खरगोन। मिर्च में पिछले वर्ष अच्छा लाभ कमा चुके उबदी के किसान कमलेश पाटीदार इस बार निराश दिखाई दिए। पाटीदार ने 25 मई को तीन एकड़ में मिर्च लगाई थी। एक पखवाड़े पहले पहली तुड़ाई की तब 15 क्विंटल उत्पादन हुआ। उस वक्त 18 रुपए प्रति किलो भाव मिला। इसके बाद मिर्च के पौधों में कीटों का प्रकोप बढ़ने लगा। देखते ही देखते दो एकड़ में लगे मिर्च के पौधे सिकुड़ने लगे। असर यह हुआ कि मिर्च का उत्पादन रूक गया। एक एकड़ में मिर्च के पौधे अभी ठीक है। इससे लाल मिर्च का उत्पादन होने की उम्मीद है। लेकिन इन पौधों को लेकर भी कमलेश चिंतित थे।
उन्होंने कहा कि दो एकड़ में 70 हजार रुपए लागत लगी थी। पौधे सिकुड़ने से उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। उनकी शिकायत है कि मिर्च में कीटों के प्रकोप और पौधे सिकुड़ने के बावजूद अब तक उद्यानिकी विभाग के अधिकारी मौके पर निरीक्षण करने नहीं पहुंचे। उन्होंने आक्रोश जताया कि उद्यानिकी विभाग सिर्फ सब्सिडी वाली योजनाओं पर ध्यान दे रहा है। जबकि मिर्च की फसल बर्बाद होने के बावजूद इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
लिक्खी के किसान अलकेश रमेश की दो एकड़ की मिर्च की फसल के पत्ते सिकुड़ने लगे और पूरी फसल तबाह हो गई। इसके पहले एक बार की तुड़ाई में 8 क्विंटल हरी मिर्च का उत्पादन मिला था।

वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट में शामिल मिर्च की फसल इस बार किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हुई। भले ही मिर्च को जीआई टैग मिल गया हो, परंतु भाव कम मिलने से किसान परेशान है। कीटों के प्रकोप से कई खेतों में पौधे सिकुड़ गए।
हालात यहां तक बने कि भाव कम मिलने पर टांडा बरुड़ में किसान ने मिर्च के पौधे उखाड़ दिए। देवली गांव में किसान ने अपनी मिर्च की फसल पर रोटावेटर चला दिया। वहीं रोमचिचली में एक किसान ने तुड़ाई के बाद मिर्च को व्यपारी को देने की बजाए खेत में ही खाद के लिए मिट्टी में मिला दिया।
जिले के बेड़िया में एशिया की दूसरी सबसे बड़ी माने जाने वाली मिर्च मंडी है। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष लाल मिर्च का अच्छा भाव मिलने की वजह से इस बार किसानों का रूझान बढ़ा है। यही वजह है कि इस बार जिले में 42 हजार हेक्टेयर मिर्च की खेती हो रही है। करीब 50 हजार किसान मिर्च की खेती कर रहे हैं।
हरी मिर्च के भाव कम मिलने के बाद अब किसानों को लाल मिर्च का अच्छा भाव मिलने की उम्मीद है।
मिर्च पर चला दिया रोटावेटर
टांडा बरुड़ के मोहन कुमरावत ने डेढ़ एकड़ में मिर्च लगाई थी। पहली तुड़ाई में 17 क्विंटल मिर्च हुई और 25 रुपए प्रति किलो का भाव मिला। उम्मीद बंधी, लेकिन अगली बार 25 क्विंटल अच्छी मिर्च होने पर भी कोई व्यापारी खरीदने नहीं आया। मोहन इंदौर मंडी ले गए, वहां सिर्फ 13 रुपए किलो भाव मिला। ढुलाई, हम्माली और अन्य खर्च जोड़ने पर वे बराबरी पर रहे। नुकसान के डर से उन्होंने मिर्च के पौधे उखाड़ फेंके और जमीन पर टमाटर लगा दिए। सवा लाख रुपए की लागत में उन्हें 70 हजार रुपए का घाटा हुआ।
पड़ोस के किसान प्रदीप कुमरावत ने भी निराश होकर मिर्च से लदी फसल पर रोटावेटर चला दिया। दो बार तुड़ाई पर सिर्फ 10-15 रुपए किलो भाव मिला। तीसरी बार जब भाव 8-10 रुपए रह गया, तो तुड़ाई की मजदूरी तक नहीं निकल पाती। इसलिए उन्होंने पूरी फसल नष्ट कर दी।

पौधे सूखने के बाद नर्सरी पहुंचकर शिकायत
पौधों में बीमारी और अफलन की शिकायत करते हुए दुर्गापुर के किसान मांगरुल स्थित अद्वैत नर्सरी अपनी शिकायत करने पहुंच गए। किसानों का आरोप है कि उन्होंने नर्सरी से पौधे खरीदकर लगभग 40 एकड़ में रोपाई की थी। अब कई खेतों में पौधे अपेक्षित तरीके से विकसित नहीं हो रहे हैं। कई पौधे सूखने लगे हैं। इससे उन्हें हजारों रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
गणपति यादव ने तीन एकड़ में 55 हज़ार रूपए खर्च कर पौधे लगाए थे। उन्होंने खराब पौधे नर्सरी संचालक को भी दिखाए। इसके बाद मामले की जानकारी उद्यानिकी विभाग को दी गई। विभागीय अधिकारी भी नर्सरी पहुंचे और किसानों की शिकायत की जानकारी ली।
किसानों के मुताबिक रोपाई के करीब 50 दिन बाद से ही पौधों में बदलाव दिखाई देने लगा था। शुरुआत में इसे मौसम या सामान्य बीमारी मानकर दवाइयों का छिड़काव किया गया, लेकिन समस्या लगातार बढ़ती गई। अब कई पौधों में फल नहीं आने से किसानों को अपनी पूरी लागत डूबने की आशंका है।
किसानों ने विभाग से मांग की है कि खेतों का वैज्ञानिक परीक्षण कराया जाए। यदि जांच में पौधों की गुणवत्ता या नर्सरी से संबंधित कोई खामी सामने आती है तो उन्हें हुए नुकसान का मुआवजा दिलाया जाए।
मौके पर पहुंचे खरगोन उद्यानिकी विभाग उपसंचालक केके गिरवाल ने कहा कि शिकायत के आधार पर जांच टीम गठित कर खेतों का निरीक्षण कराया जाएगा। टीम फसल की स्थिति देखने के साथ बीमारी के लक्षणों का परीक्षण करेगी। इसके बाद रिपोर्ट तैयार की जाएगी। जांच रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की कार्रवाई तय होगी।
वायरस या वील्ट इसका भी अब तक पता नहीं
मिर्च के पौधों में दिखाई दे रहे लक्षणों को किसान वायरस से जोड़ रहे हैं। हालांकि बीमारी का वास्तविक कारण अभी आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आया है।
नर्सरी संचालक प्रभु कुशवाह का कहना है कि दुर्गापुर के किसानों ने उनकी नर्सरी से पौधे खरीदे थे। वर्तमान में मिर्च की फसल में वायरस की शिकायतें सामने आ रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वील्ट रोग की स्थिति में पौधे पीले पड़ने और रोगग्रस्त होने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। उनके मुताबिक नर्सरी से दूसरे किसानों को भी पौधे बेचे गए हैं, लेकिन फिलहाल शिकायत दुर्गापुर के किसानों की ओर से मिली है। मामले की जानकारी संबंधित कंपनी को दी जाएगी।
हालांकि वो यह भी कहते हैं कि उनके खुद के खेत में बीच-बीच में कुछ पौधे सूख रहे हैं। उन्होंने कहा कि कृषि वैज्ञानिकों के निरीक्षण के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पौधों में बीमारी का कारण वायरस है, वील्ट है, वैरायटी से संबंधित समस्या है या खेत की अन्य परिस्थितियां इसके लिए जिम्मेदार है।

काली थ्रिप्स के प्रकोप की आशंका
जिले भर से आ रही शिकायतों पर आशंका जताते हुए कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ आरके सिंह ने कहा कि मिर्च में काली थ्रिप्स (Thrips parvispinus) का प्रकोप दिखाई दे रहा है।
यह हानिकारक कीट फूलों के अंदर और पत्तियों के नीचे छिपा रहता है, जिससे इसमें दवाओं के खिलाफ बहुत जल्दी प्रतिरोधक क्षमता (Resistance) पैदा हो जाती है।
उन्होंने कहा कि काली थ्रिप्स को रासायनिक, जैविक और भौतिक तरीकों से पूरी तरह नियंत्रित कर सकते हैं। दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता को रोकने के लिए, हर बार एक ही दवा डालनें के बजाय बदल-बदल कर छिड़काव करना उचित होगा।
खरगोन के अलग-अलग हिस्से से आ रही नुकसान की ख़बरें चिंताजनक हैं। जिले में अनुमानित 45 हजार हेक्टेयर पर मिर्च की खेती होती है और इसका उत्पादन 1 लाख 57 हजार 500 मीट्रिक टन है। यानि यह स्थानीय किसानों के लिए मुख्य फसल है। ज़रूरी है कि कृषि विभाग इन समस्याओं का जल्द समाधान करे।
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