नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की मुख्य पीठ ने सिंगरौली और सीधी जिले में अडानी समूह को दिए गए कोयला ब्लॉक की पर्यावरण स्वीकृति को लेकर केंद्र सरकार और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। इसके अलावा प्राधिकरण ने अडानी समूह और नेशनल वाइल्डलाइफ बोर्ड को भी नोटिस जारी किया है। एनजीटी चेयर पर्सन न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और जस्टिस अफरोज अहमद की बेंच ने चार सप्ताह में इसका जवाब देने को कहा है।
दरअसल वाइल्डलाइफ एक्टिविस्ट अजय दुबे ने अपनी याचिका में मई 2025 में दी गई पर्यावरण स्वीकृति को चुनौती दी है। उनका कहना है कि यह स्वीकृति नियमों के विपरीत दी गई। याचिका में बताया गया है कि सिंगरौली के घने वन क्षेत्र में लगभग 1500 हेक्टेयर भूमि को कोयला खनन के लिए आवंटित किया गया। अजय दुबे का दावा है कि यह इलाका सामान्य वन क्षेत्र नहीं है बल्कि यहां से हाथियों का आवागमन होता है और इसे एलिफेंट कॉरिडोर के रूप में देखा जाता रहा है।

समिति की आपत्तियों के बावजूद स्वीकृति
वर्ष 2022 में केंद्र सरकार ने सिंगरौली क्षेत्र की इस वन भूमि को अडानी समूह की महान कोल एनर्जी और स्ट्रेटाटेक मिनरल्स को कोयला उत्खनन के लिए आवंटित किया था। इसके बाद कंपनी ने पर्यावरण स्वीकृति के लिए आवेदन किया। इस आवेदन पर एक उच्च स्तरीय समिति बनाई गई जिसने क्षेत्र का निरीक्षण किया।
अप्रैल 2024 में समिति ने अपनी रिपोर्ट दी। रिपोर्ट में खनन गतिविधि के खिलाफ सिफारिश की गई। समिति ने कहा कि क्षेत्र अत्यंत समृद्ध और घना वन है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख था कि इस इलाके से हाथियों का रास्ता गुजरता है और यहां कई वन्य जीवों का निवास है। समिति ने आशंका जताई थी कि खनन शुरू होने पर वन और वन्य जीवों पर गंभीर असर पड़ेगा।
अजय दुबे की याचिका में कहा गया है कि इस रिपोर्ट और सिफारिशों का उचित उल्लेख किए बिना मई 2025 में पर्यावरण स्वीकृति दे दी गई। उनके अनुसार समिति की आपत्तियों को दरकिनार किया गया। स्वीकृति मिलने के बाद क्षेत्र में पेड़ों की कटाई शुरू हुई। इसी के बाद अजय दुबे ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान अजय दुबे की ओर से यह भी कहा गया कि सिंगरौली और सीधी क्षेत्र को अब तक आधिकारिक रूप से एलिफेंट कॉरिडोर घोषित नहीं किया गया है, जबकि इस बारे में पहले अदालतों में और संसद में जानकारी दी जा चुकी है। याचिका में यह तर्क रखा गया कि जब खुद केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि यह क्षेत्र एलिफेंट कॉरिडोर के रूप में प्रस्तावित है, तो अब तक इसे अधिसूचित क्यों नहीं किया गया?

याचिका में क्या कहा गया?
अजय दुबे की ओर से यह भी कहा गया कि यदि किसी क्षेत्र को एलिफेंट कॉरिडोर के रूप में मान्यता दी जाती है, तो उसके आसपास खनन जैसी गतिविधियों पर रोक लगाई जाती है। ऐसे में जिस क्षेत्र में हाथियों के आने जाने का उल्लेख सर्वे रिपोर्ट में है, वहां खनन की अनुमति कैसे दी गई, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
ट्रिब्यूनल ने इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार, राज्य सरकार, अडानी समूह और नेशनल वाइल्डलाइफ बोर्ड से जवाब मांगा है। दो अलग मामलों में नोटिस जारी किए गए हैं। चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करना होगा।
यह मामला केवल एक कोयला ब्लॉक का नहीं है। यह प्रश्न वन संरक्षण, वन्य जीवों के आवागमन और पर्यावरण स्वीकृति की प्रक्रिया से जुड़ा है। अजय दुबे का कहना है कि यदि समिति की रिपोर्ट को नजरअंदाज कर स्वीकृति दी जाती है, तो इससे भविष्य में भी ऐसे फैसलों पर सवाल उठेंगे। दूसरी ओर, अब सरकार और संबंधित पक्षों के जवाब के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि पर्यावरण स्वीकृति किन आधारों पर दी गई थी।
दिसंबर 2025 में जब ग्राउंड रिपोर्ट की टीम धिरौली कोल ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले बासी बेरदह गांव पहुंची थी तो यहां के सिद्धनारायण सिंह खैरवार ने बताया कि उनके गांव में 2 साल पहले हाथी आए थे। उन्होंने कहा कि 4 हाथियों के एक झुंड ने उनके गांव के एक हैण्डपंप और दो मकानों को नुकसान पहुंचाया था।
इस मामले पर दुबे कहते हैं, “सिंगरौली जिले में 46% वन क्षेत्र है। लाखों पेड़ो की बर्बरता से कटाई से न केवल मनुष्य बल्कि वन्य पशुओं के हालात भी बदतर हो गए हैं। अब माननीय एनजीटी से न्याय की उम्मीद है।”
बहरहाल इस मामले की अगली सुनवाई 22 अप्रैल 2026 को होगी। उस दिन ट्रिब्यूनल यह देखेगा कि संबंधित विभागों ने क्या जवाब दिया और क्या आगे किसी अंतरिम आदेश की आवश्यकता है। फिलहाल मामला विचाराधीन है और सभी पक्षों के जवाब का इंतजार है।
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