Skip to content

15 साल बाद अमेरिका ने जलवायु खतरा तय करने वाला अहम फैसला पलटा

यह ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ के डेली मॉर्निंग पॉडकास्ट का एपिसोड-141 है। शुक्रवार 13 फरवरी को देश भर की पर्यावरणीय ख़बरों के साथ पॉडकास्ट में जानिए अमेरिका द्वारा 15 साल बाद जलवायु खतरे से जुड़ा अहम फैसला पलटने के बारे में।


मुख्य सुर्खियां

टाइगर रिजर्व से जुड़ी एक क्लियरेंस लिस्टिंग सरकारी पोर्टल से हटा दी गई है, क्योंकि पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इसे संरक्षण के उद्देश्य के खिलाफ बताया। इस मामले ने दिखाया कि विकास परियोजनाओं और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन पर फिर सवाल उठ रहे हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कई जगह रेरा होमबायर्स की बजाय बिल्डर्स को फायदा पहुंचा रहा है और लोगों को राहत नहीं मिल रही। अदालत ने राज्यों से रेरा की संरचना और कामकाज पर दोबारा सोचने की जरूरत बताई है।


जनवरी में नई सीपीआई सीरीज के अनुसार महंगाई दर 2.75 प्रतिशत रही है और इसमें खाने के खर्च का वेटेज कम किया गया है। नए आंकड़ों में ई कॉमर्स और ओटीटी जैसे आधुनिक खर्च शामिल किए गए हैं ताकि उपभोक्ता पैटर्न बेहतर दिख सके।


दिल्ली में ट्रैफिक पुलिस की भारी कमी के कारण सड़कों पर जाम और नियमों का पालन कराना मुश्किल हो रहा है। करीब 6100 पदों में से कम लोग तैनात हैं और रोजाना छुट्टी, वीआईपी ड्यूटी और अन्य कामों से स्थिति और कमजोर हो जाती है।


बडगाम में नया फ्लड स्पिल चैनल बनाने की कोई योजना फिलहाल सरकार ने नहीं बनाई है और प्रशासन का कहना है कि मौजूदा ढांचे को बेहतर करना ही प्राथमिकता है। सरकार ने साफ किया कि नई परियोजना को लेकर जो खबरें चल रही थीं, वे सही नहीं हैं और अभी ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है।


जम्मू कश्मीर सरकार ने बाढ़ से खराब हुई सड़कों की मरम्मत के लिए करीब 1000 करोड़ रुपये की मांग की है। भारी बारिश और आपदाओं से कई इलाकों में सड़क नेटवर्क प्रभावित हुआ है, जिससे कनेक्टिविटी बहाल करना बड़ी चुनौती बन गई है।


अमेरिका में ईपीए ने 2009 की उस वैज्ञानिक रिपोर्ट को वापस ले लिया है जिसके आधार पर ग्रीनहाउस गैसों पर नियम बनाए जाते थे। इस फैसले से कई क्लाइमेट नियम कमजोर पड़ सकते हैं और पर्यावरण समूहों ने इसे जलवायु नीति के लिए बड़ा झटका बताया है।


विस्तृत चर्चा

अमेरिका में बदली जलवायु नीति

अमेरिका की एनवायरमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी ने 2009 में जिन एंडेंजरमेंट फाइंडिंग्स के जरिए कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा माना था, उन्हें अब वापस लेने का फैसला किया गया है। इन कानूनी निष्कर्षों के आधार पर पिछले दो दशकों से वाहनों और पावर प्लांट्स के उत्सर्जन पर सख्त नियम लागू थे और क्लीन एयर एक्ट के तहत संघीय कार्रवाई संभव हो पाती थी।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा करते हुए कहा कि ओबामा दौर की ये फाइंडिंग्स तथ्यात्मक और कानूनी रूप से कमजोर थीं और इन्हें खत्म करना अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी डीरेगुलेटरी कार्रवाई होगी। प्रशासन ने 2012 से आगे लागू किए गए कई ग्रीनहाउस गैस एमिशन मानकों को हटाने की भी बात कही है, हालांकि कार्बन मोनोऑक्साइड, लेड और ओजोन जैसे पारंपरिक प्रदूषकों पर नियंत्रण जारी रहेगा।

विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम अमेरिका की जलवायु नीति में बड़ा बदलाव है, क्योंकि 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने ही ईपीए को ग्रीनहाउस गैसों को नियंत्रित करने का अधिकार दिया था और उसी के बाद 2009 की एंडेंजरमेंट फाइंडिंग्स अस्तित्व में आई थीं। अब इस फैसले को अदालत में कानूनी चुनौती मिलने की संभावना है और प्रशासन को यह साबित करना होगा कि इतनी पुरानी और विज्ञान आधारित नीति को बदलने के लिए सही प्रक्रिया अपनाई गई है।

इस बीच ट्रंप प्रशासन ने कोयला संयंत्रों की उम्र बढ़ाने के लिए 175 मिलियन डॉलर खर्च करने और कुछ क्लीन एनर्जी फंडिंग्स रद्द करने जैसे कदम भी उठाए हैं, जिन्हें पर्यावरण समूह जलवायु कार्रवाई को कमजोर करने की कोशिश मान रहे हैं। आने वाले समय में यह मुद्दा केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अदालतों और अंतरराष्ट्रीय जलवायु मंचों पर भी इसकी गूंज सुनाई दे सकती है।

जलवायु संकट में ढहता ढांचा

जम्मू कश्मीर में मुद्दा केवल सड़कों की मरम्मत का नहीं है, बल्कि यह एक गहरे इंफ्रास्ट्रक्चर संकट की ओर इशारा करता है जो पिछले वर्ष सितंबर में आई फ्लैश फ्लड्स के बाद खुलकर सामने आया। तेज बारिश और अचानक आई बाढ़ ने कई जिलों में सड़क नेटवर्क को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया। कई जगह सड़कें बह गईं, रिटेनिंग वॉल गिर गईं और कुछ हिस्सों में मार्ग पूरी तरह समाप्त हो गए। इसका सीधा असर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ा। गांव शहरों से कट गए, आपात सेवाएं बाधित रहीं, सप्लाई चेन प्रभावित हुई और पर्यटन व स्थानीय व्यापार को भारी नुकसान झेलना पड़ा।

सरकार ने अब स्थायी समाधान के लिए 1000 करोड़ रुपये का प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजा है। जम्मू कश्मीर के उपमुख्यमंत्री सुरिंदर कुमार चौधरी ने विधानसभा में स्पष्ट किया कि अभी तक केवल अस्थायी मरम्मत कार्य किए गए हैं ताकि यातायात और संपर्क तुरंत बहाल हो सके। लेकिन जमीनी स्तर पर संरचनात्मक क्षति कहीं अधिक गहरी है। कई ढांचे कमजोर हो चुके हैं और यदि समय रहते व्यापक पुनर्निर्माण नहीं हुआ तो अगली बाढ़ में स्थिति दोबारा गंभीर हो सकती है।

तत्काल कार्यों के लिए फील्ड एजेंसियों को 25 करोड़ रुपये की प्राथमिक राशि दी गई है, ताकि संवेदनशील और महत्वपूर्ण बिंदुओं पर काम तेजी से शुरू हो सके। उपमुख्यमंत्री ने बताया कि 24 पुलों की बहाली प्रक्रिया की निगरानी स्वयं की गई है। ये पुल केवल निर्माण संरचनाएं नहीं थे, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और बाजार से जुड़ी जीवन रेखाएं थे। इनमें से कई परियोजनाएं लगभग 19 करोड़ 15 लाख रुपये की लागत से पूरी की गई हैं, जबकि जम्मू श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर 5 करोड़ 30 लाख रुपये के कार्य अब भी प्रगति पर हैं।

जम्मू श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। पिछले वर्ष मार्ग अवरुद्ध होने से सेब उद्योग और व्यापारिक गतिविधियों को भारी नुकसान हुआ था। इस पृष्ठभूमि में सरकार अब केवल मरम्मत तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि भविष्य के जोखिमों को ध्यान में रखते हुए नई योजना पर विचार कर रही है। श्रीनगर और जम्मू में भीड़भाड़ और बाढ़ जोखिम को कम करने के लिए वैकल्पिक कॉरिडोर प्रस्तावित किए गए हैं। श्रीनगर में कॉन्वेंट स्कूल से राजबाग और जम्मू में राष्ट्रीय राजमार्ग फ्लाईओवर से मनीषपुरी चौक तक ऐसे कॉरिडोर विकसित करने की योजना है, जो यातायात प्रवाह और जल निकासी दोनों को बेहतर बना सकें।

जम्मू अखनूर सड़क के चौड़ीकरण और अखनूर में नए पुल का निर्माण 2026 27 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे सीमावर्ती क्षेत्रों को स्थायी संपर्क मिल सके। व्यापक स्तर पर देखें तो 18 प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएं लगभग 10,600 करोड़ रुपये के अनुमानित निवेश के साथ पाइपलाइन में हैं। 22 पुलों का उद्घाटन हो चुका है और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत हजारों किलोमीटर सड़कें पूर्ण की जा चुकी हैं। चौथे चरण में 2513 बस्तियों को ऑल वेदर कनेक्टिविटी देने का लक्ष्य है, ताकि दूरदराज क्षेत्र भविष्य में बारिश या बाढ़ के दौरान अलग थलग न पड़ें।

स्पष्ट है कि यह केवल पुनर्निर्माण का प्रश्न नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के दौर में बुनियादी ढांचे को अधिक सुदृढ़ और लचीला बनाने की आवश्यकता का संकेत है। जम्मू कश्मीर में बढ़ती चरम मौसमी घटनाएं इस बात की मांग करती हैं कि भविष्य की सभी सड़क और पुल परियोजनाएं जलवायु जोखिम को ध्यान में रखकर तैयार की जाएं।

ग्राउंड रिपोर्ट का डेली इंवायरमेंट न्यूज़ पॉडकास्ट ‘पर्यावरण आज’ SpotifyAmazon MusicJio Saavn, Apple Podcast, पर फॉलो कीजिए।

Author

Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India

We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

Connect With Us

Send your feedback at greport2018@gmail.com

Newsletter

Subscribe our weekly free newsletter on Substack to get tailored content directly to your inbox.

When you pay, you ensure that we are able to produce on-ground underreported environmental stories and keep them free-to-read for those who can’t pay. In exchange, you get exclusive benefits.

Your support amplifies voices too often overlooked, thank you for being part of the movement.

EXPLORE MORE

LATEST

mORE GROUND REPORTS

Environment stories from the margins