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नए सॉलिड वेस्ट नियमों के लिए भोपाल कितना तैयार है?

Why Bhopal Is Close, But Not Quite Number One: What Do Experts Think?

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने नए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम जारी किए हैं। 1 अप्रैल 2026 से यह नियम 2016 में बने नियमों की जगह लेंगे। नए नियमों में प्रदूषणकर्ताओं पर ज़िम्मेदारी बढ़ाई गई है और कचरे को उसके सोर्स पर ही और व्यवस्थित ढंग से अलग करने की बाध्यता रखी गई है। इसमें सरकारी दफ्तरों, सार्वजनिक उपक्रम सहित निजी रहवासी कॉलोनियों को भी उनके ठोस अपशिष्ट के लिए जवाबदेह बनाया गया है। 

हालांकि इन नियमों के बाद अभी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के गाइडलाइन का निर्माण करेगा। जबकि नियमों के उल्लंघन पर मुआवजा वसूलने की ज़िम्मेदारी राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रदूषण नियंत्रण समितियों की होगी। मगर यह बात तय है कि नियमों के लागू होने के बाद शहरों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का दृश्य बदल जाएगा। 

ऐसे में यह समझना ज़रूरी है कि इन नियमों के लिए भोपाल कितना तैयार है? भोपाल में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में कौनसी खामियां हैं जिन पर ध्यान दिया जाना ज़रूरी है?

भोपाल में प्रतिदिन 64 टन ठोस कचरा इकठ्ठा ही नहीं किया जाता। फ़ोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

भोपाल में ठोस अपशिष्ट उत्पादन

बीते स्वच्छ भारत सर्वेक्षण में भोपाल को 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों में देश में दूसरा स्थान मिला था। जिले के पर्यावरण प्लान के अनुसार भोपाल नगर निगम की सीमा के अंतर्गत 4 लाख 64 हजार 409 घरों से हर रोज़ 882 टन ठोस कचरे का उत्पादन होता है। इसके 2030 तक 972 टन होने का अनुमान है। इसे 719 कचरे की गाड़ियों द्वारा इकठ्ठा किया जाता है। लेकिन इकठ्ठा किए जाने वाले कचरे का प्रबंधन करने के लिए निगम के पास केवल 15 ट्रांसफर स्टेशन और 6 मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी हैं।

भोपाल नगर निगम के ही आंकड़ों के अनुसार हर रोज़ लगभग 64 टन ठोस कचरा इकठ्ठा ही नहीं किया जाता। सरकारी दस्तावेज़ों में इसका कारण अनधिकृत कॉलोनियों और बसाहटों को बताया गया है। जबकि इसी दस्तावेज में यह बताया गया है कि इस 64 टन कचरे को इकठ्ठा करने के लिए निगम के पास पर्याप्त वाहन (trollies) नहीं है। यानि बसाहटों के अधिकृत न होने से ज़्यादा निगम का संसाधन विहीन होना ज़िम्मेदार है। 

पर्यावरण कार्यकर्ता नितिन सक्सेना ने भोपाल में विभिन्न इलाकों ख़ास तौर पर शहर के ग्रीन बेल्ट और जलाशयों के पास अनाधिकृत तरीके से ठोस अपशिष्ट डंप किए जाने से संबंधित एक याचिका नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में दायर की थी। 27 जनवरी 2026 को इस पर निर्देश देते हुए एनजीटी ने भोपाल सहित मध्य प्रदेश के सभी नगरीय निकायों को ठोस अपशिष्ट नियम 2016 का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया।

In Bhopal’s Idgah Hills, Who is Segregating Our Plastic Waste?
भोपाल में केवल 6 ही मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी हैं। फ़ोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

क्या-क्या खामियां हैं?

नए नियमों को आधार बनाकर देखें तो भोपाल में सबसे बड़ी खामी 4 तरह के कचरों (गीला, सूखा, सेनेटरी और ख़ास देखभाल वाले कचरे) का इकठ्ठा न किया जाना ही नज़र आता है। निगम की गाड़ियों को 6 तरह के कचरे को अलग-अलग इकठ्ठा करने के लिए डिजाइन किया गया है। मगर इन गाड़ियों में गीला, सूखा और प्लास्टिक-लोहे जैसे कबाड़ में बिकने वाले कचरे को बस अलग-अलग किया जाता है। इसका कारण बताते हुए निगम के एक सफाई कर्मचारी कहते हैं,

“ज़्यादातर लोग गीला और सूखा कचरा ही अलग-अलग करके देते हैं, कुछ वो भी नहीं करते। गीला और सूखा कचरा इतना सारा होता है कि गाड़ी के 2 भाग करने पर भी दो चक्कर लगाकर ही कॉलोनी का कचरा इकठ्ठा हो पाता है।”

घरों से निकलने वाले कचरे को ट्रांसफर स्टेशन में ले जाकर सेग्रीगेट किया जाता है। सक्सेना ने 2024 में एक आरटीआई के माध्यम से यह जानने की कोशिश की थी कि इन स्टेशनों पर कितना लीचेट निकलता है। मगर साल भर से भी ज्यादा समय और अपीलों के बाद भी उन्हें इसका जवाब नहीं मिला। 

सक्सेना के अनुसार ट्रांसफर स्टेशन से निकलने वाला यह लीचेड जलाशयों में जाकर मिलता है। इसलिए इसकी जानकारी होना और प्लान बनाया जाना अनिवार्य है। 

नए नियमों में बल्क वेस्ट जनरेटर के लिए भी प्रावधान किए गए हैं। फ़ोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

मॉनिटरिंग का सवाल

नए नियमों के अनुसार केंद्र एवं राज्य सरकार के कार्यालयों, स्थानीय निकायों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, वाणिज्यिक प्रतिष्ठान और आवासीय सोसाइटीज को बल्क वेस्ट जेनरेटर के रूप में चिह्नाकित करने के प्रावधान भी किए गए हैं। ऐसी एंटिटी जिनका फ्लोर एरिया 20,000 स्क्वेयर मीटर या उससे ज़्यादा है, या जो हर दिन 40,000 लीटर या उससे ज़्यादा पानी की खपत करती हैं, या हर दिन 100 kg या उससे ज़्यादा सॉलिड वेस्ट पैदा करती हैं, बल्क वेस्ट जनरेटर (BWG) कहलाएंगी।

नए नियमों के अनुसार जेनेरेटर्स द्वारा उत्पादित कचरे को पर्यावरण के हिसाब से सही तरीके से इकट्ठा, ट्रांसपोर्ट और प्रोसेस करने की ज़िम्मेदारी खुद बीडब्ल्यूजी की ही होगी। इस नियम से शहरी लोकल बॉडीज़ पर बोझ काफी कम होने और डीसेंट्रलाइज़्ड वेस्ट मैनेजमेंट को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

भोपाल के पर्यावरण कार्यकर्ता रशीद नूर खान इन नियमों का स्वागत करते हैं। मगर वह सवाल करते हैं कि जब अभी नगर निगम द्वारा यह सब सही तरीके से किया जा रहा है कि नहीं इसकी ही मॉनिटरिंग नहीं होती तो अलग-अलग एंटिटी की निगरानी कैसे होगी?      

वहीं सक्सेना भी एक अधिकारी को कई सारे प्रभार देने और निगम में स्वच्छ भारत मिशन के लिए कोई विशेष अधिकारी न होने की बात को रेखांकित करते हैं। वह कहते हैं कि एक अधिकारी के पास कई प्रभार होने के कारण स्वच्छता को प्राथमिकता नहीं मिलती। वह प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में भी वैज्ञानिक स्तर के व्यक्ति को रीजनल ऑफिसर बनाने की वकालत करते हैं। 

पर्यावरण कार्यकर्ता ट्रांसफर सेंटर से निकलने वाले लीचेट को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं। फ़ोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

हालांकि एनजीटी के हालिया आदेश में भोपाल सहित प्रदेश के सभी नगरीय निकायों में एक ‘एनवायरनमेंटल सेल’ बनाने को कहा गया है। इसमें एक अधिकारी पर्यावरण के क्षेत्र में अहर्ता प्राप्त होना चाहिए ताकि वह ठोस अपशिष्ट का प्रबंदन कर रहे स्टाफ और अन्य लोगों को ट्रेनिंग दे सके। 

2025 के एनवायरनमेंट प्लान के अनुसार निगम ने एनटीपीसी के साथ 400 TPD (टन प्रति दिन) ड्राई म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट से टोरेफाइड चारकोल प्लांट लगाने के लिए एक एग्रीमेंट साइन किया था। एनजीटी ने इसकी अनुपालन रिपोर्ट पेश करने को कहा है। 

कुल मिलाकर भोपाल को नए नियमों के अनुसार अभी और तैयार होने की ज़रूरत है। कचरे का 2 के बजाए 4 प्रकारों में प्रथक्करण अच्छी बात है। मगर यह सुनिश्चित करना होगा कि कचरा गाड़ियों में भी यह इसी प्रकार हो। जलाशयों और ग्रीन बेल्ट में वेस्ट डंप पर लगाम कसना होगा और यह तय करना होगा कि एक विशेष अधिकारी नए नियमों के अनुपालन की निगरानी कर रहा हो। 

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  • Shishir Agrawal is the Hindi Editor of Ground Report. However he identifies himself as a young enthusiast passionate about telling tales of unheard. He covers environment and development affairs from the tribal landscape of central India.

    He has also covered issues related to agrarian crisis, wildlife, water, waste and urban development. He has been a recipient of several fellowships and grant. This includes Gandhi Fellowship, Vikas Samvad Media Fellowship and Earth Journalism Network Grant.

    Apart from having long conversations he indulges himself in reading books, watching theater and gazing at flying objects for leisure. He can be reached at shishiragrawl007@gmail.com.

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