खंडवा जिले के आवलिया (खालवा) गांव की रीठी बाई का परिवार 3 एकड़ ज़मीन पर खेती करता है। यहां 2 एकड़ में गेहूं और एक एकड़ में कपास की फसल लगी हुई है। इसके अलावा घर के सामने कुछ सब्ज़ियों की खेती हो रही है। जहां गेहूं की फसल अब भी कटाई के इंतज़ार में है वहीं कपास की चुनाई लगभग पूरी हो चुकी है और जहां-तहां कुछ पौधों में ही फसल दिखाई देती है। 4421 लोगों की जनसंख्या वाले इस गांव में हर घर के पीछे संबंधित परिवार के खेत हैं। हर खेत में गेहूं और कपास ही दिखाई देता है।
मगर 10 साल पहले उनका खेत ऐसा नहीं दिखता था। उनका परिवार गेहूं और कपास की जगह कोदो (Paspalum scrobiculatum), कुटकी (Panicum Sumatrance) और अन्य मोटे अनाजों की खेती करते थे।
रीठी बाई कहती हैं कि गेहूं और कपास की खेती के लिए खेतों में रासायनिक दवाइयों का छिड़काव करना पड़ता है जिससे उनकी सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है। साथ ही इससे लागत भी बढ़ती है। वह कहती हैं कि गेहूं को 5-6 बार पानी देना पड़ता है। जबकि कोदो गर्म और सूखे वातावरण में होने वाला अनाज है जो 40 से 50 सेंटीमीटर सालाना बारिश वाले क्षेत्र में भी हो सकता है। हालांकि खंडवा में आम तौर पर सालाना 77.76 सेंटीमीटर (777.6 मिमी) बारिश होती है।
मगर 2016 में रीठी बाई के घर के लोग और मवेशी कोदो खाने से बीमार हो गए। जिसके बाद उन्होंने कोदो उगाना बंद कर दिया। अब इस गांव के लोग चाहते हैं कि सरकार उन्हें कोदो के ‘सुरक्षित बीज’ दे ताकि वह इसे फिर से उगा सकें। तब सवाल यही है कि क्या कोदो का बीज असुरक्षित है? कैसे यह सुपर फ़ूड ‘ज़हर’ बन जाता है? और इससे बचने के लिए रीठी बाई क्या कर सकती है?

पोषणयुक्त आहार है कोदो
64 साल की रीठी बाई ने अपने बचपन में कोदो, कुटकी समेत कई अन्य मोटे आनाजों को ही उगते देखा। वह बेहद कम उम्र की थीं जब उनका विवाह हुआ और वो आवलिया आ गईं। यहां भी वह कोदो और कुटकी उगाती थीं। रीठी कोदो केवल अपने घर के इस्तेमाल के लिए रखतीं। जबकि कुटकी और अन्य अनाज बाज़ार में बेच देतीं।
गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में कोदो और कुटकी को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा अक्टूबर 2025 में रानी दुर्गावती श्री अन्न प्रोत्साहन योजना के तहत दोनों फसलों की सरकारी खरीद को मंज़ूरी दी गई थी। घोषणा के अनुसार कोदो का सरकारी रेट 2500 रु प्रति क्विंटल तय किया गया था। साथ ही किसान को सरकार की ओर से 1000 रूपए प्रति क्विंटल की प्रोत्साहन राशि भी दी जानी थी।
आर्थिक सर्वे 2025-26 के अनुसार दोनों फसलों के लिए 22,886 किसानों ने पंजीयन करवाया है। मगर इनमें खंडवा के किसान शामिल नही हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि योजना के तहत जिन 16 जिलों का चयन किया गया है उनमें खंडवा शामिल नहीं है।
कोदो एक पौष्टिक आहार का स्त्रोत है जिसमें 8.3% प्रोटीन, 1.4% फैट और 65.6% कार्बोहाइड्रेट होता है। इसमें फॉस्फोरस अन्य किसी भी मोटे अनाज की तुलना में कम होता है। साथ ही इसकी एंटीऑक्सीडेंट क्षमता अन्य किसी भी मिलेट या दालों से अधिक होती है। इसके चलते यह मधुमेह से पीड़ित लोगों के लिए चावल के विकल्प के रूप में देखा जाता है।
वहीं 100 ग्राम कुटकी में 10.1 ग्राम (10.1%) प्रोटीन, 65.5 ग्राम (65.5%) कार्बोहाइड्रेट और 7.7 ग्राम (7.7%) डाईटरी फाइबर के साथ ही अन्य पौष्टिक तत्व होते हैं।

इसके अलावा इन अनाजों का कोरकू और गोंड आदिवासी समुदाय के लिए सांस्कृतिक महत्त्व भी है। रोशनी गांव की रहने वाली कोरकू महिला ऊष्मा ठाकरे बताती हैं कि कोरकू समुदाय में शादी तभी होती है जब वर पक्ष द्वारा वधु को 8 किलो कुटकी दी जाती है। वहीं गोंड समुदाय में पूर्वजों के निधन में कुटकी की खिचड़ी और कुल देवी की पूजा में कोदो का सेवन किया जाता है।
ठाकरे उनके घर के बुजुर्गों द्वारा कही जाने वाली बात दोहराती हैं कि जानवरों के बीमार होने पर कोदो खिलाने से वह चारा खाना शुरू कर देता है। इसके अलावा जानवरों के बच्चा होने पर कोदो का सेवन करवाने से दूध भी अच्छा होता है।
यूनाइटेड नेशंस ने 2023 को इंटरनेशनल ईयर ऑफ़ मिलेट्स घोषित किया था। इसके समर्थन में केंद्र सरकार ने कई प्रयास भी किए हैं। मध्य प्रदेश में कोदो और कुटकी उत्पादन के आंकड़े एक साथ इकठ्ठा किए जाते हैं। 2016 से 2024 तक के आंकड़ों को देखें प्रदेश में इसका उत्पादन बढ़ा है। हालांकि 2021 से 2024 के बीच इसमें गिरावट दर्ज की गई है। वहीं खंडवा के आंकड़ों में यह उतार-चढ़ाव और भी दिखाई देता है। 2020 से 2023 तक उत्पादन और रकबा बढ़ा है। मगर मिलेट ईयर के अगले ही साल उत्पादन और रकबा कई गुना गिर गया।

जब कोदो हुई ‘ज़हरीली’
रीठी बाई 2016 का किस्सा याद करती हैं जब कोदो खाने के बाद उनको चक्कर आने शुरू हो गए। वह कहती हैं कि शाम होते-होते उनको उल्टी भी हुई। इस दौरान घर के कई अन्य लोगों ने भी इसी तरह की शिकायतें की। वह याद करके बताती हैं कि उनके जानवर जब फसल का बचा हुआ हिस्सा खा रहे थे तो चक्कर खाकर गिर रहे थे। सालों से कोदो खाती आ रही रीठी के लिए यह नई घटना थी। वह कहती हैं, “हम बहुत पहले से कोदो खा रहे थे कभी ऐसा नहीं हुआ केवल उसी साल ऐसा हुआ।”
इसके बाद उनके और आस-पास के गांव में यह चर्चा शुरू हो गई कि कोदो ज़हरीला हो गया है। रीठी बताती हैं कि वह जब दूसरे गांव की बाइयों (महिलाओं) के साथ बैठतीं तो उनको लोग बताते कि किसी की बहू को कोदो खाने के बाद उल्टी होने लग गई तो किसी के मवेशी इसका चारा खाने के बाद गिर गए।
हालांकि यह एक मात्र घटना नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ बीते साल दिसंबर में दमोह जिले के पटेरा ब्लॉक में कोदो की रोटी खाने के बाद 14 लोगों की तबियत बिगड़ गई। हालत गंभीर होने पर उन्हें जिला अस्पताल भर्ती करवाना पड़ा। दिसंबर 2025 में ही मैहर जिले के चपना करौंदी गांव में एक ही परिवार के 4 लोगों की तबियत बिगड़ गई। चूंकि रीठी ने जानवरों का ज़िक्र किया है इसलिए अक्टूबर 2024 की घटना का ज़िक्र करना ज़रूरी है जब बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व (BTR) में 10 हाथी संदिग्ध अवस्था में मृत पाए गए थे।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सभी हाथियों के पेट में अपच कोदो पाया गया। 1933 में तमिलनाडु में भी ऐसी एक घटना में 14 हाथियों की मौत हुई थी। बीटीआर की घटना का परिणाम ये हुआ कि अगले साल उमरिया कलेक्टर ने एक मीटिंग कर कोदो की ख़राब फसल को नष्ट करने के निर्देश दिए थे।
रीठी और आस-पास हुई घटनाओं का असर ये हुआ कि इन्होने कोदो उगाना या उसके बीज संग्रहण करना भी बंद कर दिया। स्पंदन समाज सेवा समिति नामक स्थानीय सामाजिक संस्था के प्रयास से उन्होंने मोटे आनाज का एक बीज बैंक तैयार किया मगर इसमें भी कोदो के बीज नहीं सहेजे।

तो क्या वाकई ज़हरीला होता है कोदो?
डॉ हरीप्रसन्ना के भारतीय श्री अन्न अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIMR) में प्रिंसिपल साइंटिस्ट हैं। उन्होंने इस विषय पर ‘कोदो पॉईजनिंग: कॉज़, साइंस एंड मैनेजमेंट’ शीर्षक से लेख भी लिखा है। वह कहते हैं कि कोदो का अनाज ज़हरीला नहीं होता। लेकिन उसे काटने के बाद अगर सही तरह से रखरखाव नहीं किया गया तो इसमें फंगस लगता है जिससे यह मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो जाता है।
डॉ हरिप्रसन्ना अपने शोध पत्र में लिखते हैं, “अभी तक किसी स्टडी में यह नहीं दिखाया गया है कि कोदो के बीज के अंदर कोई ऐसा टॉक्सिन बनता है जिससे पॉइज़निंग हो।”
1985 में हुए शोधों में यह पता चला कि साइक्लोपियाज़ोनिक एसिड (Cyclopiazonic Acid) या सीपीए उन प्रमुख माइकोटॉक्सिन में से एक है जो इस अनाज को ज़हरीला बनाता है। इस शोध में पाया गया कि संक्रमित कोदो के बीज एस्परगिलस फ्लेवस (Aspergillus flavus) और ए टैमरी (Aspergillus tamarii) से इन्फेक्टेड थे और दोनों फंगस ने साइक्लोपियाज़ोनिक एसिड बनाया।
यहां इस बात का ज़िक्र करना ज़रूरी है कि बीटीआर में जिन हाथियों की मौत हुई थी उनके शरीर में 1,567 से लेकर 1,83,779 पार्ट्स पर बिलियन (पीपीबी) तक सीपीए पाया गया था। जबकि इसकी केवल 13000 पीपीबी मात्रा भी हाथी के लिए घातक हो सकती है।

मगर यह तो रही कैमेस्ट्री की बात। सवाल ये है कि आखिर कोदो में यह फंगस पनपता कैसे है? इसका जवाब देते हुए डॉ हरीप्रसन्ना कहते हैं, “फंगस अनाज के छिलके और बीज के बीच में पनपता है। अगर काटने के बाद अनाज को अच्छे से सुखाया नहीं गया और उसके बाद पूरी तरह से छिलके (husk) को दाने से अलग नहीं किया गया है तो अनाज में फंगस लग सकता है।”
वह कहते हैं कि इस तरह के इन्फेक्शन से मूंगफली और मक्का जैसी फसलें भी हानिकारक हो सकती है।
रीठी बाई बताती हैं कि वो अपने सभी अनाज का भंडारण कोठी में करती हैं। यह कोठी एल्युमीनियम का एक बेलनाकार पात्र होता है जिसके नीचे अनाज निकालने के लिए एक ढक्कन लगा होता है। बर्तन के ऊपर लगे ढक्कन में प्लास्टिक की बोरी लगाकर इसे हवा से बचाने का प्रयास किया जाता है।
मध्य प्रदेश में कोदो की बोवाई जून के अंतिम हफ्ते या जुलाई के पहले हफ्ते में होती है। अलग-अलग वैराइटी के आधार पर यह 95 से 110 दिनों की फसल होती है। डॉ हरीप्रसन्ना कहते हैं कि अगर काटने के बाद बहुत समय के लिए इसे खेत में रखा जाए तो बारिश के कारण इसमें नमी आ सकती है। इससे फसल में फंगस पनप सकता है।

रीठी बाई अपना मिलेट कैसे बचा सकती है?
इसके लिए डॉ हरीप्रसन्ना फसल को देर से काटने से बचने की सलाह देते हैं। वह कहते हैं कि आधुनिक मशीनों में फसल काटने के बाद उसकी नमी को पूरी तरह ख़त्म करने की भी क्षमता है। इन तकनीकों का इस्तेमाल कर कटाई के बाद कोदो में सीपीए पनपने से रोका जा सकता है। वह बताते हैं कि जहां इसे स्टोर किया जा रहा है वहां के वातावरण में 70 या इससे कम नमी होनी चाहिए। इसके अलावा बीज में 12% या इससे कम नमी हो, इसे सुखाने के बाद ठंडा किया गया हो और बीज का तापमान 1 से 4 डिग्री सेल्सियस के बीच होना चाहिए।
डिंडौरी में पारंपरिक मोटे अनाजों के बीजों को संरक्षित करने का कम करने वाले नरेश बिश्वास कहते हैं, “आदिवासी समुदाय के लोगों के पास इतनी सुविधा नहीं है कि वह आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करें।” वह कहते हैं कि पारंपरिक तरीके से भंडारण करने पर भी नमी से बचा जा सकता है हालांकि वह यह भी स्वीकार्य करते हैं कि इन तकनीकों में चूक होने की संभावना बनी रहती है। वह मानते हैं कि सरकार को भंडारण सुविधा भी देनी चाहिए।
रीठी बाई मानती हैं कि उन्हें अगर ‘बिना ज़हर वाले’ बीज मिलेंगे तभी वह इसे वापस उगा सकेंगी। इसके लिए उन्होंने अपनी ग्रामसभा में मांग भी रखी है। वह कहती हैं कि अगर इसे फिर से उगाना शुरू नहीं किया तो ‘शादी-संस्कार’ की ज़रूरत के लिए भी उनको बाज़ार पर निर्भर रहना पड़ेगा। इसके अलावा वह चाहती हैं कि उनके पोते-पोती ऐसा आनाज खाएं जो बिना केमिकल के छिड़काव के उगा हो। क्योंकि उनका मानना है कि ‘केमिकल वाला गेहूं’ खाने से उनके ‘पोते’ ताक़तवर नही होंगे।
बैनर ईमेज – रीठी बाई धान के अनाज को साफ़ करते हुए।
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