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कचरे को कैसे कारीगरी में बदल रहा अकीरा ईको?

माईड योर अर्थ के इस एपिसोड में हमने बात की अदिति चंदेल से। वह ‘अकीरा ईको’ नाम की कंपनी की फाउंडर हैं। यह कंपनी सिंगल यूज प्लास्टिक को अपसाइकल करने का काम करती है। आसान भाषा में कहें तो वह सिंगल यूज प्लास्टिक को आकर्षक बैग, कोस्टर और नोटबुक बनाने का काम करती हैं।    

एक बिजनेस फैमिली से आने वाली अदिति यहां कैसे पहुंची और कैसे उन्होंने यह शुरू किया? प्लास्टिक का अपसाइकल क्या होता है? अदिति यह कैसे करती हैं? सब कुछ जानेंगे इस पॉडकास्ट में।

जूहू बीच से मिली प्रेरणा

अदिति चंदेल ने साझा किया कि कैसे एक सामान्य उपभोक्ता किसी चिप्स के पैकेट को केवल 5 मिनट इस्तेमाल करता है और फेंक देता है, लेकिन वह कचरा लैंडफिल में लाखों सालों तक बना रहता है।

अदिति ने बताया कि उनकी इस यात्रा की शुरुआत मुंबई के जूहू बीच से हुई। अपनी नौकरी से नाखुश होकर एक दिन वह बीच पर टहल रही थीं, जहां उन्होंने भारी मात्रा में प्लास्टिक कचरा और लोगों की इसके प्रति लापरवाही देखी। उन्होंने देखा कि एक बच्ची ने कचरा फेंका और उसके माता-पिता ने उसे टोका भी नहीं। इस घटना ने उन्हें प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन पर शोध करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने दिसंबर 2021 में ‘अकीरा ईको’ की शुरुआत की।

अकीरा ईको: प्लास्टिक को ‘दूसरा जीवन’ देना

‘अकीरा’ एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ है ‘आफ्टर लाइफ’। अदिति का उद्देश्य उस प्लास्टिक को एक नया जीवन देना है जो 10-15 मिनट के उपयोग के बाद बेकार हो जाता है।

अदिति प्लास्टिक को रिसाइकल करने के बजाय ‘अपसाइकल’ करने पर जोर देती हैं। रिसाइक्लिंग में प्लास्टिक को पिघलाया जाता है जिससे ऊर्जा और पानी की खपत होती है, जबकि अपसाइक्लिंग में प्लास्टिक के मूल रूप को बदले बिना उसे और अधिक उपयोगी बनाया जाता है।

वे सिंगल-यूज़ प्लास्टिक (जैसे चिप्स के रैपर, पॉलिथीन) को खरीदती हैं और गुजरात के भुज में अपने कुशल कारीगरों की मदद से चरखे और हैंडलूम के जरिए उन्हें लाइफस्टाइल प्रोडक्ट्स में बदल देती हैं।

कारीगरों का साथ और तकनीकी सुधार

अदिति ने भुज जाकर वहां के कारीगरों के साथ काम किया। उन्होंने मौजूदा तकनीकों में कुछ महत्वपूर्ण सुधार किए:

पहले वहां नायलॉन साथ बुनाई होती थी, जिसे अदिति ने बदलकर सूती धागे का उपयोग शुरू किया। इसके अलावा उत्पादों को सुंदर (Aesthetic) बनाने के लिए ‘चेकर्ड वीव’ जैसी कठिन बुनाई का इस्तेमाल किया ताकि लोग इन्हें केवल दान समझकर नहीं, बल्कि अपनी पसंद से खरीदें। 

अदिति ने शुरुआत में जो उत्पाद खुद के इस्तेमाल के लिए बनाया था उसमें मुड़ने के बाद प्लास्टिक की नुकीली धार थी। अदिति कहती हैं कि ऐसे प्रोडक्ट को निश्चित तौर पर नहीं बेचा जा सकता। प्लास्टिक की तीखी धार को कम करने के लिए उन्होंने बुनाई के पैटर्न में बदलाव किया ताकि उत्पाद त्वचा के लिए कोमल हों।

उनके अनुसार भारत में सबसे बड़ी समस्या प्लास्टिक का कलेक्शन और सेग्रगेशन (वर्गीकरण) है। मल्टी-लेयर प्लास्टिक (MLP) जैसे चिप्स के रैपर को कबाड़ी वाले भी नहीं खरीदते क्योंकि उन्हें रिसाइकल करना कठिन है।

समाज के लिए संदेश

मशीन से बने उत्पादों की तुलना में हाथ से बने इन उत्पादों की कीमत अधिक होती है। अदिति का कहना है कि कचरे को इकट्ठा करना, साफ करना और कारीगरों को उचित मजदूरी देना महंगा पड़ता है, इसलिए वे इन्हें ‘प्रीमियम प्रोडक्ट्स’ के रूप में पेश करती हैं।

अदिति लोगों से जिम्मेदार व्यवहार की अपील करती हैं। वे कहती हैं कि जब तक प्लास्टिक का पूरी तरह विकल्प नहीं मिल जाता, तब तक इसका उपयोग जिम्मेदारी से करें और ‘फास्ट फैशन’ के बजाय टिकाऊ और हाथ से बने उत्पादों का समर्थन करें। उनका भविष्य का लक्ष्य उपभोक्ताओं से पुराने उत्पादों को वापस लेने (Buy-back) की सुविधा शुरू करना है ताकि उनका सही ढंग से निपटान हो सके।

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