खरगोन। फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन (FPO) के बारे में जानने के बाद डालकी के युवा किसान बालकृष्ण पाटीदार की इसमें रुचि बढ़ी। वे पहले से खेती कर रहे थे, मगर एफपीओ के बारे में जानकारी जुटाने के बाद उन्होंने कुछ किसानों के साथ मिलकर निमाड़ फ्रेश एफपीओ बना लिया।
एफपीओ के जरिए उन्होंने मिर्च की खेती शुरू की। पहली ही फसल में उत्पादन अच्छा हुआ और उन्हें उम्मीद जगी कि अब उनकी उपज को बेहतर बाजार मिल सकेगा। उन्होंने पांच किसानों की मिर्च के लॉट निर्यात के लिए भेजे। लेकिन जांच रिपोर्ट आने के बाद, पांचों लॉट मानकों पर खरे नहीं उतरे और निर्यात के लिए रिजेक्ट कर दिए गए। जांच में पता चला कि मिर्च में मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक रसायनों के अवशेष (chemical residues) तय सीमा से अधिक थे।
उन्होंने एक बार फिर प्रयास शुरू किया। नतीजा यह रहा कि निमाड़ फ्रेश एफपीओ के माध्यम से 2021-22 में करीब 55 टन लाल मिर्च का मेक्सिको में निर्यात किया गया था। इसके बाद 120 क्विंटल मिर्च दुबई में निर्यात की गई। खास बात यह रही कि यह मिर्च पूरी तरह से रेसिड्यू-फ्री थी। फिर भी जिले में उत्पादित कुल मिर्च के मुकाबले निर्यात की गई मिर्च की मात्रा मामूली सी है।
अभी भी बड़ी मात्रा में उत्पादित होने वाली मिर्च में मानव जीवन के लिए हानिकारक रसायनों की अधिकता है। गौरतलब है कि हाल ही में चीन ने लाल मिर्च की खेपों को लेने से मना कर दिया। इसका कारण मिर्च में मेथामिडोफोस के अवशेषों की उपस्थिति बताया गया है। इससे भारत के निर्यातकों को झटका लगा है।

विश्वसनीय इनपुट उपलब्ध कराना जरूरी
एक जिला एक उत्पाद (ODOP) योजना के तहत खरगोन जिले के लिए मिर्च को मुख्य फसल के तौर पर चुना गया। जिले में अनुमानित 45 हजार हेक्टेयर पर मिर्च की खेती होती है और इसका उत्पादन 1 लाख 57 हजार 500 मीट्रिक टन है। ओडीओपी योजना के तहत तय लक्ष्यों को हासिल करने में बेहतर प्रदर्शन के लिए जिले को 2024-25 के लिए ‘रनर-अप सर्टिफिकेट’ मिला था। मुख्य रूप से यहां सूखी मिर्च से लाल मिर्च पाउडर बनाया जाता है।
जिले के बेड़िया गांव में एशिया की दूसरी सबसे बड़ी मानी जाने वाली मिर्च मंडी है। यहां स्थानीय व्यापारियों के अलावा देशभर के अलग-अलग राज्यों से व्यापारी मिर्च खरीदने आते हैं। स्थानीय मजदूरों द्वारा मिर्च के डंठल को काटकर ग्रेडिंग की जाती है। इसे डंडी कट मिर्च बोलते हैं। ग्रेडिंग के बाद मिर्च की क्वालिटी अच्छी होती है और भाव भी अधिक मिलते हैं।
बालकृष्ण बताते हैं कि एक समय हमने पांच किसानों के पांच अलग-अलग लॉट परीक्षण के लिए भेजे थे, लेकिन दुर्भाग्य से पांचों के पांचों लॉट फेल हो गए। जब हमने इसकी गहराई से जाच की, तो सबसे बड़ा कारण सामने आया कि किसान जैविक, बायो या बायोलॉजिकल के नाम पर बाजार में उपलब्ध कुछ स्थानीय कंपनियों के प्रोडक्ट खरीदकर फसलों में उपयोग कर रहे थे।
प्रोडक्ट के नाम में भले ही बायो या ऑर्गेनिक लिखा था, लेकिन उनमें ऐसे रासायनिक अवशेष पाए गए, जो रेसिड्यू-फ्री खेती के लिए गंभीर समस्या बन रहे थे। इसमें विशेष रूप से इमामेक्टिन बेंजोएट और मोनोक्रोटोफॉस जैसे रासायनिक अवशेष सामने आए।

बालकृष्ण ने महसूस किया कि किसानों को सिर्फ जैविक खेती, बायो प्रोडक्ट का इस्तेमाल या रेसड्यूस-फ्री खेती के लिए मौखिक तौर पर समझाना बस काफी नहीं है।
“जब तक किसान को सही और विश्वसनीय इनपुट उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक रेसिड्यू-फ्री खेती को जमीन पर सफल बनाना मुश्किल है।” बालकृष्ण ने कहा।
इसलिए उन्होंने विश्वसनीय कंपनियों के साथ रेड्यूस-फ्री एवं आईपीएम आधारित खेती के अनुरूप उत्पादों और तकनीकी सहयोग पर चर्चा की। कंपनियों के सहयोग से उन्होंने किसानों को सही प्रोडक्ट, सही तकनीकी मार्गदर्शन और फसल प्रबंधन की बेहतर व्यवस्था उपलब्ध कराई।
“इसके बाद हमने दोबारा तैयारी की, किसानों के साथ लगातार मॉनिटरिंग की और पूरी प्रक्रिया में सुधार किया और आज उसका परिणाम आपके सामने है।” गर्व के साथ बालकृष्ण ने कहा।
निमाड़ फ्रेश एफपीओ के माध्यम से अब तक करीब डेढ़ करोड़ मिर्च के पौधे किसानों को उपलब्ध कराए जा चुके हैं। किसानों को सलाह दी गई कि वे वैज्ञानिक सलाह अनुसार ही खेती करे।
किसानों की सुविधा के लिए 6 क्लस्टर बनाए गए हैं, इनमें करीब ढाई हजार किसान शामिल हैं। कृषि संकाय से बीएससी (Bachelor of Science) कर चुके 12 युवाओं को किसानों को सलाह देने के लिए शामिल किया गया। ये हर सप्ताह किसानों से बात कर फसल प्रबंधन बताते हैं।
एफपीओ के माध्यम से ही दवाइयां उपलब्ध कराई जाती हैं। यह दवाइयां बड़ी मात्रा में लेने पर किसानों को भी बाज़ार की तुलना में सस्ती पड़ती हैं। अनावश्यक दवाइयों का छिड़काव करने से किसान बच जाता है। इसका असर यह रहा कि जो किसान एक लाख से डेढ़ लाख रुपए तक दवाईयां उपयोग करते थे वे 1 लाख से कम की दवाईयां उपयोग कर रहे हैं। इससे उनकी लागत भी कम हुई।

रोग और कीटों के नियंत्रण के लिए दवाई विक्रेताओं पर निर्भर
दाभड़ के कुलदीप मिश्रीलाल ने मई में चार एकड़ में मिर्च के पौधे लगाए थे। अगस्त के पहले महीने में उन्होंने बताया कि बारिश अच्छी होने के कारण कीट और बीमारी का असर कम दिखाई दिया।
मिश्रीलाल सप्ताह में एक से दो बार अलग-अलग दवाईयों का छिड़काव करते हैं। “थ्रीप्स (Thrips parvispinus), मकड़ी (Spider mites), मच्छर, व्हाइट फ्लाई, इल्ली जैसे कीटों के लिए अलग-अलग कीटनाशक छिड़काव करना होता है,” मिश्रीलाल ने बताया।
वो निमेटोड (Root-knot nematodes) और विल्ट के नियंत्रण के लिए भी फंगीसाइड और अन्य दवाइयों का छिड़काव करते हैं। इसके अलावा ग्रोथ के लिए अलग-अलग फर्टीलाइजर देते हैं। यानी शुरुआत से लेकर अंत तक वो हर समस्या के समाधान के लिए केमिकल का ही इस्तेमाल करते हैं।
इससे एक एकड़ में अनुमानित खर्च 50 से 60 हजार रुपए आता है।
इसी तरह गावसन के किसान अरविंद पाटीदार के घर का एक कमरा दवाईयों के डिब्बों से भर चुका है। 03 एकड़ की मिर्च की खेती में वो हर तीन से चार दिन में अलग-अलग दवाईयों का छिड़काव करते हैं।
कब कौन सी दवाई छिड़कनी है इसकी सलाह वो स्थानीय दवाई दुकानदार से ही लेते हैं।
जबकि कृषि विज्ञान केंद्र खरगोन के वैज्ञानिक डॉ. आरके सिंह ने बताया कि मिर्च में लगातार एक ही प्रकार की दवाई का प्रयाेग नहीं करना चाहिए। हर केमिकल के स्प्रे के बाद एक बार जैविक कीटनाशक जैसे नीम का तेल आदि का प्रयोग करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसान अपने स्तर से भी कीट और बीमारी की पहचान कर सकता है। इससे नियंत्रण आसान हो जाता है।

सफेद मच्छर यदि है तो पौधों पर दिखाई देता है। थ्रीप्स होने पर पत्तियां ऊपर की ओर मुड़ती हैं। मकड़ी होने पर पत्तियां नीचे की तरफ मुड़ती है। इस प्रकार किसान अपने स्तर पर पहचान कर सकते हैं। फसल में सात से 10 दिन के अंतराल पर दवाइयाँ डालना चाहिए।
कई बार किसान एक ही कीट होने के बावजूद अलग-अलग कीटों की दवाइयां एक साथ उपयोग करते हैं। इससे फसल पर रेसिडुअल इफेक्ट आता है।
किसान आईपीएम के तरीके से भी कीटों पर नियंत्रण कर सकते हैं। इनमें पीले कार्ड, नीले कार्ड लगाना, 10 कतार के बीच एक कतार गेंदे के फूलों की लगाना और खेत के किनारे दो कतार मक्का के पौधों की लगाना शामिल है।
डॉ सिंह ने बताया कि पीले कार्ड की ओर सफेद मच्छर जबकि नीले कार्ड की ओर थ्रिप्स आकर्षित होकर चिपक जाती हैं। गेंदे के फूल भी कीटों को आकर्षित करते हैं। डॉ सिंह के अनुसार चूंकि मक्के के पौधे ऊंचे होते हैं इसलिए वो कम उंचाई पर उड़ने वाले कीटों को मिर्च के पौधों तक पहुंचने से रोकते हैं।
इस तरह आईपीएम तकनीक अपनाकर किसान कैमिकल पर निर्भरता कम करके लागत में कटौती कर सकता है। इससे रेसिडुअल इफेक्ट से बचाव होता है और मिर्च निर्यात होने योग्य मिलती है। डॉ. सिंह कहते हैं कि किसानों को आईपीएम अपनाने की लगातार सलाह दी जाती है। किसान कृषि विज्ञान केंद्र में आकर या फोटो भेजकर भी समस्या का समाधान प्राप्त कर सकते हैं।
निमाड़ फ्रेश स्थानीय स्तर पर मिर्च को निर्यात लायक और कम ज़हरीली बनाने में मदद कर रहा है। कृषि विज्ञान केंद्र से भी इसके वैकल्पिक उपाय जाने जा सकते हैं। फिर भी यहां अरविंद पाटीदार जैसे किसान भी हैं जो दवाइयों के उपयोग के लिए पूरी तरह विक्रेता की समझ पर निर्भर हैं। यानि ज़रूरी है कि इन प्रयासों की पहुंच और बढ़ाई जाए ताकि और भी किसान अपनी मिर्च निर्यात कर सकें।
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