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प्री-मानसून सीजन किसानों के लिए कैसे संकटकाल बन रहा है?

यह ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ के डेली मॉर्निंग पॉडकास्ट का एपिसोड-188 है। शुक्रवार, 10 अप्रैल को देश भर की पर्यावरणीय ख़बरों के साथ पॉडकास्ट में जानिए असमय गर्मी और बारिश, कैसे प्री-मानसून सीजन किसानों के लिए संकटकाल बन रहा है?


मुख्य सुर्खियां

चंबल अभयारण्य में रेत माफियाओं द्वारा ट्रैक्टर से कुचलकर मारे गए वन रक्षक के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है। इस मामले की सुनवाई 13 अप्रैल को होगी और कोर्ट अवैध रेत खनन को रोकने के लिए व्यापक निर्देश जारी कर सकता है।


केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी नई गाइडलाइन के अनुसार अत्यधिक गर्मी शुरुआती 20 हफ्तों में गर्भपात का जोखिम बढ़ा सकती है। मंत्रालय ने बचाव के लिए ‘BEAT’ फॉर्मूला अपनाने और स्वास्थ्य प्रणाली में आवश्यक बदलाव करने की सलाह दी है।


15वें वित्त आयोग की अवधि के दौरान ग्रामीण निकायों के लिए रिकॉर्ड 94.98% फंड जारी किया गया है, जो पिछले आयोगों की तुलना में काफी अधिक है। आगामी 16वें वित्त आयोग ने भी ग्रामीण निकायों के लिए 4.35 लाख करोड़ रुपये के अनुदान की सिफारिश की है।


ग्रेट निकोबार द्वीप पर एक नए ग्रीनफील्ड शहर के विकास के लिए ड्राफ्ट मास्टर प्लान तैयार किया गया है, जो मुख्य रूप से पर्यटन और बुनियादी ढांचे पर केंद्रित है। इसमें एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, ट्रांसशिपमेंट पोर्ट और बिजली संयंत्र जैसी प्रमुख परियोजनाएं शामिल हैं।


छतरपुर में केन-बेतवा लिंक परियोजना से विस्थापित होने वाले 8 गांवों के आदिवासियों ने उचित मुआवजे और नए गांव की मांग को लेकर उग्र प्रदर्शन किया है। ग्रामीणों ने प्रशासन पर अनदेखी का आरोप लगाते हुए ‘नया गांव दो या जला दो’ के नारे के साथ आत्मदाह तक की चेतावनी दी है।


मध्य प्रदेश में गेहूं के समर्थन मूल्य और खरीद में देरी को लेकर कांग्रेस ने राज्यव्यापी उग्र प्रदर्शन किया और कई जिलों में कलेक्ट्रेट की बैरिकेडिंग तोड़ दी। विपक्ष का आरोप है कि सरकार किसानों को किए गए वादे के अनुसार लाभ नहीं दे रही है।

विस्तृत चर्चा

मौसमी आपदाओं के पैटर्न में बदलाव

भारत में कृषि के लिए मौसम के जोखिमों का स्वरूप बदल रहा है। ‘इंडियाज इंटरेक्टिव एटलस ऑन वेदर डिजास्टर्स’ के विश्लेषण के अनुसार, अब मानसून के साथ-साथ प्री-मानसून अवधि (मार्च-अप्रैल) भी फसलों के लिए एक बड़े जोखिम के रूप में उभर रही है।

ऐतिहासिक संदर्भ: लंबे समय से जून से सितंबर के बीच होने वाली मानसून की भारी बारिश और बाढ़ को ही खेती के लिए सबसे नुकसानदेह माना जाता था।

नया रुझान: 2022 से 2026 तक के आंकड़ों से पता चलता है कि प्री-मानसून में होने वाली बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि अब फसलों को अधिक नुकसान पहुंचा रही है, जबकि पहले इस समय को खेती के लिए सुरक्षित माना जाता था।

2026 में हुए नुकसान के आंकड़े

वर्ष 2026 में प्री-मानसून की मार काफी गंभीर रही है:

व्यापकता: 1 मार्च से 7 अप्रैल तक के केवल 38 दिनों में से 29 दिन कम से कम 24 राज्यों में खराब मौसम दर्ज किया गया।

प्रभावित क्षेत्र: कम से कम 13 राज्यों में 6,27,000 हेक्टेयर से ज्यादा फसल का इलाका प्रभावित हुआ है।

मार्च का रिकॉर्ड: केवल मार्च 2026 में ही 1,95,000 हेक्टेयर फसल का नुकसान हुआ, जो पिछले 5 वर्षों में सबसे अधिक है।

किसानों पर पड़ने वाला आर्थिक प्रभाव

यह मौसम की मार ठीक कटाई के समय (मार्च और अप्रैल) पड़ रही है, जो किसानों के लिए विनाशकारी है:

भरपाई का मौका नहीं: चूंकि फसलें कटाई के लिए तैयार होती हैं, इसलिए खराब होने पर उन्हें दोबारा नहीं बोया जा सकता, जिससे किसानों की पूरी आमदनी खत्म हो जाती है।

गुणवत्ता में गिरावट: बारिश और नमी के कारण अनाज की गुणवत्ता खराब हो जाती है, जिससे बाजार में किसानों को उनकी फसलों की कम कीमतें मिलती हैं।

अतिरिक्त आर्थिक बोझ: मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अनाज के साथ-साथ आलू, प्याज और लहसुन जैसी फसलों को भी भारी नुकसान हुआ है।

सबसे ज्यादा प्रभावित फसलें और राज्य

रबी की फसलें: गेहूं, सरसों, चना और दालों जैसी रबी फसलों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है।

गेहूं पर दोहरी मार: फरवरी में पड़ने वाली अत्यधिक गर्मी के कारण गेहूं की फसल पहले से ही दबाव में थी, और अब बेमौसम बारिश ने इसे और तबाह कर दिया है।

प्रमुख प्रभावित राज्य: मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र इस मौसम परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।

इस बेमौसम बदलाव के वैज्ञानिक कारण

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, इस स्थिति के लिए निम्नलिखित कारक जिम्मेदार हैं:

पश्चिमी विक्षोभ: मार्च और अप्रैल 2026 में मजबूत और सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ के कारण मैदानी इलाकों में ठंडी हवाएं आईं।

तापमान का टकराव: इन ठंडी हवाओं का गर्मियों की शुरुआती गर्मी से मेल होने के कारण शक्तिशाली तूफान और ओलावृष्टि की स्थिति बनी।

नमी और अस्थिरता: अरब सागर से आई अतिरिक्त नमी और वायुमंडल की अस्थिर स्थितियों ने इन मौसमी प्रणालियों को और भी गंभीर और व्यापक बना दिया।

अतः स्पष्ट है कि प्री-मानसून अवधि अब भारतीय किसानों के लिए एक नया और गंभीर खतरा बन गई है, जो परिपक्व फसलों को ठीक कटाई से पहले बर्बाद कर रही है।

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Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India

We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

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