रायसेन जिले के झिरी गांव में बेतवा नदी का उद्गम स्थल है। हर सुबह आठ बजे कुछ लोग यहां की पहाड़ियों पर चढ़ते हैं, पत्थर के छोटे बांध बनाते हैं और दोपहर 12 बजे वापस उतर आते हैं। यह सरकारी कार्यक्रम नहीं है। इसमें शामिल लोग भोपाल, विदिशा और इंदौर से अपने खर्च पर आए हैं।
यही झिरी वह जगह है जहां बेतवा नदी का उद्गम माना जाता है। विंध्य क्षेत्र में करीब 470 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस स्रोत से निकलकर बेतवा लगभग 590 किलोमीटर बहती हुई हमीरपुर के पास यमुना में मिल जाती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में गैर-मानसूनी मौसम के दौरान उद्गम क्षेत्र में नदी का प्रवाह लगातार कमजोर पड़ा है। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट भी दर्ज करती है कि शुरुआती हिस्सों में नदी कई जगह छोटे-छोटे जलखंडों में टूटती दिखाई देती है।
बेतवा उद्गम सूखा

लगातार दूसरी गर्मी में बेतवा का उद्गम स्थल गोमुख सूखा पड़ा है। वन विभाग ने इस इलाके के संरक्षण के लिए एक साल पहले सरकार को 11 करोड़ रुपए का प्रस्ताव भेजा था, जो अभी तक मंजूर नहीं हुआ। इस बीच, भोपाल, विदिशा और इंदौर से आए कुछ लोगों ने खुद कुछ करने का फैसला किया।
10 मई से शुरू हुए इस श्रमदान सप्ताह में वैज्ञानिक, पूर्व अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय ग्रामीण एक साथ काम कर रहे हैं। अभियान के संयोजक डॉ. आर.के. पालीवाल बताते हैं कि पांचवें दिन तक 30 नए पत्थर के चेक डैम बन चुके थे और पिछले साल बने 55 चेक डैम की मरम्मत भी हो चुकी थी। एक दिन कड़ी धूप में सिर्फ एक दर्जन लोगों ने 22 नए चेक डैम खड़े कर दिए।
चेक डैम से कैसे जीवित होगी नदी?

विनय पटेरिया, जो इस अभियान में वॉलंटियर हैं, सीधे शब्दों में समझाते हैं कि यह काम क्या है। “बारिश होती है तो पानी ढलान से बहकर नीचे चला जाता है, ज़मीन में नहीं उतरता। छोटे-छोटे पत्थर के बांध बनाओ, पानी रुकेगा, धीरे-धीरे ज़मीन में जाएगा, भूजल बनेगा और वही भूजल नदी को जिलाए रखेगा।”
NGT (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) की एक समिति ने दिसंबर 2025 में झिरी का दौरा किया था और पाया था कि उद्गम स्थल के आसपास कई प्राकृतिक जलस्रोत हो सकते हैं जिन्हें पहचाना और संरक्षित किया जाना चाहिए। इस श्रमदान अभियान में ठीक यही हुआ है।
वो पुजारी जिसने पार्वती कुंड तक पहुंचाया
चौथे दिन श्रमदानियों को पहाड़ी की सबसे ऊंची चोटी पर एक प्राचीन प्राकृतिक जलस्रोत मिला। स्थानीय पुजारी गोपाल दास उन्हें वहां ले गए थे। उन्हें पता था कि उस जगह कभी पानी था। जैसे-जैसे मिट्टी और पत्थर हटाए गए, भीतर से पानी रिसने लगा। देखते ही देखते कुंड भर गया। इस जलस्रोत को “पार्वती कुंड” नाम दिया गया। अगले दिन वहां एक फीट से ज़्यादा पानी जमा मिला और इलाके के जानवर वहां पहुंच चुके थे।

म.प्र. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद में मुख्य वैज्ञानिक (जल संसाधन) डॉ. कपिल खरे, जिनका जल के क्षेत्र में 30 से अधिक वर्षों का अनुभव है, बताते हैं कि यह जलस्रोत महज एक कुंड नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि पहाड़ी के भीतर अभी भी भूजल भंडार जीवित है। चेक डैम से जो पानी ज़मीन में उतरेगा, वही इन भंडारों को भरेगा और यही पानी बेतवा के प्रवाह की असली जड़ है।
रातापानी टाइगर रिज़र्व को भारत का 57वां टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया है। इसी रिज़र्व के भीतर यह श्रमदान हो रहा है और वन विभाग के कर्मचारी भी इसमें हाथ बंटा रहे हैं।
गोपाल दास भावुक होकर कहते हैं कि जो कुंड वर्षों से सूखा पड़ा था, उसमें पानी देखना किसी तपस्या के फल जैसा है। वह श्रमदानियों की तुलना भगीरथ से करते हैं जो पुराण में गंगा को धरती पर लाए थे।
कैसे अलग है बेतवा?
वैज्ञानिक सुनील चतुर्वेदी एक ज़रूरी बात याद दिलाते हैं। हिमालय से निकलने वाली नदियां ग्लेशियर से जीती हैं, लेकिन बेतवा जैसी प्रायद्वीपीय नदियां बारिश और भूजल पर निर्भर हैं। इसीलिए उद्गम क्षेत्र में पानी का रुकना इन नदियों के लिए बहुत ज़्यादा मायने रखता है।
यह अभियान 16 मई तक चला। अंतिम दो दिनों में बनारस और जौनपुर से भी कुछ लोग जुड़े। डॉ. पालीवाल कहते हैं कि लक्ष्य सिर्फ इस साल के चेक डैम नहीं हैं, बल्कि हर साल मानसून से पहले यह काम होना चाहिए ताकि उद्गम क्षेत्र में भूजल की स्थिति धीरे-धीरे सुधरे।
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