भोपाल और सीहोर जिलों में सहकारी समितियों से लिए गए फसल ऋण की अदायगी को लेकर किसानों की चिंता बढ़ रही है। कई किसानों को समिति की ओर से लोन जमा करने के संदेश मिल रहे हैं, जिनमें अंतिम तारीख 28 मार्च बताई गई है। भोपाल जिले की हुजूर तहसील के भैरूपुरा गांव के किसान नारायण सिंह को भी ये संदेश मिल चुका है। उनकी चिंता है कि इस समय गेहूं की फसल खेतों में हरी खड़ी है। कटाई अभी शुरू नहीं हुई है और बिक्री से भुगतान मिलने में समय लगेगा। ऐसे में तय समय सीमा तक ऋण चुकाना उनके लिए व्यावहारिक नहीं है।
नारायण का सहकारी समिति से लिया गया ऋण लगभग 1 लाख रुपये से थोड़ा अधिक रहता है और इस साल भी लगभग इतनी ही राशि का लोन है। वे बताते हैं कि पिछले साल समय पर भुगतान करने में उन्हें कठिनाई आई थी क्योंकि फसल तैयार नहीं थी। मजबूरी में उन्हें इधर-उधर से पैसा जुटाना पड़ा और अतिरिक्त ब्याज देना पड़ा। उनका कहना है कि, “जब फसल से आय ही नहीं हुई तो किसान समय पर पैसा कहां से लाए।”
शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर अल्पकालीन कृषि ऋण
मध्य प्रदेश में प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों के माध्यम से किसानों को अल्पकालीन फसल ऋण शून्य प्रतिशत ब्याज पर दिया जा रहा है। अप्रैल 2024 से 17 जनवरी 2025 तक इस योजना के तहत 18,392 करोड़ रुपये का ऋण वितरित किया गया है। प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति, टीलाखेड़ी, भोपाल के प्रबंधक राकेश वर्मा के अनुसार ऋण जमीन के रकबे के आधार पर स्वीकृत किया जाता है।

वर्मा के अनुसार, एक एकड़ पर अधिकतम 35,300 रुपये की सीमा है। इसमें लगभग 75 प्रतिशत राशि नकद दी जाती है और 25 प्रतिशत खाद और बीज के रूप में समायोजित होती है। किसान को आवेदन के साथ भूमि संबंधी दस्तावेज, मसलन ऋण पुस्तिका दिखानी होती है। यदि किसान निर्धारित अंतिम तारीख तक ऋण जमा कर देता है तो उसे शून्य प्रतिशत ब्याज का लाभ मिलता है। सामान्य तौर पर फसल ऋण की अंतिम तिथि 28 मार्च है। समय सीमा के बाद भुगतान करने पर लगभग 10.5 प्रतिशत ब्याज लगता है। लंबे समय तक भुगतान न करने पर किसान डिफॉल्टर की श्रेणी में आ सकता है।
नारायण भी इस योजना के हितग्राही हैं। सहकारी समिति की तय सीमा के अनुसार एक एकड़ पर अधिकतम 35,300 रुपये तक का अल्पकालीन फसल ऋण मिल सकता है। तो 5 एकड़ पर उसकी कुल सीमा लगभग 1,76,500 रुपये बनेगी।

कुल ऋण सीमा का लगभग 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा नकद दिया जाता है और करीब 25 प्रतिशत खाद-बीज के लिए रखा जाता है। यानी नारायण को करीब 1.25 लाख रुपये नकद मिलेंगे और शेष लगभग 40 से 45 हजार रुपये खाद-बीज के लिए निर्धारित रहेंगे। नकद राशि एक बार में मिलती है, जबकि खाद-बीज जरूरत के अनुसार दोनों सीजन में लिया जा सकता है।
अब ऋण का चक्र समझते हैं
सहकारी समिति साल में दो फसल सीजन मानती है, खरीफ और रबी। लेकिन अधिकांश किसान इसे एक ही सालाना चक्र की तरह देखते हैं। क्योंकि लोन का जो हिस्सा उन्होंने नगद के तौर पर लिया था उसकी अदायगी, 28 मार्च तक करनी होती है। यदि नारायण 28 मार्च तक पूरा बकाया जमा कर देते हैं तो उन्हे शून्य प्रतिशत ब्याज का लाभ मिलता है। यानी उन पर ब्याज नहीं लगेगा।
अब नारायण ने यह पैसा नवंबर में गेहूं की बुवाई के लिए इस्तेमाल किया। अप्रैल में उनकी फसल कटेगी। औसतन मान लें कि उन्हें 20 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन मिला। 5 एकड़ में कुल 100 क्विंटल गेहूं हुआ। यदि उन्होंने यह गेहूं मंडी में समर्थन मूल्य पर बेचा और मान लें औसत कीमत 2,500 रुपये प्रति क्विंटल रही, तो उनकी कुल बिक्री राशि 2,50,000 रुपये हुई।
जब मंडी में भुगतान उनके खाते में आता है तो वह समिति को बता सकते है कि लोन की राशि उसी भुगतान में से काट ली जाए। सहमति के आधार पर समिति या बैंक बकाया ऋण राशि समायोजित कर देते हैं। मान लें कि उनका कुल बकाया 1.76 लाख रुपये था, तो यह राशि मंडी भुगतान में से समायोजित हो जाएगी और बाकी लगभग 74 हजार रुपये उनके खाते में बचेंगे।
ऋण चुकता होने के बाद अगली बार फिर उन्हे सीमा के अनुसार नया ऋण मिल सकता है। जब उनका खाता क्लियर हो जाता है तो कुछ दिनों के भीतर नई नकद राशि जारी कर दी जाती है और खाद बीज की सुविधा फिर उपलब्ध हो जाती है।
खरीफ सीजन में लिए गए खाद बीज की कुछ देनदारी की तारीख जून तक भी हो सकती है, लेकिन मुख्य शर्त यही रहती है कि निर्धारित समय सीमा के भीतर कुल बकाया समायोजित हो जाए। इसलिए व्यावहारिक रूप से किसान फसल बेचने के बाद ही लोन क्लियर करते हैं।
पूरे चक्र का सार यह है कि जमीन के आधार पर सीमा तय होती है, नकद और खाद बीज का अनुपात पहले से तय रहता है, 28 मार्च तक भुगतान करने पर ब्याज शून्य रहता है, और फसल बिक्री के बाद मंडी भुगतान से ऋण समायोजित किया जा सकता है। समय सीमा चूकने पर ब्याज लगता है और डिफॉल्टर होने खतरा भी बन जाता है।
ओवरड्यू होने पर असर
किसानों का कहना है कि यदि समय पर भुगतान नहीं हुआ तो केवल ब्याज का बोझ नहीं बढ़ता, बल्कि आगे की खेती भी प्रभावित होती है। डिफॉल्टर घोषित होने पर सहकारी समिति से खाद और बीज मिलने में दिक्कत आ सकती है। ऐसे में किसान को निजी बाजार से ऊंची कीमत पर सामग्री खरीदनी पड़ती है, जिससे लागत बढ़ जाती है।

भैरूपुरा गांव के ही किसान जवाहर सिंह के परिवार पर सहकारी समिति का लगभग 3.5 लाख रुपये का ऋण है। यह राशि उनके पिता, बड़े भाई और उनके नाम पर मिलाकर है। परिवार के पास करीब 9 एकड़ जमीन है और इस वर्ष भी ऋण की राशि लगभग समान है। वे बताते हैं कि पिछले साल 28 मार्च की समय सीमा के कारण उन्हें व्यापारी से पैसा उठाकर भुगतान करना पड़ा था। उनका कहना है कि यदि कटाई अप्रैल में होती है और फसल का भुगतान बाद में मिलता है, तो मार्च में ऋण चुकाना कठिन हो जाता है।
इस मामले पर भारतीय किसान संघ से जुड़े किसान नेता अखिलेश मीणा का कहना है कि 31 मार्च की वित्तीय वर्ष आधारित समय सीमा खेती के चक्र से मेल नहीं खाती। उनके अनुसार गेहूं की कटाई अप्रैल में होती है और मंडी में बिक्री के बाद फसल का भुगतान उसके बाद मिलता है। ऐसे में ऋण चुकाने की तारीख स्थायी रूप से मई में तय की जानी चाहिए ताकि हर साल की अनिश्चितता खत्म हो सके।

पहले भी बढ़ाई जाती रही है ऋण चुकाने की अवधि
नारायण का कहना है कि, शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल के दौरान ऋण चुकाने की समय सीमा बढ़ाई जाती रही है, लेकिन हर बार अंतिम समय तक स्पष्टता नहीं होती। उनका मांग है कि इस बार सरकार पहले से स्पष्ट निर्णय ले। साल 2025 में धार जिले की कुक्षि विधानसभा क्षेत्र के विधायक, सुरेंद्र सिंह बघेल ने भी मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर 28 मार्च की अंतिम तारीख को बढ़ाकर 30 अप्रैल करने की मांग की थी।
पत्र में कहा गया था कि गेहूं की फसल अप्रैल में कटती है और भुगतान मिलने में समय लगता है, इसलिए किसानों को राहत दी जानी चाहिए। किसानों का कहना है कि हर साल आखिरी समय में निर्णय होने से भ्रम की स्थिति बनती है।

इस संबंध में बैरसिया ब्लॉक की गुनगा सहकारिता समिति के प्रबंधक बबलू मेहरा ने कहा कि अंतिम तारीख राज्य सरकार के निर्देश पर तय होती है और समितियां उसी के अनुसार काम करती हैं। किसानों को मोबाइल संदेश के माध्यम से भी सूचित किया जा रहा है ताकि वे पेनल्टी से बच सकें।
फिलहाल किसान चाहते हैं कि फसल की वास्तविक स्थिति को देखते हुए लोन अदायगी की तारीख पर पुनर्विचार किया जाए और एक स्थायी व्यवस्था बनाई जाए, जिससे हर साल की असमंजस की स्थिति समाप्त हो सके।
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