झाबुआ से लगभग 50 किमी दूर पेटलावद के धनपुरा गांव में हुर सिंह भाबर के घर के सामने लोहे के एक चौकोर बाड़े को हरे जालीदार नेट से बंद किया गया था। इसके अंदर कड़कनाथ नस्ल के करीब 100 काले रंग के मुर्गे-मुर्गियां थे। हमारे पहुंचने के कुछ देर पहले ही एक स्थानीय रेस्टोरेंट के संचालक ने 20 नग कड़कनाथ खरीदे। इससे 10,000 से अधिक की कमाई हुई।
यहां से 30 किमी दूर थांदला के विनोद मेड़ा भी कड़कनाथ नस्ल के मुर्गे-मुर्गियां पालते हैं। वो 2017 तक नगर पालिका की कचरा गाड़ी चलाते थे, लेकिन कृषि विभाग की मदद से कड़कनाथ पालन का प्रशिक्षण मिलने के बाद अपना फार्म शुरू किया। उनके पास 2,000 से अधिक कड़कनाथ मुर्गे-मुर्गियां हो चुके हैं। वो ये मुर्गे आंध्रप्रदेश, पंजाब, अंडमान सहित देश के कई हिस्सों में बेचते हैं।
कड़कनाथ देसी मुर्गे की एक प्रजाति है जिसकी उत्पत्ति झाबुआ जिले में ही हुई। इसके ब्लैक चिकन मीट को 30 जुलाई 2018 में जीआई टैग मिला। मगर इसके संरक्षण और कुक्कुट पालन को बढ़ावा देने के प्रयास 1978 से ही शुरू हो गए।
जीआई टैग मिलने के बाद स्थानीय स्तर में इसके पालन में काफी परिवर्तन आए हैं। मगर अब भी छोटे पालक इसका लाभ पूरी तरह नहीं उठा सके हैं। वहीं बड़े पालक भी अनुदान देने की मांग करते हैं। जबकि इसके संरक्षण के लिए काम कर चुके विशेषज्ञ मानते हैं कि इस प्रजाति के बारे में अभी और शोध किया जाना ज़रूरी है।

कड़कनाथ क्या होता है?
कड़कनाथ मुर्गे की एक भारतीय नस्ल है। इसे स्थानीय भाषा में काली मासी के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसकी त्वचा, पंख, पैर, मांस, खून सब कुछ काला होता है। कड़कनाथ की आम किस्में जेट-ब्लैक पेंसिल्ड और गोल्डन हैं, जो झाबुआ में पाई जाती हैं। इसकी उत्पत्ति का प्रमुख केंद्र (primary centre of origin) झाबुआ जिला माना जाता है।
मथुरा वेटेनरी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ चंदन कुमार झाबुआ कृषि विज्ञान केंद्र में कड़कनाथ संरक्षण के लिए काम कर चुके हैं।
डॉ कुमार ने बताया “कड़कनाथ पर ज़्यादा गर्मी और ठंड का असर नहीं होता। यही कारण है कि इसका पालन मध्य प्रदेश के बाहर लद्दाख, मेघालय जैसी अलग जलवायु में भी हो रहा है।”
झाबुआ की 70% से ज़्यादा आबादी सीधे खेती से जुड़ी है। यहां 80% से ज़्यादा किसान छोटे और मार्जिनल किसान (2 हेक्टेयर से कम खेती) हैं। मगर भारत सरकार के जलवायु परिवर्तन और कृषि आधारित प्रोग्राम- नेशनल इनोवेशन ऑन क्लाइमेट रेज़ीलिएंट एग्रीकल्चर (NICRA) के अनुसार झाबुआ प्रदेश के 2 सबसे संवेदनशील जिलों में से एक है.
हुर सिंह ने 8 बीघा खेत में 3 पैकेट कपास और लगभग 10 किलो मक्का बोया था। मगर सिंचाई का साधन न होने से उनकी लगभग 15,000 रु की लागत खतरे में पड़ गई।
हुर सिंह ने कहा कि कम बारिश में खेती में घाटा होने की संभावना है, मगर कड़कनाथ से होने वाली कमाई अधिक स्थिर है। यही कारण है कि उन्होंने 2 साल पहले इसे पालना शुरू किया।
ऐसे में बदलते मौसम और बारिश की अनिश्चितता के बीच कड़कनाथ पालन झाबुआ के किसानों के लिए आय का एक वैकल्पिक स्रोत है।
कड़कनाथ की तुलना ब्रायलर से करते हुए डॉ कुमार ने कहा, “ब्रायलर को ठंडे और हवादार में रखना ज़रूरी है। झाबुआ का तापमान 40 डिग्री से ज्यादा जाता है। खुले में रखने पर हीट स्ट्रोक की संभावना बढ़ जाती है। जिससे ब्रायलर की मांस की गुणवत्ता कम हो जाती है।”

एक जैसे साइज़ और तेज़ी से मीट बनाने के लिए पाली जाने वाली ब्रॉयलर नस्ल को कॉर्निश और व्हाइट प्लायमाउथ रॉक के जीन मिलाकर विकसित किया जाता है। कार्निश नस्ल इंग्लैंड और व्हाइट प्लायमाउथ रॉक अमेरिका में विकसित की गईं।
डॉ कुमार ने कहा कि कड़कनाथ 12° से 42° C तापमान वाले अर्द्ध शुष्क (semi-arid) मौसम में भी ज़िंदा रहते हैं। इन्हें बेहतर घर (बाड़े), अत्यधिक रखरखाव और ख़ास तरह के खाने की ज़रूरत नहीं होती ।
कड़कनाथ में प्रति 100 ग्राम 24% प्रोटीन होता है, जबकि रेगुलर ब्रॉयलर चिकन में 18-20% प्रोटीन होता है। इसमें फैट की मात्रा 1.94-2.6% होती है, जबकि ब्रॉयलर चिकन में 13-25% फैट होता है। कड़कनाथ के मांस में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा प्रति 100 ग्राम 59-60 mg होती है, जबकि ब्रॉयलर चिकन में यह 100 ग्राम 218.12 mg होती है।
हालांकि ब्रायलर इसकी तुलना में कम समय में ज्यादा वज़न पा लेता है और बेचने लायक हो जाता है।

हैचरी की समस्या
हुर सिंह ने बताया कि कड़कनाथ की मुर्गी अंडे देने के बाद उसके ऊपर नहीं बैठती। मेघालय में कड़कनाथ की प्रजनन क्षमता पर हुए एक अध्ययन में भी इस बात का ज़िक्र है।
डॉ कुमार ने कहा, “हर प्रजाति के कुछ ख़ास कैरेक्टरिस्टिक फीचर होते हैं। कड़कनाथ अंडों पर नहीं बैठती ऐसा नहीं है। लेकिन कम बैठती है।” उन्होंने कहा कि सालों में म्यूटेशन के दौरान इस प्रजाति में यह बदलाव आए हैं। हालांकि उन्होने इस पर और शोध की आवश्यकता को भी रेखांकित किया।
हुर सिंह के लिए चूजे निकालना कठिन हो गया। उपाय के तौर पर उन्होंने कड़कनाथ के अंडों को अन्य देसी मुर्गी के साथ रखना शुरू कर दिया। बड़े स्तर पे काम करने वाले मेडा के लिए इस तरह चूजों का उत्पादन संभव नहीं है। इसलिए वो 1000 अंडों की क्षमता वाली हैचरी मशीन (incubators) का इस्तेमाल करते हैं। इसमें 21 दिनों में 1000 अंडों से चूजे निकल आते हैं।
हैचरी मशीन या इनक्यूबेटर अण्डों को कृत्रिम तरीके से सुनिश्चित और नियंत्रित तापमान, आद्रता और हवा की आवाजाही (ventilation) देती है ताकि मां की अनुपस्थिति में भी अण्डों को विकसित कर चूजे निकाले जा सकें।
मगर उनके काम के बरक्स यह हैचरी मशीन काफी छोटी है। इसलिए उनको 3 महीने तक ऑर्डर वेटिंग में रखने पड़ते हैं। उन्होंने कहा, “बहुत बार इस दौरान अगर कोई प्रतिद्वंदी से कम रेट मिल गया तो ऑर्डर हाथ से चला जाता है।”
अब कोई योजना नहीं
झाबुआ जिला के पशुपालन एवं डेयरी विभाग के उपसंचालक डॉ अमर सिंह दिवाकर ने बताया कि फिलहाल हैचरी के लिए कोई भी सरकारी योजना नहीं है। पहले राष्ट्रीय पशुधन मिशन के अंतर्गत उद्यमिता विकास कार्यक्रम (NLM-EDP) संचालित था।
इसके अंतर्गत लोगों, किसान प्रोड्यूसर ऑर्गनाइज़ेशन (FPOs), सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स (SHGs), जॉइंट लायबिलिटी ग्रुप्स (JLGs), किसान कोऑपरेटिव ऑर्गनाइज़ेशन (FCOs) और सेक्शन 8 कंपनियों को ग्रामीण पोल्ट्री ब्रीडिंग फार्म बनाने के लिए 50 लाख रूपए तक की 50% कैपिटल सब्सिडी दी जा रही थी।
झाबुआ ब्लॉक के अंतर्वेलिया में कड़कनाथ के साथ ही अन्य प्रजाति के मुर्गों का भी पालन करने वालीं पुष्प दोहरे को भी इस योजना के तहत 34 लाख रु का लोन मिला। इससे उन्होंने 15,000 अंडों की कैपेसिटी वाली हैचरी मशीन और 3 शेड का निर्माण करवाया।
डॉ दिवाकर ने बताया कि यह योजना पिछले साल बंद हो गई।
संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2025 तक देशभर में 207 ग्रामीण मुर्गी पालन परियोजनाओं को 49.86 करोड़ रू की सब्सिडी मिली। डॉ दिवाकर ने संभावना जताते हुए कहा कि यह योजना आगामी सितंबर-अक्टूबर से फिर से शुरू हो सकती है।

अभी योजनाओं का क्या हाल है?
झाबुआ जिला के पशुपालन एवं डेयरी विभाग के उपसंचालक डॉ अमर सिंह दिवाकर ने बताया कि प्रदेश सरकार ‘अनुदान पर कड़कनाथ चूजे प्रदाय’ योजना का संचालन कर रही है।
इसके अंतर्गत बिना लिंग भेद के 28 दिन बड़े 40 चूजे दिए जाते हैं। उनके खाने, टीकाकरण और परिवहन पर भी सहायता दी जाती है। कुल मिलाकर एक इकाई (40 चूजे) की लागत 4400 रु होती है, इसमें 75% खर्च सरकार करती है।
इसी तरह अनुदान पर कुक्कुट इकाई का प्रदाय नाम से एक अन्य योजना भी प्रदेश में संचालित है जहां कड़कनाथ के अलावा अन्य नस्ल की मुर्गियों के 28 दिन बड़े 40 चूजे दिए जाते हैं।
प्रदेश सरकार ने 2025 में इस योजना के लिए 397.71 लाख रु आवंटित जबकि 237.60 लाख रु खर्च किए। यह खर्च 2024 (13.66 लाख रु) की तुलना में 17.39 गुना ज्यादा है।
मेडा टीकाकरण और आहार के लिए कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों की सलाह लेते रहते हैं। उनकी तुलना में अधिक आंतरिक गांव में रहने वाले हुर सिंह को ये मार्गदर्शन नहीं मिलता। हालांकि उन्हें भी 2 साल पहले उपरोक्त योजना से ही 40 चूजे मिले थे। अब वो टीकाकरण के लिए संपर्क समाज सेवी संस्था के पशु मित्र/पशु सखी की सहायता लेते हैं।
फिर भी संस्था के राधेश्याम पाटीदार कहते हैं कि अब भी ज़्यादातर लोगों में अपनी मुर्गियों के टीकाकरण को लेकर जागरूकता नहीं है। हुर सिंह के अलावा उनके जैसे आंतरिक गांवों के कड़कनाथ पालक वाले भी टीकाकरण से अनजान दिखाई दिए।
डॉ दिवाकर के अनुसार प्रत्येक मुर्गीपालक को टीकाकरण के लिए खुद से ही जागरूक होना पड़ता है। विभाग ने इसके लिए अलग से योजना या वैक्सीन लगाने वाले कर्मचारी नियुक्त नहीं किए।

बाज़ार का संकट
डॉ कुमार ने बताया कि उनके द्वारा कड़कनाथ के अंडों में टाइप-2 डायबिटीज को नियंत्रित करने के गुणों के बारे में शोध किया जा रहा है। वो कहते हैं कि इस प्रजाति के और भी गुणों खास तौर पर औषधीय गुणों के बारे में और शोध करने की ज़रूरत है ताकि इसका बाज़ार भी बड़ा किया जा सके।
लेकिन, अभी दोहरे और मेडा की तुलना में हुर सिंह का व्यापार बेहद सीमित है। स्थानीय ढाबा संचालक ही उनके प्रमुख खरीददार हैं। वो मुर्गे बेचने के लिए सप्ताह में एक बार लगने वाले हाट बाज़ार भी जाते हैं। मगर यहां ब्रायलर की मांग ज़्यादा है।
अपने काम को विस्तार देने के लिए उनकी पहुंच बड़े बाज़ार तक नहीं है। हमने उनसे पूछा कि क्या वो भी कड़कनाथ पालन को बढ़ाना चाहते हैं? उन्होंने कहा, “हमें पता ही नहीं है कि इसके अलावा किसे बेचना है।”
मेडा ने भी कहा कि उन्हें थांदला में कोई सरकारी दुकान सस्ती दर पर किराए पर दी जाए। इससे वो बड़ा ऑर्डर न होने पर भी स्थानीय बाज़ार में मुर्गा बेच सकेंगे। गौरतलब है कि विनिर्माण इकाई और सेवा क्षेत्र से संबंधित व्यापार शुरू करने के लिए प्रदेश में ब्याज अनुदान के साथ ऋण देने के लिए उद्यम क्रांति योजना संचालित है मगर मुर्गी पालन के लिए दुकान खरीदने या किराए पर देने हेतु ऐसी कोई योजना नहीं है।
इसके पालक मानते हैं कि जीआई टैग के चलते कड़कनाथ को अधिक ब्रांडिंग की ज़रूरत नहीं है। फिर भी स्थानीय स्तर पर बाज़ार, वैक्सिनेशन, और हैचरी जैसी सुविधाओं को नई नीतियों और योजनाओं में शामिल करने की ज़रूरत है।
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