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गर्मी से महिलाओं की बढ़ती मृत्यु दर, क्या यह बायोलॉजिकल है या फिर सोशल?

आंकड़े बताते हैं कि गर्मी के चलते मरने वाले लोगों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज़्यादा है। क्या महिलाओं का शरीर ज़्यादा जोखिम में होता है?
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दोपहर की गर्मी में सड़क किनारे एक बच्चे के साथ बैठी एक महिला अपनी साड़ी से अपना चेहरा ढक रही है। | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

भारत में मौत से जुड़े 30 साल के आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार- 2005 के बाद से गर्मी के कारण महिलाओं की मौतों में बढ़ोतरी हुई है, जबकि पुरुषों की मृत्यु दर में गिरावट दर्ज की गई।

रॉयल स्टैटिस्टिकल सोसाइटी द्वारा 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन की सह-लेखक रॉनिता बर्धन ने ग्राउंड रिपोर्ट को ईमेल पर बताया, “यह अध्ययन इस बात का प्रमाण है कि अत्यधिक तापमान का स्वास्थ्य पर पड़ने वाला बोझ लैंगिक (जेंडर) आधार पर अलग-अलग हो सकता है। हालांकि, यह संबंध सामाजिक, पर्यावरणीय और जोखिम से प्रभावित होता है।” 

बर्धन कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में सस्टेनेबल बिल्ट एनवायरनमेंट एंड हेल्थ की प्रोफेसर हैं।

4 अगस्त को, भारत सरकार ने हीटवेव और बिजली गिरने को प्राकृतिक आपदा के तौर पर नोटिफाई किया। इससे डिज़ास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटीज़ को इनकी रोकथाम, इसे कम करने और आपदा पर कार्रवाई करने के लिए रिसोर्स और फंड देने की इजाज़त मिल गई। इस कदम से राज्यों में आंकड़ों को स्टैंडर्ड बनाने में भी मदद मिल सकती है, जिससे इन खतरों के स्तर का अंदाज़ा लगाना और इनको केंद्र में रखकर नीति बनाना आसान हो जाएगा।

लेकिन अत्यधिक गर्मी का यह बोझ अब भी असंतुलित बना हुआ है।

कई अध्ययन इस बुनियादी तथ्य पर सहमत हैं कि भारत में अत्यधिक गर्मी के कारण पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाओं की जान जा रही है। हालांकि, शोधकर्ताओं के बीच इस बात को लेकर मतभेद हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है।

Two women cover their heads and faces with scarves as they walk past a shop during peak heat hours.
मप्र के बुंदेलखंड में दो महिलाएं तेज गर्मी के समय अपने सिर और चेहरे को स्कार्फ से ढक रही हैं। | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

कौन ज़्यादा जोखिम में है?

ग्राउंड रिपोर्ट ने वैज्ञानिकों से यही सवाल पूछा: यदि एक स्वस्थ पुरुष और एक स्वस्थ महिला जिनके रहन-सहन, काम और संसाधनों तक पहुंच में कोई अंतर न हो, को समान गर्मी में रखा जाए तो क्या महिलाओं के शरीर पर गर्मी का असर ज्यादा होगा?

14 वर्षों तक यूएस आर्मी रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ एनवायरनमेंटल मेडिसिन के साथ काम कर चुकीं पर्यावरणीय फिजियोलॉजी शोधकर्ता निशा चारकोउडियन कहती हैं, “संक्षेप में इसका उत्तर है—नहीं। यदि अन्य सभी स्थितियां समान हों, तो विशुद्ध शारीरिक (फिजियोलॉजिकल) स्तर पर एक महिला का शरीर पुरुष की तुलना में अधिक संघर्ष नहीं करता।”

निशा चारकोउडियन ने 2024 में गैब्रिएल गिएर्श के साथ महिलाओं में हीट रेगुलेशन पर ‘एक्सपेरिमेंटल फिजियोलॉजी’ में एक रिव्यू पेपर प्रकाशित किया। उनका निष्कर्ष था कि किसी एक लिंग को गर्मी के मामले में ‘फायदे’ या ‘नुकसान’ के रूप में लेबल करना विज्ञान का अत्यधिक सरलीकरण (oversimplification) है।

इस समीक्षा में लगभग 4,500 सैनिकों पर किए गए 10 साल के अध्ययन का हवाला दिया गया, जिसमें पाया गया कि पुरुषों और महिलाओं में गंभीर हीट इलनेस की दर लगभग बराबर थी।

चारकोउडियन के अपने 2024 के अध्ययन (जिसमें शारीरिक गतिविधि और पर्यावरण को नियंत्रित रखा गया था) में पाया गया कि युवाओं में एग्जर्शनल हीट स्ट्रोक के जोखिम का मुख्य कारक बॉडी मास इंडेक्स (BMI) था, लिंग नहीं।

प्रोफेसर बर्धन का कहना है कि मौजूदा शारीरिक अध्ययन यह नहीं दिखाते कि “महिलाएं सार्वभौमिक रूप से पुरुषों की तुलना में कम गर्मी सहन कर पाती हैं।” लेकिन, उनका मानना है कि शारीरिक सवाल से कहीं अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि “क्या अध्ययन की गई आबादी उन लोगों का वास्तविक प्रतिनिधित्व करती है जो वैश्विक स्तर पर गर्मी का सबसे बड़ा बोझ झेल रहे हैं?”

खून की कमी (एनीमिया), गर्भावस्था, कुपोषण, पुरानी या बार-बार होने वाली बीमारियां और लगातार बना रहने वाला पर्यावरणीय तनाव ऐसी स्थितियां हैं जो गर्मी के प्रति संवेदनशीलता को बदल देती हैं। ये स्थितियां ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) की गर्मी से प्रभावित आबादी में विशेष रूप से आम हैं।

बर्धन आगे बताती हैं, “हमारा हालिया शोध यह भी दिखाता है कि शारीरिक हीट स्ट्रेस और गर्मी का एहसास हमेशा एक जैसे नहीं होते। उमस भरे माहौल में, विशेष रूप से रात के समय, लोग बिना असहज महसूस किए भी गंभीर शारीरिक तनाव का शिकार हो सकते हैं। जब हम शरीर विज्ञान को उन वास्तविक घरों और मोहल्लों में देखते हैं जहां गर्मी का जोखिम बार-बार होता है और शरीर को संभलने का मौका नहीं मिलता, तब यह सवाल केवल स्वस्थ पुरुषों और महिलाओं की तुलना करने से कहीं अधिक जटिल हो जाता है।”

A woman pulls a scarf over her face to block the sun as she walks through a market area.
मप्र के बुंदेलखंड में एक महिला बाज़ार से गुज़रते हुए धूप से बचने के लिए अपने चेहरे पर स्कार्फ़ ओढ़े हुए है। | फ़ोटो चंद्र प्रताप तिवारी

भाषा और वैज्ञानिक संदर्भ का फर्क

‘हीट एक्शन डे’ पर एडीबी जेंडर इक्वेलिटी ने एक पोस्ट साझा की, जिसमें दावा किया गया कि बर्धन के शोध से पता चलता है कि महिलाओं को पुरुषों की तुलना में 15 प्रतिशत कम पसीना आता है, जिससे समान परिस्थितियों में उनका शरीर अधिक गर्मी रोक कर रखता है।

इस पर चारकोउडियन ने सीधे प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि पुरुष की तुलना में महिलाओं का शरीर गर्मी से “शारीरिक रूप से अधिक तनावग्रस्त” नहीं होता। उन्होंने इस दावे को गलत बताते हुए चेतावनी दी कि ऐसे बयानों से महिलाओं के करियर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

कमेंट सेक्शन में,बर्धन ने भी सहमति व्यक्त की के पसीने की दर और गर्मी सहनशीलता के बीच का संबंध सोशल मीडिया पोस्ट की तुलना में कहीं अधिक जटिल है।

बर्धन ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य थर्मोरेगुलेशन में लिंग-आधारित अंतरों (जैसे कुछ जातीय समूहों और जलवायु में पसीने की कम दर) को रेखांकित करना था, ताकि हीट-एडेप्टेशन नीतियां ‘वन-साइज़-फिट्स-ऑल’ के बजाय महिलाओं की शारीरिक जरूरतों के अनुरूप बनाई जा सकें, न कि यह साबित करना कि महिलाओं का शरीर गर्मी झेलने में कमजोर है।

ग्राउंड रिपोर्ट से बातचीत में प्रोफेसर बर्धन ने अपने तर्क को आंतरिक जैविक कमजोरी के बजाय पर्यावरण और संचयी जोखिम (cumulative exposure) के इर्द-गिर्द केंद्रित रखा। उन्होंने कहा: “मेरा तर्क यह नहीं है कि महिलाएं स्वाभाविक रूप से अधिक नाजुक हैं, बल्कि यह है कि शरीर की गर्मी पर प्रतिक्रिया समय के साथ उस परिवेश से तय होती है जिसमें वह रहता है।”

क्या कम पसीना आना नुकसानदेह है?

गर्मी और महिलाओं पर केंद्रित एक हालिया बीबीसी रिपोर्ट में 2025 के एक अध्ययन का हवाला दिया गया। इसमें कहा गया कि महिलाओं को कम पसीना आता है, पसीना अधिक तापमान पर निकलना शुरू होता है, और उनके शरीर का आंतरिक तापमान व बॉडी फैट प्रतिशत पुरुषों की तुलना में अधिक होता है।

इस पर चारकोउडियन का कहना है कि हर व्यक्ति गर्मी पर अलग तरह से प्रतिक्रिया देता है चाहे वह किसी भी लिंग का हो। कुछ को ज्यादा पसीना आता है, कुछ को कम। यही कारण है कि नियंत्रित अध्ययन महत्वपूर्ण होते हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि 2025 का वह पेपर एक मेटा-एनालिसिस था, जिसमें मौजूदा साहित्य की समीक्षा की गई थी। 

“उस मेटा-एनालिसिस का संबंध गर्मी और ठंड पर महिलाओं की व्यक्तिगत अनुभूतियों से है, उसमें महिलाओं में हीट इलनेस के जोखिम को लेकर कोई नया डेटा नहीं है।”

Two schoolgirls cover their heads with scarves and wait with their backpacks in a patch of shade.
दो स्कूली छात्राएं अपने सिर को स्कार्फ से ढककर और अपने बैग के साथ छाया में इंतजार कर रही हैं। | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

चारकोउडियन के अनुसार, अधिक पसीना आना हमेशा फायदेमंद नहीं होता। जब ज़्यादा नमी या भारी कपड़ों की वजह से पसीना भाप बनकर उड़ नहीं पाता, तो यह शरीर को ठंडा करने में ज़्यादा मदद नहीं करता और इसके बजाय स्किन से बह जाता है। ज़्यादा पसीना आने से डिहाइड्रेशन और बढ़ सकता है, जिससे शरीर के लिए अपना तापमान नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है और गर्मी से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

हालांकि, उम्र बढ़ने के साथ स्थिति बदलती है। बुजुर्गों में शरीर से गर्मी बाहर निकालने की क्षमता कम हो जाती है। रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) के बाद की महिलाओं को हमउम्र पुरुषों की तुलना में अधिक जोखिम हो सकता है, यद्यपि इस पर प्रमाण अभी सीमित हैं।

सबसे बड़ा बोझ और जमीनी हकीकत

‘प्रिवेंटिव मेडिसिन: रिसर्च एंड रिव्यूज’ (2024) में भारत में हीट स्ट्रेस पर 17 अध्ययनों की समीक्षा में पाया गया कि सबसे अधिक जोखिम बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, अत्यधिक शारीरिक श्रम करने वाले कामगारों और नवजात शिशुओं पर है।

बर्धन कहती हैं, “दिन में गर्मी झेलने के बाद यदि किसी व्यक्ति को रात में ठंडे और हवादार घर में आराम करने का अवसर मिलता है, तो उसका जोखिम उस व्यक्ति की तुलना में बहुत अलग होता है जो दिन-रात लगातार गर्मी के संपर्क में रहता है।”

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, 2013 से 2022 के बीच भारत में लू और अत्यधिक गर्मी से होने वाली मौतों में 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

संसद में सरकार द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, राष्ट्रीय हीट-रिलेटेड इलनेस एंड डेथ सर्विलांस सिस्टम की 51,000 से अधिक रिपोर्टिंग यूनिट्स से 1 मार्च 2026 से अब तक हीटस्ट्रोक के 4,853 मामले दर्ज किए गए। इस दौरान हीटस्ट्रोक से 20 मौतों की पुष्टि हुई, जिनमें सबसे अधिक 11 मौतें महाराष्ट्र में हुईं।

विश्व स्वस्थ संगठन (WHO) की पूर्व चीफ़ साइंटिस्ट डॉ. सौम्या स्वामीनाथन के नेतृत्व में एम एस स्वामीनाथन रिसर्च फ़ाउंडेशन ने 2025 में एक स्टडी की। इसमें 7 राज्यों की 3300 से ज़्यादा महिलाओं का सर्वे किया गया। इसमें पाया गया कि 70 प्रतिशत महिलाओं ने गर्मी के पीक महीनों में गर्मी से जुड़े शारीरिक लक्षण बताए, और 97 प्रतिशत के पास बहुत ज़्यादा गर्मी से निपटने के लिए कोई इंस्टीट्यूशनल सपोर्ट नहीं था।

The sun sets over a lake, its light reflecting on the still water.
सूरज एक झील के ऊपर डूब रहा है, उसकी रोशनी शांत पानी पर पड़ रही है। | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

वर्तमान में भारत के 23 राज्यों के 250 शहरों और जिलों में ‘हीट एक्शन प्लान’ (HAPs) लागू हैं। लेकिन बर्धन के अनुसार, “अधिकांश नीतियां रोजमर्रा के परिवेश में थर्मल रेजिलिएंस तैयार करने के बजाय केवल आपातकालीन प्रतिक्रिया पर ही केंद्रित हैं।”

भारत में अभी भी गर्मी से होने वाली मौतों की गिनती के लिए कोई स्टैंडर्ड नेशनल तरीका नहीं है, इस कमी को देबनाथ और लिन ने नेचर इंडिया में एक कमेंट्री में बताया। डिटेल्ड डेटा की कमी की वजह से कारणों का पता नहीं चल पाता।

महिलाओं की मौतें भी पुरुषों की मौतों जितनी एक्यूरेसी से रिकॉर्ड और सर्टिफाइड नहीं होतीं।

चारकौडियन इस बात से सहमत हैं कि बेहतर आंकड़ों की तुरंत ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि अगर महिलाओं की गर्मी से होने वाली मौतों की गिनती कम की जा रही है, तो “स्थिति हमारी सोच से भी ज़्यादा दुखद और ज़रूरी है,” और यह फिजियोलॉजी पर बहस से अलग मुद्दा है।

दोनों रिसर्चर इस बात से सहमत हैं कि भारत में मौतों का कारण यह नहीं है कि महिलाओं का शरीर पुरुषों की तुलना में ज़्यादा फेल होता है। जो बात उन्हें अलग करती है, वह है तरीका और, एक मामले में, यह कि कोई नतीजा साइंटिफिक जांच की बारीकियों से निकलकर पब्लिक में चर्चा में आने के बाद कितनी सावधानी से बताया जाता है।

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  • Wahid Bhat is an environmental journalist with a focus on extreme weather events and lightning. He reports on severe weather incidents such as floods, heatwaves, cloudbursts, and lightning strikes, highlighting their growing frequency and impact on communities.

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