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मध्य प्रदेश ने दाल उत्पादन का एक चौथाई हिस्सा खोया

Pulses Madhya Pradesh
A farmer checks his Gram crop in the field as production falls across the state. Photo credit: Ground Report

एक समय देश के प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों में गिने जाने वाले मध्य प्रदेश ने सिर्फ एक साल में अपने दाल उत्पादन का लगभग एक चौथाई हिस्सा खो दिया है। राज्य विधानसभा में पेश मध्य प्रदेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 के अनुसार कुल दलहन उत्पादन में 21.90 प्रतिशत की गिरावट आई है। उत्पादन 2023–24 के 7,296 हजार टन से घटकर 2024–25 में 5,698 हजार टन रह गया है। इस गिरावट के पीछे एक गहरी समस्या है जिसकी गवाही ये आंकड़े देते हैं। पौधों को लगने वाली बीमारी और कम दाम के कारण किसान वे फसलें छोड़ रहे हैं जिन्हें उनके परिवार पीढ़ियों से उगाते आ रहे थे।

क्या है समस्या की जड़?

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 बताता है कि दलहन की खेती का कुल रकबा 17.29 प्रतिशत घटकर 4,492 हजार हेक्टेयर रह गया है।

दलहन फसल / संकेतकक्षेत्र में बदलाव (%)उत्पादन में बदलाव (%)
चना-35.83%-38.49%
उड़द-37.11%-32.87%
मसूर-11.89%-26.94%
अरहर-2.58%-7.30%
आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 के अनुसार 2024–25 में मध्य प्रदेश में फसलों के रकबे और उत्पादन में बदलाव।

हालांकि दो फसलें इस गिरावट के बीच अलग रहीं। सर्वे के मुताबिक मूंग के रकबे में 6.01 प्रतिशत और उत्पादन में 5.14 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। मटर के रकबे में 105.43 प्रतिशत और उत्पादन में 77.95 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई है। सर्वे इसे अनुकूल मौसम और फसल विविधीकरण से जोड़ता है। लेकिन ये बढ़ोतरी कुल गिरावट की भरपाई नहीं कर सकी।

गिरावट का असर कहां सबसे ज्यादा है?

मध्य प्रदेश के हाल के रिकॉर्ड को देखें तो स्थिति और साफ होती है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अनुसार 2024–25 में राज्य में 7,480 हेक्टेयर क्षेत्र से कुल 8,111.584 टन दलहन उत्पादन हुआ है। 2014 से 2019 के बीच मध्य प्रदेश देश में उड़द उत्पादन में सबसे आगे था। उस दौरान 14.65 लाख हेक्टेयर में उड़द की खेती हुई और 8.62 लाख टन उत्पादन हुआ, जो देश के कुल उड़द उत्पादन का 33 प्रतिशत था।

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मध्य प्रदेश में एक महिला किसान कटाई के बाद अपने घर के बाहर चना सुखाती हुई। फोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

राज्य के किसान कल्याण और कृषि विकास विभाग ने अपनी वेबसाइट पर माना है कि दलहन का रकबा इसलिए घट रहा है क्योंकि किसान सोयाबीन की ओर जा रहे हैं। हालांकि सर्वे के अनुसार सोयाबीन का रकबा भी 3.10 प्रतिशत घटा है। यह 2023–24 के 6,060 हजार हेक्टेयर से घटकर 2024–25 में 5,872 हजार हेक्टेयर रह गया है।

भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल सिंह का कहना है कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 में चना और उड़द में आई बड़ी गिरावट इसी बदलाव का नतीजा है। उन्होंने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा, “शिवपुरी में पहले चने की बड़ी बेल्ट थी। लोग बड़े पैमाने पर चना उगाते थे। अब स्थिति बदल गई है।”

जहां नीति खुद उलझी हुई दिखती है

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 में चना और उड़द को फिर से बढ़ावा देने के लिए बेहतर बीज और जलवायु के अनुकूल खेती की सलाह दी गई है। साथ ही दालों को ज्यादा पानी लेने वाली फसलों जैसे गेहूं और धान के विकल्प के रूप में पेश किया गया है। अनिल सिंह इस दिशा से सहमत हैं, लेकिन उनका कहना है कि सरकार के आयात फैसले इन योजनाओं को कमजोर कर देते हैं।

वे कहते हैं, “एक तरफ सरकार कहती है दाल उगाओ, गेहूं मत उगाओ। दूसरी तरफ दाल का आयात कर लेती है।”

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मध्य प्रदेश के एक खेत में सूखती चने की फसल। बीमारी और कम दाम के कारण किसान दालों से दूरी बना रहे हैं। फोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

सिंह के मुताबिक जब अप्रैल-मई में ग्रीष्मकालीन मूंग बाजार में आती है, तब तक सरकार कई बार आयात का फैसला कर चुकी होती है। विदेश से आने वाली दाल के कारण कीमतें गिर जाती हैं और किसान सही दाम नहीं पा पाते। यह स्थिति सर्वे के उस लक्ष्य के खिलाफ है जिसमें दालों को बढ़ावा देकर किसानों की आय स्थिर करने की बात कही गई है।

जब खरीद से बस काम नहीं बनता

सर्वे के अनुसार रबी 2024–25 में 29,658 किसानों से 98,979 मीट्रिक टन चना खरीदा गया, जिसकी कीमत 559.23 करोड़ रुपये थी। इसी अवधि में 94,698 किसानों से कुल 1,422.50 करोड़ रुपये की 2.12 लाख मीट्रिक टन मसूर की खरीद की गई।

ग्रीष्मकालीन फसलों में 2.75 लाख किसानों से 7.72 लाख मीट्रिक टन मूंग की खरीद 6,706.27 करोड़ रुपये में हुई। वहीं 5,952 किसानों से 8,778 मीट्रिक टन ग्रीष्मकालीन उड़द की खरीद 64.96 करोड़ रुपये में दर्ज की गई।

अनिल सिंह का कहना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था जमीन पर सही तरीके से काम नहीं करती। उनके मुताबिक सरकार हर साल पंजीकरण और घोषणा तो करती है, लेकिन खरीद देर से शुरू होती है। वे कहते हैं, “किसान इंतजार नहीं कर सकता। उसे खर्च चलाने के लिए पहले ही कम दाम पर फसल बेचनी पड़ती है। उसके पास भंडारण की सुविधा नहीं होती।”

सर्वे में भावांतर भुगतान योजना का भी जिक्र है, जिसे दालों के लिए एक सहायक व्यवस्था बताया गया है। सिंह मानते हैं कि ऐसी योजनाएं काम कर सकती हैं, लेकिन जब आयात के कारण कीमतें बहुत नीचे चली जाती हैं तो कोई भी फॉर्मूला नुकसान की भरपाई नहीं कर पाता। उनका कहना है, “अगर सरकार सच में किसानों को लाभकारी दाम देना चाहती है तो उसे खरीद मजबूत करनी होगी और आयात पर रोक लगानी होगी। तभी दाल की खेती बच सकती है।”

पिछले साल ग्राउंड रिपोर्ट ने रायसेन जिले के ओबेदुल्लागंज के 70 वर्षीय किसान अनोखीलाल नागर से बात की थी। वे 55 साल से नौ एकड़ जमीन पर खेती कर रहे हैं। विल्ट रोग, जो एक फफूंद जनित बीमारी है और एक ही मौसम में पूरी फसल खराब कर सकती है, ने उन्हें अरहर और मसूर की खेती हमेशा के लिए छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

इन बातों से यह स्पष्ट है कि प्रदेश में दाल के उत्पादन के गिरने के कारण फसलों को होने वाला नुकसान और दाम की अनिश्चितता है। भारत दाल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने का लक्ष्य रखता है। ऐसे में प्रमुख कृषक प्रदेश में इसके उत्पादन में होने वाली कमी चिंताजनक है। विशेषज्ञ इसके लिए आयात नीतियों में बदलाव और पहले से मौजूद व्यवस्था जैसे न्यूनतम समर्थन मूल्य में खरीद की व्यवस्था को दुरुस्त करने का सुझाव देते हैं।


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  • Wahid Bhat is an environmental journalist with a focus on extreme weather events and lightning. He reports on severe weather incidents such as floods, heatwaves, cloudbursts, and lightning strikes, highlighting their growing frequency and impact on communities.

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