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गैस पीड़ितों के इलाके में दूषित पानी की सप्लाई, 68% सैंपल में मिला मल का बैक्टीरिया

गैस त्रासदी प्रभावित इलाके में लोग गंदे पानी की सप्लाई की शिकायत करते हैं। इससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के लिए काम करने वाले चार संगठनों — भोपाल गैस पीड़ित महिला पुरुष संघर्ष मोर्चा गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संघ, भोपाल गैस पीड़ित निराश्रित पेंशनभोगी संघर्ष मोर्चा, भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉर्मेशन एंड एक्शन ने, 31 जुलाई 2026 की प्रेस रिलीज में आरोप लगाया है कि बंद पड़ी यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के आसपास बसी कॉलोनियों में नगर निगम दूषित पानी सप्लाई कर रहा है। 

संगठनों ने अपनी प्रेस वार्ता में इंदौर के भागीरथपुरा का हवाला दिया, जहां दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में सीवेज पाइपलाइन में रिसाव के कारण पेयजल दूषित हो गया था। दूषित पानी के कारण 110 लोग अस्पताल में भर्ती हुए थे। इनमें डायरिया, उल्टी और दस्त जैसी शिकायतें सामने आई थीं, जबकि इस घटना में 17 लोगों की जान भी गई थी। 

भोपाल ग्रुप ऑफ़ इनफार्मेशन एंड एक्शन की रचना ढींगरा का आरोप है कि लगातार शिकायतों के बावजूद नगर निगम ने कोई कार्रवाई नहीं की। 

इसके बाद संगठनों ने खुद पानी की जांच कराने का फैसला किया। 2 से 22 जुलाई 2026 के बीच 30 मोहल्लों से पानी के 63 नमूने लिए गए। तारा एक्वाचेक कंपनी के एच2एस वायल टेस्ट से इनकी जांच हुई। यह टेस्ट पानी में 63 में से 43 नमूने यानी करीब 68% सीवेज से दूषित मिले। इनमें फीकल कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया की पुष्टि हुई।

भारतीय मानक ब्यूरो के मानक (IS 10500:2012) के अनुसार पीने के पानी में फीकल कॉलीफॉर्म और ई-कोलाई की मात्रा शून्य होनी चाहिए, यानी इनकी मौजूदगी बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है।

बड़ा तालाब से सप्लाई होने वाले पानी के 90% नमूने और कोलार डैम से सप्लाई होने वाले पानी के 25% नमूने दूषित पाए गए। गौरतलब है कि, नर्मदा पाइपलाइन से जुड़े नमूने सुरक्षित मिले।

2009 में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट के अध्ययन में सामने आया था कि यूनियन कार्बाइड  फैक्ट्री से डंप किए गए जहरीले कचरे के कारण आसपास का भूजल भारी मात्रा में दूषित हो चुका है। बाद में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (IITR) की रिपोर्टों में भी लेड, नाइट्रेट और निकल जैसे भारी धातुओं की मात्रा तय मानकों से कहीं ज्यादा पाई गई। 

यही वजह है कि इन इलाकों के लोग भूजल पर निर्भर नहीं रह सकते और उन्हें पूरी तरह पाइपलाइन के पानी पर निर्भर रहना पड़ता है। अगर पाइपलाइन का पानी भी दूषित हो जाए, तो साफ पानी पाने का कोई और रास्ता नहीं बचता।

H2S Vial Test kit Bhopal water contamination
भोपाल की बस्ती के रहवासियों ने एच₂एस वायल टेस्ट किट से पानी की जांच की | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

निवासियों की आपबीती

भोपाल के शिवनगर में रहने वाले राम बाबू साहा बताते हैं, 

“शुरू-शुरू में तो एकदम काला पानी आता है कि आप भर नहीं सकते, उसमें से बास (बदबू) भी आती है। जानवर को दें तो वो भी नहीं पी पाएगा।”

शिवनगर की निवासी, शकुंतला जायसवाल बताती हैं कि ज्यादातर परिवार 20 रुपये में मिलने वाली 15 लीटर की कुप्पी से काम चलाते हैं, जो पीने के साथ-साथ खाना बनाने और सब्जी धोने के लिए भी इस्तेमाल होती है।

नवाब कॉलोनी की निशा खान और ब्लूमून कॉलोनी के मुश्ताक जैसे कई निवासी पिछले कई दिनों से लूज मोशन और पेट दर्द की शिकायत कर रहे हैं। संगठनों का कहना है कि पूरे-पूरे परिवार दस्त और उल्टी की चपेट में हैं और निजी क्लीनिकों में टाइफाइड के मामले भी बढ़े हैं। सबसे ज्यादा खतरा बच्चों को है, क्योंकि उनका खाना पकाने और दूध उबालने तक में यही पानी इस्तेमाल होता है।

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शिवनगर कॉलोनी से शाम के वक़्त काला और बदबूदार पानी सप्लाई होने की शिकायत आई | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

यह इलाका इतना संवेदनशील क्यों है?

2004 में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को आदेश दिया था कि फैक्ट्री के आसपास रहने वाले लोगों को तुरंत साफ पीने का पानी मुहैया कराया जाए, क्योंकि भूजल जहरीले रसायनों से दूषित पाया गया था।

नवंबर 2012 और जनवरी 2013 में कोर्ट ने दोबारा निर्देश दिए कि प्रभावित इलाकों में पाइपलाइन से पानी पहुंचाया जाए और सीवेज लाइन तथा पेयजल लाइन को अलग-अलग रखा जाए। इसकी निगरानी के लिए एक मॉनिटरिंग कमेटी भी बनाई गई।

वर्ष 2018 में, पाइपलाइन के पानी में मल-संदूषण की शिकायतें मिलने के बाद कोर्ट ने भोपाल नगर निगम को इन इलाकों में सीवेज लाइन बिछाने और ठीक से जल-निकासी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

ढींगरा का कहना है कि जहां पाइपलाइन बिछी भी हैं, वे नालियों के करीब से होकर गुजरती हैं और उनका रखरखाव ठीक से नहीं हुआ, जिससे सीवेज का पानी पेयजल लाइनों में मिल जाता है। शिकायत के बाद भी सिर्फ आश्वासन मिलते रहे कि टेंडर हो गया है, काम जल्द होगा। 

निशा खान का कहना है कि नए कनेक्शन के लिए 2500 रुपये शुल्क और 242 रुपये महीना लिया जा रहा है, जबकि सप्लाई हो रहा पानी अब भी दूषित है।

दूसरी तरफ, जिला पर्यावरण योजना के मुताबिक 2024 में सीवेज नेटवर्क सुधारने पर 500 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, फिर भी शहर के करीब 55% हिस्से में अब भी पूरा सीवेज नेटवर्क नहीं है।

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पुराने भोपाल के लोगों की जांच में बड़ा तालाब के 90% नमूने दूषित पाए गए | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

नगर निगम का पक्ष

नगर निगम भोपाल की जल कार्य शाखा के अधीक्षण यंत्री उदित गर्ग ने दैनिक भास्कर से कहा है कि इस साल करीब 27,000 पानी के सैंपल लिए गए हैं और किसी में भी फीकल कॉलीफॉर्म की पुष्टि नहीं हुई। उनके मुताबिक संगठनों के आरोप निराधार हैं। 

ग्राउंड रिपोर्ट की ओर से नगर निगम आयुक्त संस्कृति जैन और अपर आयुक्त तन्मय वशिष्ठ शर्मा से भी इस मामले पर संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने फोन कॉल का जवाब नहीं दिया।

इन चारों संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट की मॉनिटरिंग कमेटी से मांग की है कि वह तुरंत इलाके का दौरा करे, स्वतंत्र जांच कराए और सीवेज तथा ड्रेनेज को लेकर पहले से दिए गए आदेशों को सख्ती से लागू कराए। 

संगठनों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भागीरथपुरा जैसी स्थिति से पहले ही बचा जा सके।


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Author

  • Shishir Agrawal is the Hindi Editor of Ground Report. However he identifies himself as a young enthusiast passionate about telling tales of unheard. He covers environment and development affairs from the tribal landscape of central India.

    He has also covered issues related to agrarian crisis, wildlife, water, waste and urban development. He has been a recipient of several fellowships and grant. This includes Gandhi Fellowship, Vikas Samvad Media Fellowship and Earth Journalism Network Grant.

    Apart from having long conversations he indulges himself in reading books, watching theater and gazing at flying objects for leisure. He can be reached at shishiragrawl007@gmail.com.

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