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क्या आप चूल्हा छोड़कर एलपीजी अपनाने वालों की व्यथा समझ सकते हैं?

LPG Crisis

रमा | दिल्ली | नई दिल्ली के भलस्वा में कई लोग मुझे ‘सिलेंडर वाली मैडम’ के नाम से जानते हैं। एक ऐसा नाम, जो कुछ समय पहले तक भरोसे का प्रतीक था। लेकिन अब यही नाम अधूरी उम्मीदों और शिकायतों का पर्याय बन गया है।

मैं बीते कुछ वर्षों से भलस्वा की बस्तियों में रहने वाले समुदायों के साथ काम कर रही हूं। मैंने उन्हें चूल्हा छोड़कर एलपीजी सिलेंडर अपनाने के लिए प्रेरित किया है और कई परिवारों को प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से जोड़ने में भी सक्रिय भूमिका निभायी है। यह काम केवल जानकारी देने भर का नहीं था। इसमें परिवारों, विशेषकर महिलाओं, के साथ धैर्यपूर्वक संवाद करना, उन्हें स्वच्छ ईंधन के स्वास्थ्य और समय-संबंधी लाभ समझाना, दस्तावेजी प्रक्रियाओं में उनका साथ देना, और सबसे बढ़कर—उनका भरोसा जीतना शामिल था।

समय के साथ यह बदलाव दिखने भी लगा। परिवारों ने धीरे-धीरे जलावन लकड़ी जमा करना बंद किया, पुराने चूल्हे हटाए, और रोजमर्रा का खाना पकाने के लिए एलपीजी लगाने लगे। यह केवल ईंधन का परिवर्तन नहीं, बल्कि उनकी जीवन-शैली में एक बड़ा बदलाव था।

लेकिन हाल के महीनों में एलपीजी संकट ने इस संतुलन को गहराई से प्रभावित किया है। सिलेंडर मिलना मुश्किल हो गया है। जब यह कहीं उपलब्ध भी होता है, तो वह अवैध रूप से 3000 से 4000 रुपये तक में बेचा जा रहा है। भलस्वा के अधिकांश परिवार कचरा बीनकर या अन्य अनौपचारिक कामों से अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं। उनके लिए यह दाम चुकाना नामुमकिन है। उनकी एक दिन की कमाई 250–300 रुपये के बीच है। वहीं, आजकल वे एक किलो गैस के लिए 300–500 रुपये तक चुकाने को मजबूर हैं।

यह संकट विकल्पों के अभाव के चलते और गहरा गया है। जलावन लकड़ी, जो पहले एक सहारा हुआ करती थी, अब न तो आसानी से मिलती है और न ही सस्ती है। दिल्ली में हाल ही में हुई बारिश ने इधर-उधर से लकड़ी इकट्ठा करने की संभावनाओं पर भी पानी फेर दिया है।

इसका असर अब साफ तौर पर दिखने लगा है। जिन लोगों ने एलपीजी को अपनाया था, उनमें निराशा और आक्रोश बढ़ रहा है। कई लोग मुझे फोन करके बताते हैं कि उन्हें इस बदलाव पर पछतावा है, और यह भी याद दिलाते हैं कि मेरी ही पहल पर उन्होंने एलपीजी को अपनाया था। हाल ही में एक महिला ने बताया कि उसके ससुराल वाले अब उसे मेरे नाम से ताना मारते हैं और कहते हैं कि चूल्हे वाली स्थिति ही बेहतर थी।

यह सब सुनना आसान नहीं होता है। लेकिन यह अप्रत्याशित भी नहीं है। भलस्वा जैसी जगह में भरोसा हमेशा एक पेचीदा विषय रहा है। यहां पहले भी कई संगठन काम कर चुके हैं, जिनमें से कुछ अनुभवों को लोग सकारात्मक रूप से याद नहीं करते हैं। ऐसे में, कोई भी नया संकट लोगों के पुराने संदेह को फिर से जीवित कर सकता है।

कुछ परिवारों ने तो वापस अपने गांवों का रुख भी कर लिया है। जो लोग ठेले लगाकर अपना गुजारा करते थे, उनके लिए रोजमर्रा का काम चलाना मुश्किल हो गया है। जो अभी भी यहीं हैं, उनके लिए बढ़ती ईंधन लागत पहले से ही डांवाडोल हालातों में एक और बोझ बन गयी है।

इन परिस्थितियों के बीच, मैं अपनी प्रतिक्रियाओं के बारे में भी लगातार सोचती रहती हूं। हाल ही में जब मेरा अपना सिलेंडर खत्म हुआ, तो मैंने एक ऐसी बेचैनी महसूस की। यह मेरे लिए एक नया और सिखाने वाला अनुभव था। इससे मुझे निजी तौर पर उस असुरक्षा की भावना को समझने का मौका मिला, जिसे भलस्वा के लोग हर दिन जी रहे हैं। शायद यही वजह है कि अब मैं उनके आक्रोश को बेहतर ढंग से सुन और समझ पा रही हूं।

आजकल मेरा अधिकांश समय लोगों के फोन का जवाब देने और उनकी मदद करने में बीतता है। ये छोटे और तात्कालिक प्रयास हैं, लेकिन बड़े मुद्दे का समाधान नहीं हैं।

असली चुनौती अभी बाकी है: जब यह संकट खत्म होगा और आपूर्ति सामान्य होगी, तब लोगों के बीच एलपीजी के लिए फिर से भरोसा पैदा करना आसान नहीं होगा। संभव है कि इसके लिए हमें एक बार फिर, एकदम शुरुआत से विश्वास का ताना-बाना बुनना पड़े।


लेखक रमा, असर में एक परिवर्तन एजेंट के रूप में काम करती हैं और भलस्वा में रहने वाले समुदायों की महिलाओं को खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन के रूप में एलपीजी सिलेंडर को अपनाने में मदद पहुंचाती हैं। उनके पास ज़मीनी कार्यकर्ता के रूप में काम करने का 15 साल का अनुभव है। इससे पहले रमा एक आशा कार्यकर्ता थीं।


यह लेख मूल रूप से आईडीआर हिंदी पर प्रकाशित हुआ है।


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