हाईवे और राज्य की सड़कों पर लगभग हर मानसून में लोगों का सामना एक असामान्य लेकिन अब तेजी से आम होती समस्या से होता है—सड़कों पर घूमते मवेशी, खासकर गायें। पूरे राज्य में ये सड़कें घेर लेते हैं। कई बार पशुपालक अपने मवेशियों को खुला छोड़ देते हैं, जबकि आवारा और छोड़े गए मवेशी भी सूखी जगह की तलाश में सड़कों पर आ जाते हैं। उनके लिए सड़कें आराम करने की आसान जगह बन जाती हैं।
ज्यादातर अन्य राज्यों के मुकाबले मध्य प्रदेश में हजारों गौशालाएं हैं। सरकार की सब्सिडी व्यवस्था और एक समर्पित गौ-संवर्धन बोर्ड के बावजूद मवेशी सड़कों पर आना बंद नहीं हुए हैं। इससे वाहन चालकों के साथ-साथ खुद मवेशियों के लिए भी जोखिम पैदा होता है।
मध्य प्रदेश विधानसभा में गृह विभाग की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, सवाल पूछे जाने से पहले के दो वर्षों में राज्य में जानवरों से जुड़े 237 सड़क हादसे दर्ज किए गए। इन हादसों में 94 लोगों की मौत हुई और 133 लोग घायल हुए।
ये आंकड़े कांग्रेस विधायक अजय अर्जुन सिंह द्वारा 5 दिसंबर 2025 को पूछे गए प्रश्न क्रमांक 836 के जवाब में दिए गए थे।
इस सवाल में खास तौर पर सड़कों पर निराश्रित/आवारा पशुओं के कारण हुए सड़क हादसों का जिलावार आंकड़ा मांगा गया था। हालांकि, एक महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने कहा कि पुलिस के पास उपलब्ध आंकड़ों से यह पता लगाना संभव नहीं था कि हादसों में शामिल जानवर निराश्रित थे या नहीं।
3,000 से अधिक गौशालाएं चालू
गौ-संवर्धन बोर्ड की वेबसाइट के अनुसार, राज्य में 3,200 से अधिक गौशालाएं संचालित हैं, जिनमें 6.16 लाख से अधिक गायें हैं।

सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 से प्रति पशु प्रतिदिन दी जाने वाली वित्तीय सहायता भी 20 रुपये से बढ़ाकर 40 रुपये कर दी है। सरकार के अनुसार, इसका उद्देश्य पशुओं के भोजन, रखरखाव और मानव संसाधन की व्यवस्था को बेहतर करना और आवारा मवेशियों को आश्रय देने के लिए गौशालाओं को प्रोत्साहित करना है।
लेकिन ज़मीनी स्थिति अब भी नहीं बदली।
20वीं पशुधन गणना (2019) के अनुसार, मध्य प्रदेश में 8,53,971 आवारा मवेशी दर्ज किए गए थे। यह संख्या 19वीं पशुधन गणना (2012) में दर्ज 4,37,910 आवारा मवेशियों की संख्या से लगभग दोगुनी थी।
गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश
मध्य प्रदेश ने इन संरचनात्मक समस्याओं में से कुछ को दूर करने के लिए “स्वावलंबी गौशाला (कामधेनु निवास) स्थापना नीति, 2025” लागू की है।
इस नीति के तहत कम से कम 5,000 मवेशियों को रखने की क्षमता वाली बड़ी गौशालाओं के लिए जमीन आवंटित की जानी है। ऐसी एक गौशाला के लिए 130 एकड़ जमीन निर्धारित की गई है। फरवरी 2026 तक 29 स्थानों पर जमीन आवंटित की जा चुकी थी और गौशालाओं की स्थापना की प्रक्रिया चल रही थी।
इस नीति का उद्देश्य गौशालाओं को सरकारी सहायता पर कम निर्भर बनाना है। इसके तहत गौशालाओं को डेयरी, गोबर, चारा और अन्य आय पैदा करने वाली गतिविधियां विकसित करने की अनुमति देकर अपनी आमदनी के स्रोत तैयार करने की बात कही गई है।
लेकिन राज्य एक दूसरी समस्या से भी जूझ रहा है—मौजूदा गौशाला ढांचा हमेशा पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो रहा है।
फरवरी में विधानसभा में हुई चर्चा के दौरान सरकार की ओर से दिए गए जवाब में बताया गया कि करीब 400 निर्मित गौशालाएं अब भी खाली पड़ी थीं। चर्चा में इसके पीछे बिजली, सड़क और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी का जिक्र किया गया।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
19 मई 2026 को सड़कों पर आवारा पशुओं से जुड़ी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को उन हाईवे और एक्सप्रेसवे की पहचान करने का निर्देश दिया, जहां आवारा मवेशी या अन्य पशु अक्सर पाए जाते हैं। अदालत ने ऐसे पशुओं को तत्काल हटाकर निर्धारित आश्रय स्थलों में पहुंचाने के निर्देश भी दिए।
राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य राजमार्ग और राष्ट्रीय एक्सप्रेसवे से जुड़े अधिकारियों को उचित आश्रय, भोजन, पानी और पशु चिकित्सा देखभाल की व्यवस्था करने को कहा गया। अदालत ने लगातार निगरानी और तत्काल कार्रवाई के लिए समर्पित हाईवे पेट्रोलिंग टीम या सड़क सुरक्षा इकाइयां बनाने तथा यात्रियों को आवारा पशुओं की सूचना देने के लिए हेल्पलाइन नंबर उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया।

इस हस्तक्षेप के करीब दो महीने बाद किए गए हमारे फील्ड रिपोर्टिंग में राज्य की अलग-अलग सड़कों पर मवेशी अब भी सड़क पर बैठे या घूमते मिले।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 31 जुलाई 2026 को Nisha v. Municipal Council, Sangrur मामले में आवारा मवेशियों के व्यापक प्रबंधन के मुद्दे पर अलग से फैसला सुनाया।
यह मामला पंजाब में एक आवारा सांड से टकराने के बाद एक व्यक्ति की मौत से जुड़ा था। अदालत ने उसकी विधवा को मुआवजा देने का आदेश दिया और मवेशियों के व्यापक प्रबंधन को लेकर कई निर्देश जारी किए।
इनमें मवेशियों की अनिवार्य पहचान और टैगिंग, जिसमें डिजिटल पहचान प्रणाली भी शामिल है, पर जोर दिया गया। अदालत ने मवेशियों से जुड़े हादसों में मुआवजे की व्यवस्था और उन पशु मालिकों की जवाबदेही तय करने की दिशा में भी कदम उठाने को कहा, जो अब अपने मवेशियों को रखने में सक्षम नहीं हैं।
मगर इन निर्देशों का पालन कब तक होगा? और कब सड़कों से गाय पूरी तरह हट चुकी होंगी? इसका जवाब मिलने में अब भी समय है।
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