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जम्मू-कश्मीर से 315 झीलें कैसे ग़ायब हो गईं?

यह ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ के डेली मॉर्निंग पॉडकास्ट का एपिसोड-189 है। शनिवार, 11 अप्रैल को देश भर की पर्यावरणीय ख़बरों के साथ पॉडकास्ट में जानिए जम्मू-कश्मीर से कैसे 300 से भी अधिक झीलें गायब हो गईं?


मुख्य सुर्खियां

देश में एनर्जी सप्लाई की स्थिति पर अपडेट देते हुए, पेट्रोलियम मिनिस्ट्री ने बताया कि घरेलू LPG प्रोडक्शन बढ़ा है और यह अभी ज़रूरत का लगभग 60% है। पहले भारत अपनी LPG की 60% ज़रूरतें इम्पोर्ट से पूरी करता था।


कर्णाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने होसनगर तालुक के हुलिकल घाट में भूस्खलन में मारे गए मजदूरों के परिवार के लिए 5-5 लाख मुआवज़े की घोषणा की है। गुरूवार को हुए भूस्खलन में 3 मजदूरों की मौत हो गई थी।


वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने शुक्रवार को चेतावनी दी कि ओडिशा के पुरी जिले में प्रस्तावित श्री जगन्नाथ इंटरनेशनल एयरपोर्ट प्रवासी पक्षियों की आबादी के लिए “भयावह” खतरा पैदा कर सकता है। WII ने इसे ओलिव रिडले कछुओं के लिए भी खतरनाक बताया है। 


देश के 15 राज्यों में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि के कारण लगभग 2.5 लाख हेक्टेयर फसलें तबाह हो गई हैं। केंद्र सरकार इसका सर्वे करा रही है और किसानों को राहत देने के लिए खरीफ सीजन के लिए खाद सब्सिडी को 11.6% बढ़ा दिया गया है।


केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत मंदाकिनी नदी को पुनर्जीवित करने की योजना उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पानी की मांग का डेटा साझा न करने की वजह से रुकी हुई है। मध्य प्रदेश के जल संसाधन मंत्री द्वारा दो बार पत्र लिखे जाने के बाद भी यूपी सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया है।


विदिशा की लटेरी रेंज में सागौन की लकड़ी चुरा रहे माफियाओं ने वन विभाग की टीम पर गोफन (पत्थर फेंकने का औजार) से हमला कर दिया। इस हमले में डिप्टी रेंजर गंभीर रूप से घायल हो गए और उनकी पसली टूट गई है।

विस्तृत चर्चा

जम्मू-कश्मीर से 3000 हेक्टेयर झीलें ख़त्म हुईं

जम्मू और कश्मीर में 1967 से अब तक लगभग 3,000 हेक्टेयर झीलें खत्म हो गई हैं। कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल की रिपोर्ट के मुताबिक, इस कमी की वजह से 2014 में कश्मीर में भयानक बाढ़ आई थी।

झीलों की संख्या और क्षेत्रफल में भारी गिरावट

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में जम्मू-कश्मीर की झीलों को भारी नुकसान पहुँचा है। 1967 से अब तक लगभग 315 झीलें गायब हो चुकी हैं, जिसका अर्थ है कि आधी से ज्यादा झीलें खत्म हो गई हैं।

आंकड़ों की बात करें तो 1967 में जम्मू में 367 और कश्मीर में 330 झीलें थीं। 2020 तक जम्मू ने अपनी 269 झीलें खो दीं।

कश्मीर में हालांकि झीलों की संख्या में उतनी बड़ी कमी नहीं आई है, लेकिन उनके क्षेत्रफल (एरिया) में भारी गिरावट देखी गई है। 1500 एकड़ से ज्यादा झीलों का क्षेत्र खत्म हो चुका है और कुल एरिया में 1300 एकड़ से ज्यादा की गिरावट आई है।

प्राकृतिक संतुलन और बाढ़ का खतरा

झीलें केवल पानी का स्रोत नहीं होतीं, बल्कि वे बारिश के पानी को रोकने के लिए नेचुरल बफर का काम करती हैं।

इन झीलों के कम होने से पानी रोकने की उनकी क्षमता खत्म हो रही है, जिससे वह पानी सीधे गांवों, शहरों और खेतों में घुस जाता है। इसका एक भयावह उदाहरण 2014 की कश्मीर बाढ़ थी。

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘लैंड यूज’ (भूमि उपयोग) के बदलने से प्राकृतिक तंत्र टूट गया है। जहां पहले झीलें और वेटलैंड थे, वहां अब घर, खेत और निर्माण कार्य (कन्स्ट्रक्शन) हो चुके हैं, जिससे पानी का बहाव बाधित हो गया है।

डल और वुलर झील की स्थिति

श्रीनगर की डल झील, जिसे शहर का दिल माना जाता है, तेजी से सिकुड़ रही है। 2007 में इसका खुला जल क्षेत्र 15.40 वर्ग किमी था, जो 2020 तक घटकर 12.91 वर्ग किमी रह गया है। मात्र 13 सालों में इसमें 10% से ज्यादा की गिरावट आई है।

डल झील के खराब होने के मुख्य कारणों में अवैध कब्जा (एनक्रोचमेंट), फ्लोटिंग गार्डन्स और सीवेज की समस्या है। रिपोर्ट बताती है कि 45 करोड़ लीटर से ज्यादा कचरे का सही ट्रीटमेंट नहीं हो पा रहा है, जिससे हाउस बोट और घरों का कचरा सीधे झील में जा रहा है।

एशिया की बड़ी झीलों में शुमार वुलर झील भी दबाव में है। वहां भी मिट्टी जमने (सिल्टेशन) और अतिक्रमण के कारण उसका क्षेत्रफल कम हो रहा है, जो भविष्य में बाढ़ नियंत्रण के लिए एक बड़ा खतरा है।

प्रबंधन की कमियां और विफलताएं

रिपोर्ट में ‘लेक कंजर्वेशन और मैनेजमेंट अथॉरिटी’ की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं। यह संस्था भूमि उपयोग को नियंत्रित करने में विफल रही है।

प्रोजेक्ट्स में देरी हुई है और आवंटित फंड्स (पैसा) का सही तरीके से उपयोग नहीं किया गया।

हाउस बोट्स को दूसरी जगह शिफ्ट करने और वेस्ट मैनेजमेंट (कचरा प्रबंधन) की योजनाएं भी सही ढंग से लागू नहीं हो पाईं।

ऑडिट रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि आने वाली बाढ़ों से बचना है, तो तुरंत सख्त कदम उठाने होंगे। इसमें शहरी विकास की प्लानिंग को मजबूत करना, सीवेज सिस्टम को ठीक करना, लैंड यूज पर कड़ा नियंत्रण रखना और प्रभावी मॉनिटरिंग शामिल है। रिपोर्ट सरकार और संबंधित विभागों की जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।

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Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India

We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

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