लोकसभा में केंद्र सरकार के एक जवाब के अनुसार, 2023 की तुलना में 2025 में सर्पदंश से होने वाली मौतें 135.5 फीसदी तक बढ़ी हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 में 183 मौतें दर्ज हुई थीं, जो 2024 में 370 और 2025 में बढ़कर 431 हो गईं हैं।
यह जानकारी पर्यावरण राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में एक लिखित जवाब में दी। यह प्रश्न कांग्रेस सांसद डॉ. प्रभा मल्लिकार्जुन की ओर से पूछा गया था, जिसमें मानव और सांप के बीच बढ़ते टकराव और उसके कारणों पर भी सवाल किया गया था।
क्या कहता है राज्यवार आंकड़ा
राज्यों में कर्नाटक में सबसे अधिक मौतें दर्ज की गई हैं। 2025 में यहां 157 मौतें हुईं, जबकि 2024 में यह संख्या 101 थी। अगर 2025 के आंकड़े देखे जाएं तो पश्चिम बंगाल (63), तमिलनाडु (27), झारखंड (27), मध्य प्रदेश (27) और महाराष्ट्र (25) जैसे राज्यों में भी ऐसे मामलों की संख्या अधिक रही है।
मध्य प्रदेश में भी सांप के काटने से मौतों के आंकड़ों में बदलाव देखा गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 और 2024 में यहां 12-12 मौतें दर्ज की गईं, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 27 हो गई।
केंद्र सरकार ने राज्यों को सलाह दी है कि वे सांप के काटने के मामलों को अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य कानूनों के तहत अधिसूचित रोग घोषित करें।
दरअसल, एपिडेमिक डिजीज एक्ट, 1897 की धारा 2 राज्य सरकारों को विशेष उपाय लागू करने का अधिकार देती है। इसके तहत वे किसी बीमारी को अधिसूचित बीमारी घोषित कर सकते हैं। इसके तहत डॉक्टरों को ऐसे मामलों की जानकारी सरकार को देना जरूरी होता है। इन मामलों की निगरानी इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलेंस प्रोग्राम (IDSP) के जरिए की जाती है।
अब तक कर्नाटक, तमिलनाडु, मेघालय, नागालैंड, त्रिपुरा, केरल, महाराष्ट्र और ओडिशा ने इसे अधिसूचित रोग घोषित किया है।
सरकार ने अपने जवाब में कहा कि वन्यजीवों का संरक्षण और प्रबंधन मुख्य रूप से राज्यों की जिम्मेदारी है। साथ ही 1972 के वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत प्रबंधन के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
विशेषज्ञों की नजर में आंकड़े संदेहास्पद
सरकार के मुताबिक यह आंकड़े राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम के तहत दर्ज किए जाते हैं। इसी प्रणाली के जरिए सांप के काटने से जुड़े मामलों और मौतों की निगरानी की जाती है।
हालांकि, विशेषज्ञ इन आंकड़ों पर सवाल उठाते हैं। संरक्षण जीवविज्ञानी और स्नेक हब के संस्थापक विवेक शर्मा के अनुसार, “मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य में इतनी कम मौतें होना संभव नहीं है।” विवेक शर्मा का यह भी कहना है कि सरकारी आंकड़े जमीनी स्थिति से मेल नहीं खाते। “एक जिले के अस्पताल में ही एक सीजन में 15 से 20 मौतें हो जाती हैं। अगर देशभर के जिलों को जोड़ें तो संख्या कहीं ज्यादा होगी,” उन्होंने कहा।
उन्होंने कहा कि कई मामलों में मौतें आधिकारिक आंकड़ों में दर्ज नहीं हो पातीं। “अक्सर मरीज इलाज के बाद घर लौट जाते हैं और बाद में उनकी मौत हो जाती है। लेकिन ऐसे मामलों में मृत्यु की वजह स्नेक बाइट से हुई मौत के रूप में दर्ज नहीं किया जाता। कई बार लोग अस्पताल तक पहुंचते ही नहीं या पोस्टमार्टम नहीं कराया जाता, जिससे ये मौतें रिकॉर्ड से बाहर रह जाती हैं। यह उसी तरह है जैसे कोविड के दौरान भी कई मौतें आधिकारिक आंकड़ों में शामिल नहीं हो पाई थीं,” उन्होंने कहा। ।
विवेक शर्मा कहते हैं, “यह संभव ही नहीं है कि पूरे देश में सिर्फ 431 मौतें हुई हों। ज्यादातर शोध में हर साल 50 से 60 हजार मौतों का अनुमान बताया जाता है और वह भी अंडर रिपोर्टेड माना जाता है।”
शर्मा के तर्क की तस्दीक eLife जर्नल में प्रकाशित “Trends in snakebite deaths in India from 2000 to 2019” अध्ययन के आंकड़े करते हैं। इस अध्ययन के अनुसार, भारत में वर्ष 2000 से 2019 के बीच लगभग 12 लाख (1.2 मिलियन) लोगों की मौत सांप के काटने से हुई है। यह औसतन करीब 58,000 मौतें प्रति वर्ष के बराबर है।
हालांकि उन्होंने कहा कि, सभी मामलों को एक जैसे तरीके से दर्ज करना आसान नहीं है। “कई जगह रिपोर्टिंग सिस्टम कमजोर है। कई मामले स्वास्थ्य व्यवस्था तक पहुंचते ही नहीं। ग्रामीण इलाकों और निजी स्तर पर हुई मौतें अक्सर दर्ज नहीं होतीं।” इससे आंकड़े वास्तविक संख्या से कम दिखाई देते हैं।
जलवायु परिवर्तन बढ़ाता जोखिम
शर्मा, मानव और सांप के बीच बढ़ते टकराव को लेकर उन्होंने जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय बदलाव को एक कारक माना। उन्होंने कहा कि कुछ क्षेत्रों में बारिश के पैटर्न में बदलाव और सूखे की स्थिति के कारण सांपों के आवास बदल रहे हैं, जिससे नए इलाकों में उनकी मौजूदगी बढ़ सकती है।
इस तरह के बदलावों को हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन भी समर्थन देता है। नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट में प्रकाशित एक शोध में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण सांपों के वितरण और उनके हॉटस्पॉट में बदलाव हो रहा है, जिससे मानव-सांप टकराव के नए क्षेत्र उभर सकते हैं।
सरकार ने भी इस मुद्दे पर 2021 में मानव और वन्यजीव टकराव से निपटने के लिए एक सलाह जारी की थी। इसमें विभिन्न विभागों के बीच समन्वय, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और त्वरित प्रतिक्रिया टीम बनाने जैसे सुझाव दिए गए हैं।
इसके अलावा, 2030 तक सांप के काटने से होने वाली मौतों को आधा करने के लक्ष्य के साथ एक राष्ट्रीय कार्ययोजना भी तैयार की गई है। यह योजना स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा अन्य मंत्रालयों के साथ मिलकर बनाई गई है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत राज्य और जिला नोडल अधिकारियों के माध्यम से सर्पदंश रोकथाम के स्वास्थ्य उपाय लागू किए जा रहे हैं। NAPSE में निगरानी को प्रमुख माना गया है, ताकि समस्याओं की पहचान कर समय पर कार्रवाई हो सके। इसमें मानव, वन्यजीव और पशु स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं की संयुक्त निगरानी और राज्य स्तर पर कार्ययोजना लागू करने की व्यवस्था तय की गई है।
इसके अलावा मानसून के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सर्पदंश की रोकथाम और उपचार के उपायों को पंचायत और थाना स्तर तक विस्तार देने पर जोर दिया है।
इस पर विवेक शर्मा का कहना है कि जागरूकता और शिक्षा पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। “अगर स्कूल स्तर पर ही बच्चों को इसके बारे में पढ़ाया जाए तो ज्यादा प्रभावी होगा,” उन्होंने कहा।
कुल मिलाकर, सरकारी आंकड़े जहां एक तरफ सांप के काटने से मौतों की संख्या में बढ़ोतरी दिखाते हैं, वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक स्थिति को समझने के लिए डेटा संग्रह और रिपोर्टिंग व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है।
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