मध्यप्रदेश के इंदौर, उज्जैन, भोपाल और नर्मदापुरम संभाग में 10 अप्रैल से एमएसपी (मिनिमम सपोर्ट प्राईज़) पर गेहूं उपार्जन शुरु हो गया, बचे हुए संभागों में 15 अप्रैल से किसान अपनी फसल सरकार को बेच पाएंगे। यह पहली बार है जब राज्य में गेहूं की खरीद इतनी देरी से हो रही है, आमतौर पर मध्य मार्च से राज्य में खरीद शुरु हो जाया करती थी। देरी से शुरु हुए उपार्जन ने एमएसपी पर अपनी फसल बेचने की राह देख रहे कई किसानों को प्रभावित किया है।
इस वर्ष मोहन यादव सरकार ने गेहूं उपार्जन की तारीख 1 अप्रैल घोषित की थी लेकिन इसे आगे बढ़ाकर 10 अप्रैल कर दिया गया। सरकार ने तारीख आगे बढ़ाने के पीछे तर्क दिया ईरान युद्ध की वजह से बारदान की कमी।
बारदान में होता है फसल भंडारण

किसान उपार्जन केंद्रों पर अपनी फसल ट्रॉलियों में भरकर लाते हैं, तुलाई होने के बाद इन्हें बारदान में पैक कर स्टोर किया जाता है। सरकार इन उपार्जन केंद्रों (सरकारी एवं निजी वेयरहाउसेस) पर भंडारित गेहूं का इस्तेमाल खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के तहत अनाज वितरित करने के लिए करती है।
भारत में अमूमन दो तरह के बारदान इस्तेमाल होते हैं, पहला जूट का बना बोरा जिसमें 50 किलो 500 ग्राम स्टोर किया जाता है दूसरा पॉलिप्रॉपलीन (PP) बारदान जिसमें 50 किलो 300 ग्राम प्रति बैग अनाज स्टोर करनी क्षमता होती है । पीपी बैग्स का निर्माण पेट्रोकैमिकल इंडस्ट्री पर निर्भर होता है जो ईरान युद्द की वजह से प्रभावित है।
फूड एंड सिविल सप्लाईज़ एडिशनल चीफ सेक्रेटरी द्वारा 5 अप्रैल को दी गई जानकारी के मुताबिक प्रदेश में 78 लाख मीट्रिक टन गेहूं का उपार्जन होना अनुमानित है। इसके लिए 3 लाख 12 हजार गठान बारदान की आवश्यकता होगी। उन्होंने बताया कि “प्रदेश में गेहूं खरीदी आरंभ करने के लिए आवश्यक बारदान का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है।” हालांकि एमपी सिविल सप्लाईज़ कॉर्पोरेशन लिमिटेड के पास अप्रैल के पहले हफ्ते तक 1 लाख 20 हज़ार जूट के बैग की इंवेंटरी उपलब्ध थी, जो ज़रुरत का सिर्फ एक तिहाई है।
एमपी स्टेट सिविल सप्लाईज़ कॉर्पोरेशन के मैनेजिंग डायरेक्टर अनुराग वर्मा कहते हैं कि “हम अतिरिक्त जूट, पीपी एवं एचडीपीई बैग्स एक्वायर करने की प्रक्रिया में हैं। हमने नए और यूज्ड बैग्स के लिए टेंडर जारी कर दिये हैं।”
मुख्यमंत्री डॉ.यादव ने रविवार 5 अप्रैल को कहा कि “हमने केन्द्र सरकार, जूट कमिश्नर सहित अन्य बारदान प्रदाय एजेंसियों से बारदान आपूर्ति के लिए लगातार सम्पर्क बनाया हुआ है।”
सरकार बारदान उपलब्धता पर आश्वस्त करती नज़र आ रही है लेकिन ज़मीनी हालात कहते हैं कि सरकार को बारदान आपूर्ती तेज़ करने की ज़रुरत है।
ज़मीनी हालात

सीहोर जिले के इच्छावर में मां भवानी गेहूं उपार्जन केंद्र के संचालक अभिषेक यादव ने ग्राउंड रिपोर्ट को बताया कि उन्हें हर वर्ष जूट के बारदान सरकार की ओर से उपलब्ध करवाए जाते हैं लेकिन इस बार पीपी बैग्स भेजे गए हैं, वह भी इतने हैं जिससे 2 हफ्ते का ही काम चलेगा। तुलाई दो महीने चलेगी ऐसे में अतिरिक्त बैग्स की ज़रुरत होगी। अभीषेक प्लास्टिक के बारदान की कमियां भी बताते हैं, वो कहते हैं “जूट के बने बैग्स में अनाज खराब नहीं होता क्योंकि इसमें हवा लगती रहती है और इसका स्टैक बनाना आसान होता है, वहीं प्लास्टिक बैग्स में ऐसा नहीं किया जा सकता।”
देवास जिले के कन्नौद में गेहूं उपार्जन केंद्र संचालक विपुल कहते हैं कि उन्हें बारदान की 30 गठान मिली हैं, एक गठान में 500 बैग्स होते हैं। एक दिन में उन्हें 10 गठान की ज़रुरत है। ऐसे में केवल तीन दिन की ही तुलाई संभव है। विपुल कहते हैं “बारदान नहीं मिला तो तुलाई रोकनी पड़ जाएगी।”
देरी से गेहूं उपार्जन शुरु होने और बारदान की कमी पर विपक्ष भी सरकार पर हावी है। मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स पर कहा कि “मध्य प्रदेश में पहले ही भाजपा सरकार ने गेहूं की खरीद इतनी देर से शुरू की, उसके बाद भी आज खरीद के पहले दिन सर्वर डाउन है। कई समर्थन खरीद केंद्रों पर ताले लगे हैं। जिसके चलते कई किसान भाई अपना गेहूं नहीं बेच पा रहे हैं। पहले बारदान का ढोंग, और अब तकनीकी जालसाजी। आज सरकार की नीति और नियत के चलते सभी किसान भाइयों को 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल के नुकसान पर गेहूं बेचना पड़ रहा है।”
देरी से शुरु हुई खरीदी का किसानों पर असर

2026-27 में गेहूं उपार्जन के लिए प्रदेश के 19 लाख 4 हजार 644 किसानों ने अपना पंजीयन कराया है। इस उपार्जन वर्ष के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,625 रूपए प्रति क्विंटल तय किया गया है। राज्य सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के अतिरिक्त 40 रूपए प्रति क्विंटल बोनस का लाभ भी इस वर्ष किसानों को देने जा रही है। लेकिन देरी से शुरु हुई बुवाई के चलते कई किसानों को अपनी फसल मंडी में निजी व्यापारियों को बेचनी पड़ रही है। कुछ किसानों ने पैसों की तत्काल ज़रुरत और कुछ छोटे किसानों ने भंडारण की व्यवस्था न होने की वजह से ऐसा किया है।
सीहोर जिले के मुंगावली गांव के किसान बलराम पाटीदार कहते हैं “डीज़ल, बिजली, मज़दूर और हार्वेस्टर का बिल चुकाने के लिए पैसों की ज़रुरत थी। अब यह पैसा तो फसल बेचकर ही मिल सकता था। ऐसे में हमने कुल 25 क्विंटल उपज में से 14 क्विंटल फसल 2000 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से मंडी में बेच दी।”
बलराम कहते हैं कि सरकारी खरीद अगर समय से शुरु होती तो हम एमएसपी पर फसल बेचते और प्रति क्विंटल 600 रुपए अतिरिक्त मिल जाते।
सीहोर जिले की आष्टा तहसील के किसान नीलेश जैन बताते हैं कि उन्होंने 20 मार्च को ही अपनी गेहूं की फसल कटवा ली थी। सरकारी खरीद शुरु न होने की वजह से उन्होंने फसल काटकर अपने घर के बाहर खुले में ढेर लगा कर रख दिया था। 30 मार्च को आई बारिश और आंधी से अपनी फसल को बचाने के लिए उन्हें बहुत मश्क्कत करनी पड़ी। वो कहते हैं कि अगर बारिश अधिक होती तो फसल पूरी खराब हो सकती थी। नीलेश कहते हैं “छोटे किसानों के पास लंबे समय तक फसल का भंडारण करने की व्यवस्था नहीं होती। इसीलिए समय पर सरकारी खरीद होना ज़रुरी है।”
जहां किसान एक तरफ अलग अलग चुनौतियों का सामना कर रहे हैं तो वहीं सरकार कह रही है कि वह हर घड़ी किसानों के साथ खड़ी है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि “एमएसपी पर पहले छोटे किसानों का गेहूं खरीदने का फैसला किया गया है, इसके बाद मध्यम एवं बड़े किसानों से खरीदी होगी।” सरकार इसे उपाय बता रही है कि लेकिन यह संकेत भी दे रही है कि यह गेहूं प्रोक्योर्मेंट सीज़न सरकार के लिए आसान नहीं रहने वाला है।
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