सेब और फसल का कचरा भोजन की तलाश में भटकते भालुओं को आकर्षित करता है। भोजन की प्रचुरता के कारण भालू कृषि क्षेत्रों के आसपास ही टिके रहते हैं, जिससे किसानों के साथ उनका सामना हो जाता है जो हिंसक हमलों में बदल जाता है।
इन घटनाओं को रोकने के लिए सक्रिय कदमों की आवश्यकता है। वन्यजीव विभाग ने बाग मालिकों को सलाह दी है कि वे बचे हुए सेबों और फलों के कचरे को खुले खेतों में छोड़ने के बजाय सही तरीके से डंप और निस्तारित (डिस्पोज) करें।
क्षेत्रीय आंकड़े इस कदम की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं: जम्मू और कश्मीर में 2023 से 2025 के बीच 15,661 मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामले दर्ज किए गए, जिनमें 22 लोगों की मौत हुई और लगभग 350 लोग घायल हुए। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि कश्मीर में फसल कटाई के समय मानव-भालू का संघर्ष कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक सुरक्षा और संरक्षण से जुड़ी एक बड़ी चुनौती है।
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