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ईरान युद्ध से भारत की फर्टिलाइज़र सप्लाई पर खतरा

यह ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ के डेली मॉर्निंग पॉडकास्ट का एपिसोड-160 है। सोमवार, 09 मार्च को देश भर की पर्यावरणीय ख़बरों के साथ आज के पॉडकास्ट में जानिए अमेरिका-ईरान में टकराव कैसे कर सकता है भारत की कृषि को प्रभावित।


मुख्य सुर्खियां

अमेरिका द्वारा ईरान के डिस्टिलेशन प्लांट पर हमले के बाद खाड़ी क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ गया है। जवाब में ईरान ने रणनीतिक इलाकों में मिसाइलें तैनात कर दी हैं और सुरक्षा अलर्ट बढ़ा दिया है। इससे पश्चिम एशिया में बड़े सैन्य टकराव की आशंका और वैश्विक समुद्री व्यापार पर खतरा बढ़ गया है।


राजस्थान के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में 42 साल बाद फिर से “रिंगिंग अभियान” शुरू किया जा रहा है। इस अभियान में प्रवासी पक्षियों के पैरों में हल्की रिंग लगाकर उनकी उड़ान, प्रवास मार्ग और जीवन चक्र की निगरानी की जाएगी। वन विभाग और बीएनएचएस मिलकर इस अध्ययन से पक्षियों के वैश्विक प्रवास के बारे में नया वैज्ञानिक डेटा जुटाएंगे।


भोपाल के बैरागढ़ क्षेत्र में बड़े तालाब के कैचमेंट इलाके में पट्टे देने और बसावट का मामला सामने आया है। सर्वे में 50 मीटर दायरे के अंदर 100 से ज्यादा झुग्गियां पाई गईं, जिससे तालाब के जलग्रहण क्षेत्र पर दबाव बढ़ रहा है। प्रशासन अब नोटिस, सुनवाई और पुनर्वास की प्रक्रिया के बाद अतिक्रमण हटाने की तैयारी कर रहा है।


कश्मीर के सोनमर्ग में पर्यावरणीय चिंता के कारण स्नो बाइक (स्नोमोबाइल) गतिविधियों को रोक दिया गया है। प्रशासन का कहना है कि ज्यादा वाहनों से नाजुक घासभूमि और बर्फीले क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर असर पड़ रहा था। इसलिए फिलहाल संचालन सीमित या बंद कर दिया गया है ताकि इलाके का पर्यावरणीय संतुलन बचाया जा सके। 


अमेरिका-ईरान युद्ध के बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं। सप्लाई बाधित होने और खाड़ी क्षेत्र में शिपिंग जोखिम बढ़ने से ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संघर्ष लंबा चला तो वैश्विक अर्थव्यवस्था और महंगाई पर बड़ा असर पड़ सकता है।


विस्तृत चर्चा

ईरान युद्ध: भारत की खेती और फर्टिलाइज़र सप्लाई पर खतरा

पश्चिम एशिया में ईरान से जुड़ा तनाव बढ़ने से वहां की सप्लाई चेन और समुद्री व्यापार प्रभावित हो सकता है। भारत के लिए इसका सबसे बड़ा असर उर्वरक सेक्टर पर पड़ सकता है क्योंकि खेती के लिए जरूरी कई कच्चे पदार्थ हम इसी क्षेत्र से आयात करते हैं।

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत को लगभग 10 मिलियन टन यूरिया और करीब 6.5 मिलियन टन डाइ-अमोनियम फॉस्फेट यानी डीएपी आयात करना होगा। देश में यूरिया का घरेलू उत्पादन लगभग 30 मिलियन टन और डीएपी का करीब 3.5 मिलियन टन है। यूरिया और डीएपी दोनों ही ऐसे उर्वरक हैं जिनका इस्तेमाल किसान सबसे ज्यादा करते हैं। म्यूरेट ऑफ पोटाश यानी एमओपी की करीब 3 मिलियन टन खपत पूरी तरह आयात से पूरी होती है।

भारत सिर्फ तैयार उर्वरक ही नहीं बल्कि उनके कच्चे पदार्थ भी बड़े पैमाने पर आयात करता है। 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार भारत के यूरिया आयात का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल के देशों से आता है। इनमें ओमान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन शामिल हैं। डीएपी के मामले में भी सऊदी अरब भारत का सबसे बड़ा सप्लायर है। अगर इस क्षेत्र में युद्ध या तनाव बढ़ता है तो सप्लाई प्रभावित हो सकती है।

घरेलू उत्पादन भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है क्योंकि भारत के ज्यादातर यूरिया प्लांट प्राकृतिक गैस से चलते हैं। देश में जितनी प्राकृतिक गैस खपत होती है उसमें करीब 29 प्रतिशत हिस्सा उर्वरक उद्योग का है। अगर गैस की सप्लाई या कीमत पर असर पड़ता है तो इसका असर उर्वरक उत्पादन पर भी पड़ सकता है।

सरकार का कहना है कि अभी अगले खरीफ सीजन के लिए पर्याप्त उर्वरक स्टॉक मौजूद है। खरीफ की बुवाई आम तौर पर जून से शुरू होती है इसलिए तुरंत किसी बड़े संकट की संभावना नहीं दिखती। लेकिन अगर युद्ध लंबा चलता है तो आगे चलकर उर्वरकों की कीमत और उपलब्धता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

भारत ने पिछले कुछ सालों में आयात के स्रोतों को थोड़ा विविध बनाने की कोशिश की है। अब इंडोनेशिया, मलेशिया, मिस्र, वियतनाम, फिनलैंड और अल्जीरिया जैसे देशों से भी कुछ कच्चा माल खरीदा जा रहा है। डीएपी के लिए ऑस्ट्रेलिया से भी आयात बढ़ाया गया है। इसके बावजूद पश्चिम एशिया और चीन अभी भी उर्वरक बाजार में महत्वपूर्ण सप्लायर बने हुए हैं।

इस स्थिति से यह साफ होता है कि भारत की खेती और खाद्य सुरक्षा काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय हालात पर निर्भर है। पश्चिम एशिया में किसी भी बड़े संघर्ष का असर भारत की उर्वरक सप्लाई और खेती पर पड़ सकता है।


कश्मीर में असामान्य गर्मी के बाद बारिश और बर्फ की संभावना

कश्मीर में हाल के दिनों में तापमान सामान्य से काफी अधिक दर्ज किया गया है, जो इस मौसम के लिहाज से असामान्य माना जा रहा है। श्रीनगर में अधिकतम तापमान लगभग 25 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो सामान्य से करीब 10 डिग्री अधिक है। इसी तरह पहलगाम जैसे प्रमुख पर्यटन स्थल पर भी तापमान लगभग 20.8 डिग्री रिकॉर्ड किया गया। गुलमर्ग, जिसे आमतौर पर ठंडे मौसम के लिए जाना जाता है, वहां भी तापमान करीब 15 डिग्री दर्ज हुआ जो सामान्य से लगभग 10 डिग्री ज्यादा है। यह स्थिति तब देखी जा रही है जब कश्मीर में सर्दियों का मौसम अभी पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुआ है।

इस बीच भारत मौसम विज्ञान विभाग ने जानकारी दी है कि क्षेत्र में एक नया वेस्टर्न डिस्टर्बेंस सक्रिय हो सकता है। इसका प्रभाव 9 मार्च से 12 मार्च के बीच देखने को मिल सकता है। इस मौसम प्रणाली के कारण कश्मीर के कई हिस्सों में बारिश और बर्फबारी की संभावना जताई गई है। मौसम विभाग के अनुसार इस प्रणाली का सबसे अधिक असर 11 और 12 मार्च को देखने को मिल सकता है। इन दिनों ऊंचाई वाले इलाकों में भारी बर्फबारी और मैदानी क्षेत्रों में बारिश होने की संभावना है।

पर्यटन स्थलों जैसे सोनमर्ग, गुलमर्ग और दाचीगाम क्षेत्र में भी इस दौरान भारी बर्फबारी का दौर देखने को मिल सकता है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि 10 मार्च के बाद यह वेस्टर्न डिस्टर्बेंस और अधिक सक्रिय हो सकता है, जिससे तापमान में गिरावट आने की संभावना है और मौसम में अचानक बदलाव भी देखा जा सकता है।

हालांकि इस वर्ष कश्मीर में सर्दियों के दौरान बारिश और बर्फबारी सामान्य से काफी कम रही है। दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच के कोर विंटर पीरियड में जम्मू कश्मीर में लगभग 65 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस पूरे समय में लगभग 100 मिलीमीटर वर्षा दर्ज हुई, जबकि सामान्य रूप से यह लगभग 285 मिलीमीटर होनी चाहिए थी। इसे हाल के वर्षों के सबसे सूखे सर्दियों में से एक माना जा रहा है।

अगर महीने के हिसाब से देखें तो दिसंबर में केवल लगभग 13 मिलीमीटर वर्षा हुई, जबकि सामान्य तौर पर यह करीब 60 मिलीमीटर होनी चाहिए थी। जनवरी में भी वर्षा सामान्य से काफी कम रही और फरवरी में तो केवल लगभग 14 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य औसत करीब 130 मिलीमीटर माना जाता है।

मौसम विभाग का कहना है कि इस तरह के मौसम पैटर्न हाल के वर्षों में अधिक देखने को मिल रहे हैं। बदलते मौसम को देखते हुए कश्मीर की शेर ए कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी ने किसानों के लिए एक सलाह जारी की है।

विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि फिलहाल मिट्टी में नमी बनाए रखना और फसलों को गर्मी के तनाव से बचाना सबसे जरूरी है। बागवानों को पेड़ों के आसपास चार से छह इंच तक जैविक मल्च लगाने की सलाह दी गई है। इसके लिए धान के पुआल या घास का उपयोग किया जा सकता है। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और पानी जल्दी सूखता नहीं है।

किसानों को यह भी सलाह दी गई है कि यदि सिंचाई की उचित व्यवस्था नहीं है तो उर्वरकों के उपयोग में जल्दबाजी न करें। पहले यह सुनिश्चित करें कि मिट्टी में पर्याप्त नमी मौजूद हो। गेहूं, सरसों और मटर जैसी फसलों में नियमित निगरानी रखने और खरपतवार हटाने की भी सलाह दी गई है ताकि उपलब्ध नमी का सही उपयोग हो सके।

मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में सक्रिय होने वाला वेस्टर्न डिस्टर्बेंस कश्मीर के मौसम में बदलाव ला सकता है। हालांकि यह देखना अभी बाकी है कि मार्च का यह मौसम तंत्र क्षेत्र में कितनी बारिश और बर्फबारी लेकर आता है, क्योंकि अब तक जम्मू कश्मीर का सर्दियों का मौसम सामान्य से काफी सूखा रहा है।

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