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किन बदलावों से गुजर रहे हैं भारत में आने वाले प्रवासी पक्षी?

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ग्राउंड रिपोर्ट के Mind Your Earth पॉडकास्ट से जुड़िए और प्रवासी पक्षियों की असाधारण दुनिया की यात्रा पर हमारे साथ उड़ान भरिए। इस एपिसोड में हमारे साथ हैं डॉ. अबी तमीम वनक, जो Centre for Policy Design, ATREE के निदेशक हैं। सवाना इकोसिस्टम और मानव–वन्यजीव संबंधों के विशेषज्ञ डॉ. वनक उन जीवों की ज़िंदगी पर गहरी समझ साझा करते हैं, जिनकी उड़ानें सीमाओं को नहीं मानतीं।

जानिए कि हर साल लाखों पक्षी हजारों किलोमीटर की जोखिमभरी यात्राएं क्यों करते हैं और कैसे ये यात्राएं महाद्वीपों को एक जटिल जीवन-तंत्र से जोड़ती हैं।


डॉ. वनक बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियां सदियों पुराने प्रवासन मार्गों को कैसे बदल रही हैं। सूखते वेटलैंड्स, बदलते मौसम और घटते ठहराव स्थल पक्षियों को अपने यात्रा, प्रजनन और विश्राम के तरीकों में अभूतपूर्व बदलाव के लिए मजबूर कर रहे हैं।

डॉ वनक ने बताया कि, देश के वेटलैंड्स, नदियां, झीलें, कृषि क्षेत्र और ग्रासलैंड भी प्रवासी पक्षियों के लिए जरूरी हैं। दुर्भाग्य से इनमें से सबसे ज्यादा उपेक्षित ग्रासलैंड रहे हैं। विकास परियोजनाओं, औद्योगिक विस्तार और शहरीकरण के कारण हर साल हजारों हेक्टेयर घास के मैदान खत्म हो रहे हैं। इसका सीधा असर उन पक्षियों पर पड़ता है जो इन्हीं इलाकों पर निर्भर हैं।

प्रवासी पक्षियों के संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका सबसे अहम है। भरतपुर इसका स्पष्ट उदाहरण है। यह एक मानव निर्मित वेटलैंड है, जिसे ऐतिहासिक रूप से शिकार के लिए बनाया गया था। आज वही क्षेत्र राष्ट्रीय उद्यान और विश्व धरोहर स्थल है। यहां पक्षियों की मौजूदगी से स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा होता है। खेतों को पोषक तत्वों से भरपूर पानी मिलता है और पर्यटन से रोजगार पैदा होता है। यही कारण है कि समुदाय संरक्षण में साझेदार बनता है।

देश के कई हिस्सों में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां गांवों ने प्रवासी पक्षियों को मेहमान की तरह स्वीकार किया है। कुछ स्थानों पर लोग त्योहारों के समय भी शोर से बचते हैं ताकि पक्षियों को परेशानी न हो। यह संरक्षण का सबसे टिकाऊ मॉडल है, जहां लाभ और जिम्मेदारी दोनों साझा होती हैं।

शहरी इलाकों में स्थिति अलग है। भोपाल, इंदौर, दिल्ली जैसे शहरों में वेटलैंड्स पर अतिक्रमण, सीवेज और औद्योगिक प्रदूषण का दबाव लगातार बढ़ रहा है। आमतौर पर लोग अपने आसपास मौजूद पक्षियों तक को पहचान नहीं पाते। इसी कारण संरक्षण के बजाय अनजाने में नुकसान हो जाता है।

एक गंभीर समस्या है पक्षियों को खाना खिलाना। तेलीय स्नैक्स, भुजिया, पकोड़े या नियमित दाना डालना वैज्ञानिक रूप से गलत है और कई मामलों में कानून के खिलाफ भी। इससे कुछ चुनिंदा प्रजातियों की संख्या असामान्य रूप से बढ़ जाती है और बाकी प्रजातियों के लिए जगह नहीं बचती। यह प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ता है। पक्षियों को बचाने का तरीका उन्हें खाना देना नहीं, बल्कि उनका प्राकृतिक आवास सुरक्षित रखना है।

प्रवासी पक्षी केवल सुंदरता नहीं बढ़ाते, वे पूरे इकोसिस्टम का हिस्सा हैं। कुछ प्रजातियां जल वनस्पतियों को नियंत्रित करती हैं, कुछ कीटों की संख्या संतुलित रखती हैं और कुछ मिट्टी को हवा देने का काम करती हैं। शिकारी पक्षियों के लिए यही पक्षी भोजन भी होते हैं। जब इनकी संख्या घटती है, तो इसका असर धीरे-धीरे पूरे पर्यावरण पर दिखने लगता है।

जलवायु परिवर्तन ने प्रवासन के समय और मार्ग दोनों को प्रभावित किया है। कई पक्षी अब देर से निकलते हैं या अपेक्षित स्थानों पर नहीं पहुंचते। तापमान, जल उपलब्धता और भोजन में बदलाव इसके मुख्य कारण हैं। इसका समाधान आसान नहीं है, लेकिन निगरानी, शोध और नीति स्तर पर समन्वय जरूरी है।

इस संदर्भ में एक उल्लेखनीय उदाहरण अमूर फाल्कन का है। यह दुनिया के सबसे छोटे बाज़ों में से एक है, जो साइबेरिया से उड़कर भारत के उत्तर–पूर्वी हिस्सों में कुछ समय रुकता है और फिर बिना रुके दक्षिण अफ्रीका तक जाता है। सैटेलाइट टैगिंग से वैज्ञानिकों को पहली बार इसकी पूरी यात्रा समझ में आई। यह दिखाता है कि सही शोध किस तरह संरक्षण की दिशा तय कर सकता है।

अब सवाल आता है कि हम उन पक्षियों की चिंता क्यों करें जिन्हें हम शायद कभी न देखें? क्योंकि उनकी यात्राएं इकोसिस्टम को चलाए रखती हैं, कीट नियंत्रण करती हैं, पौधों के परागण में मदद करती हैं और पृथ्वी के स्वास्थ्य का संकेत देती हैं। उनका अस्तित्व हमारे अस्तित्व से जुड़ा है—इसलिए उनका संरक्षण हम सबकी जिम्मेदारी है।

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