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Sonam Wangchuck का क्लाईमेट फास्ट, क्यों उनकी मांगों पर देश का ध्यान नहीं?

Sonam Wangchuck का क्लाईमेट फास्ट, क्यों उनकी मांगों पर देश का ध्यान नहीं?
Sonam Wangchuck का क्लाईमेट फास्ट, क्यों उनकी मांगों पर देश का ध्यान नहीं?

लद्दाख के सोनम वांगचुक(Sonam Wangchuck) 6 मार्च से 21 दिन के आमरण अनशन पर बैठ चुके हैं। वे इसे क्लाइमेट फ़ास्ट कह रहे हैं। उन्होंने यह फैसला लद्दाख को लेकर गृह मंत्रालय से हुई बातचीत के बेनतीजा निकलने पर लिया है। उनके साथ लद्दाख के अलग अलग स्थानों से अन्य 250 लोग भी, इस प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे हैं।


Source- https://twitter.com/MuzzammilAap/status/1769365761028677756/photo/1

क्या है सोनम की मांगें

Sonam Wangchuck की केंद्र सरकार से मांग है कि लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए और लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए।

क्या हुआ 5 मार्च की बैठक में

Leh Apex Body (ABL) और Kargil Democratic Alliance (KDA) की गृह मंत्री अमित शाह के साथ बातचीत हुई। बैठक में अमित शाह ने कहा कि उनकी रोजगार और संस्कृति सम्बन्धी समस्याओं का ध्यान रखा जाएगा, लेकिन सरकार अभी लद्दाख को छठी सूची में शामिल नहीं कर रही है। इसके अगले दिन ही सोनम ने लद्दाख में क्लाइमेट फ़ास्ट शुरू कर दिया है।

क्या है छठी सूची और इससे लद्दाख को क्या है लाभ

छठी अनुसूची राज्यों को (Autonomous District Councils- ADCs) की स्थापना की अनुमति देती है। वर्तमान में छठी अनुसूची में 4 राज्य, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम शामिल हैं।

लद्दाख जब जम्मू कश्मीर राज्य का हिस्सा हुआ करता था तब, लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (Ladakh Autonomous Hill Development Council- LAHDC) जो की एक निर्वाचित संस्था है, को काफी स्वायत्तता प्राप्त थी। अनुच्छेद 370 के हटने के साथ ही जब से लद्दाख एक केंद्र शाषित प्रदेश बना है, तब से लद्दाख की यह स्वायत्तता सीमित हो गई है।

छठी अनुसूची में शामिल किये जाने से लद्दाख को Autonomous District and Regional Councils (ADC, ARC) बनाने का अधिकार प्राप्त होगा। इन परिषदों के गठन से स्थानीय लोगों को आदिवासी क्षेत्रों में प्रशाशन के साथ जंगल, भूमि और आदिवासी संस्कृति की सुरक्षा को लेकर कानून बनाने का अधिकार प्राप्त होगा।

ADC और ARC को अपने नीचे ग्राम परिषद् और लोक अदालत गठित करने का अधिकार मिलेगा। इसके अलावा वे स्थानीय तौर पर कर लगा पाएंगे और स्कूल, स्वास्थ्य आदि का प्रशाशन भी देख पाएंगे।

इसके अलावा राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की भी सिफारिश है कि लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल किया जाए, क्यूं की लद्दाख की 90 फीसदी आबादी जनजातीय है। बालती बेडा , बोटो, ब्रोक्पा, चांगपा , गर्रा, मोन और पुरिग्पा हैं। स्वायत्तता मिलने से इनका लोकतान्त्रिक विकास होगा और सत्ता का विकेन्द्रीकरण संभव हो पाएगा, साथ ही ये अपने आदिवासी संस्कृति को अक्षुण्ण रख पाएंगे।

क्यों झिझक रही है सरकार

सरकार की इस मांग को अस्वीकार करने के पीछे कई तर्क हैं। मसलन छठी अनुसूची के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा जो की एक लंबी प्रक्रिया है। ये बात भी तर्कसंगत है की छथि अनुसूची मात्र पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए है। शेष देश के आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान में पांचवी अनुसूची का प्रावधान है।

इसके अलावा सरकार का ये तर्क भी है कि इससे शासन में जटिलता बढ़ेगी। जबकि सरकार लद्दाख के समावेशन का पहले से ही पर्याप्त प्रयास कर रही है। राज्यसभा में पेश हालिया रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने लद्दाख में जनजातियों का आरक्षण 10 से बढाकर 45 फ़ीसदी कर दिया है।

क्या हो आगे की राह

लद्दाख पर्यावरण, टूरिज्म और जिओपॉलिटिक्स के नजरिये से बहुत ही संवेदनशील क्षेत्र है। जब भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 हटाया था, तब लद्दाख के लोगों ने इसका खुले दिल से स्वागत किया था। अब जब वो सरकार से स्वायत्तता और अपने संस्कृति की रक्षा की मांग कर रहे हैं, ऐसे में आवश्यक है की उनसे बेहतर संवाद स्थापित कर के रास्ता निकला जाए।

अगर पूर्ण राज्य या छठी अनुसूची में शामिल करना सरकार के लिए संभव नहीं है,तो दिल्ली और पुद्दुचेरी जैसी विधायी व्यवस्था उपलब्ध कराना भी एक बेहतर विकल्प हो सकता है, ताकि लद्दाख के निर्णयों में वहां की जनता का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।

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