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डिंडोरी में साल बोरर कीड़े पकड़कर कैसे आदिवासियों ने कटने से बचाया जंगल?

डिंडोरी की सोनवती मरावी ने 3 दिन में 12,000 साल बोरर कीड़े पकड़े, जंगल के पेड़ों को कटने से बचाया।
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डिंडोरी जिले के कबीर चबूतरा गांव में रहने वाली सोनवती मरावी के हाथों पर कीड़े के काटने के निशान हैं। सोनवती का गांव जंगलों से घिरा हुआ है और छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिजर्व की सीमा से लगा हुआ है। तीन दिन में उन्होंने अकेले करीब 12,000 कीड़े पकड़े हैं। इस कीड़े का नाम साल बोरर है। यह साल के पेड़ को अंदर से खोखला कर देता है। इस कीड़े के चलते उनके जंगल के लाखों पेड़ अब कटने वाले हैं। लेकिन सोनवती को संतोष है कि उनकी वजह से उनके जंगल के कई पेड़ कटने से बच जाएंगे। 

ग्राम कबीर चबूतरा की सोनवती मारावी बताते हुए की उन्होंने इस वर्ष 12 हज़ार कीड़े पकड़े हैं | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी
ग्राम कबीर चबूतरा की सोनवती मारावी बताते हुए की उन्होंने इस वर्ष 12 हज़ार कीड़े पकड़े हैं | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि यह कीड़ा और यह लड़ाई दोनों नए नहीं हैं।

राज्य वन अनुसंधान संस्थान (एसएफआरआई), जबलपुर के एक प्रशिक्षण दस्तावेज के मुताबिक करंजिया रेंज की 1914 की कार्य आयोजना में भी इस कीड़े का उल्लेख मिलता है। यानी जिस जंगल में आज सोनवती मरावी अपने हाथों पर कीड़े के निशान लिए बैठे हैं, वहां यह लड़ाई कम से कम एक सदी पुरानी है। 

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साल के जंगल का एक कीड़ा

एसएफआरआई के दस्तावेज के मुताबिक भारत में इस कीड़े की पहचान सबसे पहले 1897 में झारखण्ड के सिंह भूमि के साल वन क्षेत्र में हुई थी। वहां साल की लकड़ी से बने रेलवे स्लीपरों में यह कीड़ा पाया गया था, जिसे ब्रिटिश म्यूजियम ने होप्लोसेरामिक्स स्पाइनिकार्निस के रूप में पहचाना। 

मध्यप्रदेश में इसका पहला जिक्र 1905 में बालाघाट क्षेत्र में साल के हरे पौधों के सूखने की घटना के तौर पर मिलता है। इसके बाद बंजर वैली की कार्य आयोजना (1904), मोतीनाला फैन की कार्य आयोजना (1907) और करंजिया रेंज की कार्य आयोजना (1914) में भी इसका उल्लेख दर्ज है।

एसएफआरआई के वैज्ञानिक उदय होमकर साल बोरर के बारे में बताते हुए | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी
एसएफआरआई के वैज्ञानिक उदय होमकर साल बोरर के बारे में बताते हुए | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

एसएफआरआई के वैज्ञानिक उदय होमकर के मुताबिक साल बोरर साल के जंगलों में हमेशा से मौजूद रहा है। “जहां पर भी साल फॉरेस्ट होता है, ये वहां पर हमेशा से मिलता रहता है,” वे कहते हैं। फर्क सिर्फ इसकी संख्या का है, जो कभी-कभी बहुत बढ़ जाती है।

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नजदीकी इतिहास में इसका बड़ा प्रकोप 1997 से 2000 के बीच दर्ज हुआ था, जब मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मिलाकर करीब 10 लाख साल वृक्षों को नुकसान पहुंचा। कबीर चबूतरा गांव में रहने वाले दर्शन सिंह मरावी उस दौर को याद करते हैं। उस समय वे 15-20 साल के थे और अपने माता-पिता के साथ जंगल जाते थे। “सर, उस समय भी ऐसे ही कीड़ा लगा था पेड़ों में,” वे बताते हैं। तब मजदूरी की दर 75 पैसे प्रति मुंडी थी। आज यह दर 2 रुपये है।

कैसे नुकसान देता है

साल बोरर का वैज्ञानिक नाम होप्लोसेरामिक्स स्पाइनिकार्निस है।

यह एक तरह का भृंग है, जिसे लंबे सींग वाला भृंग यानी लॉन्गहॉर्न बीटल भी कहा जाता है। एसएफआरआई के दस्तावेज के मुताबिक इसका शरीर 3 से 6.5 सेंटीमीटर तक लंबा होता है और इसके दो लंबे एंटीना पूरे शरीर की लंबाई से भी बड़े होते हैं।

ग्रामीणों द्वारा पकड़ा गया साल बोरर | फोटो चंद्र प्रताप तिवारी
ग्रामीणों द्वारा पकड़ा गया साल बोरर | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

साल वृक्ष पर कुल 339 प्रजातियों के कीट पाए गए हैं, जिनमें से 147 प्रजातियां जीवित साल वृक्षों पर निर्भर हैं। इन सबमें सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाली प्रजाति यही होप्लोसेरामिक्स स्पाइनिकार्निस यानी साल बोरर है।

इसका जीवन चक्र चार अवस्थाओं में पूरा होता है, वयस्क, अंडा, इल्ली यानी लार्वा और प्यूपा। मानसून की शुरुआत के साथ जून के दूसरे-तीसरे सप्ताह में वयस्क कीड़े प्रभावित पेड़ों से बाहर निकलना शुरू करते हैं और सितंबर तक निकलते रहते हैं। ये साल की छाल काटकर उसका रस पीते हैं। अनुकूल मौसम में नर वयस्क 49 दिन तक और मादा 38 दिन तक जीवित रह सकते हैं। इसी दौरान मादा 100 से 450 तक अंडे देती है। ये अंडे छाल के छेदों, दरारों या गिरे हुए साल के तनों की शाखाओं में दिए जाते हैं।

तीन से सात दिनों में अंडों से इल्ली निकलती है और वह छाल में छेद करके पेड़ के अंदर घुसने लगती है। अंदर पहुंचने पर पेड़ अपने बचाव में राल छोड़ता है। यह शुरू में लाल और बाद में हल्के पीले या भूरे रंग का हो जाता है। जिन पेड़ों में यह राल कम मात्रा में निकलती है, उनमें इल्ली आसानी से अंदर घुस जाती है। 

जुलाई से सितंबर के बीच वह पेड़ के बाहरी हिस्से को खाना शुरू करती है और अक्टूबर तक पेड़ गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त होकर सूखने लगता है।

साल बोरर द्वारा पेड़ में किया गया छेद | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

नवंबर से फरवरी के बीच इल्लियां करीब 90 मिलीमीटर तक बड़ी होकर पेड़ के बीच के हिस्से में पहुंचती हैं और प्यूपा कक्ष बनाती हैं। दिसंबर के अंत से वे प्यूपा अवस्था में बदलने लगती हैं और अप्रैल तक ज्यादातर इल्लियां प्यूपा बन चुकी होती हैं। जून में मानसून की तेज बारिश के साथ वयस्क कीट बाहर निकलता है और चक्र फिर शुरू हो जाता है।

31 साल की सोनवती अपने अनुभव से बताती हैं, “काटता भी है, खून निकल जाता है।”

एसएफआरआई के दस्तावेज के मुताबिक ग्रसित पेड़ों को उनके लक्षणों के आधार पर आठ श्रेणियों में बांटा जाता है, हल्के संक्रमण से लेकर पूरी तरह सूख चुके ठूंठ तक। पहली श्रेणी में पेड़ की पत्तियां गिर चुकी होती हैं और तने के चारों ओर बुरादे का ढेर होता है। सबसे गंभीर स्थिति में पेड़ सिर्फ ठूंठ रह जाता है। एक अलग श्रेणी में पेड़ का शिखर जीवित और हरा रहता है, लेकिन तने से भारी मात्रा में गोंद या राल रिसती रहती है। यह पेड़ के खुद को बचाने की कोशिश करने का संकेत है।

यह वर्गीकरण सिर्फ प्रयोगशाला या दस्तावेज तक सीमित नहीं है।

सोनवती और उनके गांव के लोगों ने संक्रमित साल के पेड़ों की पहचान करके उनकी गिनती और मार्किंग की थी। वन विभाग के ग्राऊंड स्टाफ के साथ मिल कर उन्होंने इन्हीं संकेतों से बीमार पेड़ों की पहचान की और उन्हें चिन्हित किया। 

बढ़ती संख्या में मौसम की भी भूमिका

साल बोरर के प्रकोप से सूखा पेड़ | फोटो चंद्र प्रताप तिवारी
साल बोरर के प्रकोप से सूखा पेड़ | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

डिंडोरी के प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) ए.के. सोलंकी के मुताबिक अब तक विभाग को 19 लाख 25 हजार कीड़े मिल चुके हैं और 1 लाख 46 हजार प्रभावित पेड़ों को काटने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है।

पूर्व करंजिया की डिप्टी रेंज ऑफिसर कौशाम्बी झा के मुताबिक अकेले उनकी रेंज में एक लाख से अधिक पेड़ प्रभावित हैं और प्रभावित क्षेत्र करीब 17,000 हेक्टेयर तक फैला है। हालांकि डीएफओ सोलंकी इसे उस स्तर (वर्ष 1997 से 2000 ) का नहीं मानते। कौशाम्बी झा भी कहती हैं, “ यह उस स्तर का तो नहीं, लेकिन एक बड़ा क्षेत्र प्रभावित हुआ है यहां पर।”

टीएफआरआई, जबलपुर के एक अध्ययन के मुताबिक जब वातावरण में नमी 85 से 90 प्रतिशत के बीच बनी रहती है, तो कीट की एक अतिरिक्त पीढ़ी विकसित हो सकती है और उसका सर्वाइवल भी बेहतर रहता है। वहीं, नमी कम होने पर पीढ़ियों की संख्या घटती है और अंडों के सर्वाइवल की संभावना भी कम हो जाती है।

डिंडौरी स्थित साल का जंगल | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी
डिंडौरी स्थित साल का जंगल | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

उदय इस साल के प्रकोप को पिछले साल दिसंबर तक जारी रही बारिश से भी जोड़ते हैं। उनके मुताबिक इतने लंबे समय तक बनी रही नमी ने जंगलों में पहले से मौजूद कीटों के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार कीं, जिससे उनकी आबादी में अचानक बढ़ोतरी हुई।

सदी पुराना तरीका, सबसे ज्यादा इस्तेमाल में

इस कीड़े को रोकने के लिए वन विभाग आज भी मुख्य रूप से ट्रैप ट्री ऑपरेशन पर निर्भर है। एसएफआरआई के दस्तावेज के मुताबिक इसमें 60 से 90 सेंटीमीटर गोलाई वाले साल के पेड़ों को काटकर 1 से 1.5 मीटर लंबे लट्ठे बनाए जाते हैं। इन लट्ठों के दोनों सिरों पर करीब एक फीट हिस्से की छाल को कूट दिया जाता है, जिससे रस रिसने लगता है। दस्तावेज के मुताबिक इसी रस की गंध से कीड़े करीब एक किलोमीटर दूर से आकर्षित होते हैं।

रस पीने के बाद कीड़े उड़ नहीं पाते और उन्हें आसानी से पकड़ा जा सकता है। इसके बाद भोर में पांच-छह बजे ग्रामीण जाकर वे कीड़ों को पकड़ते और डिब्बे में भरकर घर ले आते हैं। एसएफआरआई के दस्तावेज़ में भी सुबह सूर्योदय से पहले पकड़ने के काम को सबसे कारगर बताया गया है।

ग्रामीण कुछ इस तरह साल बोरर की माला बनाते हैं जिसका उनका 2 रुपए प्रति कीड़ा भुगतान होता है | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी
ग्रामीण कुछ इस तरह साल बोरर की माला बनाते हैं जिसका उनका 2 रुपए प्रति कीड़ा भुगतान होता है | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

उदय एवं सोलंकी के अनुसार यह ऑपरेशन वन विभाग के वर्किंग प्लान का हिस्सा है। इसे हर मानसून किया जाना अनिवार्य है। उदय रेखांकित करते हैं कि, “अंडे और परिपक्व कीट, ये दो ही अवस्थाएं है जब यह कीड़ा पेड़ से बाहर होता है। अंडे को पकड़ना लगभग असंभव है। इसलिए बरसात के दौरान कीड़े को पकड़ना जरुरी हो जाता है, ताकि वह प्रजनन कर अपनी संख्या न बढ़ा सके।”

इसके अलावा प्रकाश पिंजरे यानी लाइट ट्रैप का भी इस्तेमाल होता रहा है। 

1996-97 और 1997-98 में मंडला जिले में ग्रामीणों ने प्रकाश की मदद से भी काफी संख्या में कीड़े पकड़े थे। काटे गए पेड़ों को साल वन क्षेत्र से तीन से चार किलोमीटर दूर ले जाकर रखा जाता है, ताकि बचे हुए कीड़े नए पेड़ों तक न पहुंच सकें। एक ग्रसित पेड़ के अंदर औसतन 200 से 1,500 तक कीड़े हो सकते हैं। खेतों में रह जाने वाले ठूंठों को जलाना भी जरूरी बताया गया है, क्योंकि इनमें कीड़े छिपे रह सकते हैं।

जंगल बचाने का काम उन्हीं हाथों पर

कटे हुए साल के पेड़ | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

उदय के मुताबिक, जब साल बोरर का प्रकोप बड़े पैमाने पर फैलता है, तो अकेले वन विभाग का अमला इसे संभाल नहीं सकता। ऐसे में समुदाय की भागीदारी जरूरी हो जाती है। उनके मुताबिक, जंगल के आसपास रहने वाले लोग खुद भी चाहते हैं कि उनके आसपास के जंगल बने रहें।

उदय कहते हैं कि इस बार गांव वालों ने कीड़ा पकड़ने से लेकर उसे जमा करने तक का काम बहुत अच्छे तरीके से किया। भले ही वे इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में न बता पाएं, लेकिन उनका तरीका वही रहा, जैसा वैज्ञानिक तौर पर किया जाना चाहिए।

आदिवासियों द्वारा बनाई गई साल बोरर की माला | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

यह जुड़ाव गांव वालों की अपनी बातों में भी साफ दिखाई देता है। कबीर चबूतरे की सत्यरूपा मरावी बताती हैं कि उन्हें कहा गया था कि कीड़ा जंगल को बहुत नुकसान पहुंचा रहा है और उसे बचाने के लिए उन्हें यह काम करना है।

“हमको बचाना है जंगल, हम भी तो रहने वाले यहीं के हैं,” वे कहती हैं।

उन्हें इस बात से भी अच्छा लगता था कि उनके काम से जंगल बच रहा था। 

सोनवती मरावी भी खुद को जंगल के इलाके की रहने वाली बताती हैं। उनका कहना है कि अगर पेड़ कट जाएंगे तो जंगल खाली हो जाएगा और उन्हें यह अच्छा नहीं लगेगा। इसलिए उनके लिए कीड़े पकड़ना सिर्फ मजदूरी का काम नहीं था। वे इसे जंगल को बचाने में अपनी सीधी भागीदारी के तौर पर देखती हैं।

वन विभाग ने इस बार भी आसपास के गांवों को मजदूरी पर लगाया है। ग्रामीण गिनती, मार्किंग और कीड़ा पकड़ने के काम में लगे हैं। 

भुगतान में कुछ महीनों की देरी हुई थी, जिसे लेकर ग्रामीणों ने अपनी बात रखी। रिपोर्टिंग के दौरान यह मुद्दा सामने आने के तीन दिन बाद, 7 अगस्त को बकाया भुगतान कर दिया गया। पूर्व करंजिया की डिप्टी रेंज ऑफिसर कौशाम्बी झा के मुताबिक भुगतान की प्रक्रिया लगातार चालू थी। 

पूर्वी करंजिया, डिंडौरी के बीट गार्ड आर एन प्रजापति के साथ ग्रामीण | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी
पूर्वी करंजिया, डिंडौरी के बीट गार्ड आर एन प्रजापति के साथ ग्रामीण | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

यह मामला अब सुलझ चुका है, लेकिन इससे यह साफ होता है कि जंगल में इस कीड़े को रोकने का पूरा तंत्र आखिरकार गांव के उन्हीं हाथों पर टिका है, जिन्हें इस काम के बदले मजदूरी मिलती है।

हालांकि विज्ञान ने इसके दूसरे रास्ते भी खोजे हैं। एसएफआरआई के दस्तावेज के मुताबिक पेड़ काटने, ट्रैप ट्री और ठूंठ जलाने के अलावा बैवेरिया बेसियाना और मेटाराइजियम एनीसोप्ली जैसी फफूंद प्रजातियों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जो कीड़े को संक्रमित कर मार सकती हैं। इकन्यूमोन और बोथ्राईडेरा जैसे कुछ परजीवी कीट साल बोरर की इल्लियों के शरीर के अंदर अपना जीवन चक्र पूरा करते हुए उन्हें भीतर से नष्ट करते हैं। इन्हें प्रयोगशाला में तैयार करके प्रभावित इलाकों में छोड़ने से भी नियंत्रण संभव है।

प्राकृतिक शिकारियों (‘नेचुरल एनिमी’) में एलस सोरडिडस नाम का कीट शामिल है, जो लार्वा अवस्था में साल बोरर की इल्लियों को खाता है। जंगली कौवा और कठफोड़वा भी इसके प्राकृतिक दुश्मनों में गिने जाते हैं।

फिर भी जमीन पर सबसे ज्यादा भरोसा अब भी इंसानी हाथों पर है। कवक, परजीवी और प्राकृतिक शिकारी दस्तावेज में दर्ज हैं, और इन पर शोध भी जारी है।  लेकिन इस सीजन में जिस तरीके से सबसे ज्यादा कीड़े पकड़े गए, वह वही पुराना ट्रैप ट्री ऑपरेशन है, जिसे गांव के मजदूर अपने हाथों से अंजाम देते हैं।

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