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बालाघाट वन विभाग के कार्यालय पर 6 महीने से ताला!

Balaghat forest department office locked
ताले में बंद बालाघाट वन मंडल का कार्यालय

मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में स्थित मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) और प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ) कार्यालयों पर पिछले छह महीनों से ताले लगे हुए हैं। यह स्थिति एक अदालती आदेश का पालन न किए जाने के कारण बनी है।

विभागीय अधिकारियों ने एक न्यायालयीन फैसले के खिलाफ अपील दायर करने में 552 दिन का विलंब किया, जिसे कलकत्ता हाईकोर्ट ने 19 दिसंबर 2025 को ‘अक्षम्य’ करार दिया। अदालत ने विभाग की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि जब तक 1.20 करोड़ रुपये की डिक्री राशि का भुगतान नहीं किया जाता, तब तक बालाघाट के वन अधिकारी अपने कार्यालयों में प्रवेश नहीं कर सकेंगे।

1997 का विवाद और 27 साल की प्रशासनिक उपेक्षा

इस मामले की शुरुआत वर्ष 1997 में हुई, जब अविभाजित मध्य प्रदेश के पश्चिम उत्पादन वनमंडल ने 60 लॉट बांस की निविदा जारी की। कोलकाता की कल्पतरु एग्रो फॉरेस्ट ने निविदा जीतकर गर्रा और लांजी डिपो से 43 लॉट बांस का उठाव किया।

हालांकि, शेष डिपो में उपलब्ध बांस की गुणवत्ता इतनी खराब थी कि उसका व्यावसायिक उपयोग संभव नहीं था। फर्म ने इस संबंध में विभाग को कई बार शिकायतें दर्ज कराईं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

बाद में विभागीय कार्यालयों के विलय और कुछ कार्यालयों के बंद हो जाने के कारण, भुगतान करने के बावजूद फर्म शेष बांस का उठाव नहीं कर सकी। इस दौरान न तो विभाग ने मानक गुणवत्ता का बांस उपलब्ध कराया और न ही जमा की गई राशि वापस की।

आखिरकार, वर्ष 2015 में फर्म ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इसके बाद भी यह मामला वर्षों तक अदालती फाइलों में लंबित रहा। इस पूरे कालखंड में बालाघाट में पदस्थ किसी भी सीसीएफ या डीएफओ ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया।

विभागीय लापरवाही और एकतरफा डिक्री

11 जुलाई की तारीख विभाग के लिए निर्णायक साबित हुई। कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में पहुंची टीम ने बालाघाट में कार्रवाई करते हुए सीसीएफ और डीएफओ कार्यालयों को सील कर दिया। इस दौरान अधिकारियों और कर्मचारियों को फाइलों सहित कार्यालयों से बाहर निकाला गया।

वर्तमान स्थिति यह है कि पिछले छह महीनों से सीसीएफ और डीएफओ स्तर के अधिकारी रेंजर कॉलेज परिसर के सीमित कमरों से काम कर रहे हैं।

दरअसल अदालती सुनवाई के दौरान विभाग द्वारा नियुक्त किए गए कलकत्ता स्थित अधिवक्ता लगातार अनुपस्थित रहे। न तो प्रभावी पैरवी की गई और न ही आवश्यक दस्तावेज समय पर अदालत में प्रस्तुत किए गए।

इसके चलते जून 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने कल्पतरु एग्रो फॉरेस्ट के पक्ष में एकतरफा डिक्री पारित की। डिक्री के अनुसार मूल राशि 28,33,356 रुपये थी, जो ब्याज और लाभ सहित बढ़कर लगभग 1.20 करोड़ रुपये हो गई। अदालत ने विभाग को इस राशि के भुगतान का आदेश दिया था।

डिक्री के बाद भी वन मंत्रालय और विभागीय मुख्यालय स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। परिणामस्वरूप पुनरीक्षण याचिका दायर करने में 552 दिन की देरी हुई, जिसके लिए अदालत के समक्ष कोई संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किया गया।

मामले की सुनवाई के दौरान कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अनिरुद्ध रॉय ने स्पष्ट किया कि अब अंतरिम राहत देने की कोई गुंजाइश नहीं है और विभाग की याचिका खारिज कर दी।

जवाबदेही का सवाल

वन बल प्रमुख (HoFF) वीएन अंबाड़े ने इस स्थिति को अधिकारियों की लापरवाही का परिणाम बताया है। उन्होंने कहा,

“यह स्थिति अधिकारियों की लापरवाही का नतीजा है। अब विभाग को 1.20 करोड़ रुपये का भुगतान करना ही होगा।”

वहीं, पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे ने सवाल उठाया है कि इस भुगतान का भार किस पर पड़ेगा। उन्होंने कहा,

“यह पैसा किसकी जेब से जाएगा? क्या लापरवाही करने वाले अधिकारियों के वेतन से इसकी भरपाई होगी?”

इस बीच, अदालत ने विभाग को 22 जनवरी 2026 तक विरोध शपथपत्र और 23 फरवरी 2026 तक प्रत्यूत्तर दाखिल करने का समय दिया है।

यह मामला केवल 1.20 करोड़ रुपये के भुगतान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायालयीन आदेशों के अनुपालन में हुई प्रशासनिक देरी और लापरवाही की उस प्रवृत्ति को भी उजागर करता है, जिसका आर्थिक भार अंततः सार्वजनिक संसाधनों पर पड़ता है।

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  • Based in Bhopal, this independent rural journalist traverses India, immersing himself in tribal and rural communities. His reporting spans the intersections of health, climate, agriculture, and gender in rural India, offering authentic perspectives on pressing issues affecting these often-overlooked regions.

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