जनवरी की सर्द सुबह में भोपाल का बड़ा तालाब अक्सर कोहरे में नहीं, बल्कि धुंध (स्मॉग) की जहरीली चादर में लिपटा रहता है। एक तरफ राज्य की राजधानी भोपाल प्रदूषण सूचकांक में दूसरे नंबर पर है। दूसरी ओर ग्वालियर की हवा मप्र में सबसे ज़हरीली बनी हुई है।
19 दिसंबर 2025 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में पर्यावरण कार्यकर्ता राशिद नूर खान द्वारा याचिका दायर की गई। याचिका में संलग्र आधिकारिक दस्तावेज व मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) की रिपोर्ट्स शामिल हैं। जो बताती हैं कि कैसे प्रशासनिक बाजीगरी ने प्रदेश को ”गैस चैंबर” में बदल दिया है। एनजीटी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक 7 सदस्यीय जांच समिति गठित की है। समिति को छह सप्ताह में विस्तृत जांच रिपोर्ट सौंपनी है। याचिका पर अगली सुनवाई 18 मार्च 2026 को होगी।
सबसे चौंकाने वाला खुलासा इंदौर से सामने आया है। वह शहर जो स्वच्छता का पर्याय था, अब अपने प्रदूषण मीटर ( AQI Monitor) के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप में कटघरे में खड़ा है।
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम ( NCAP) के तहत पिछले पांच साल में करोड़ों रूपये खर्च के दावे किए गए, परंतु नतीजा शून्य नज़र आता है।नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में लंबित याचिका इस पूरे संकट को केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि एक उभरते सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में सामने रखती है।
इंदौर फाइल्स: ग्रीन कवर-अप का धोखा
स्वच्छता में नंबर 1 इंदौर शहर की साख पर तब बट्टा लगा। जब दिसंबर 2025 के अंत में मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) ने औचक निरीक्षण किया। इसमें सामने आया कि इंदौर में लगाए गए वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन (CAAQMS) शहर की हकीकत नहीं, बल्कि एक निर्मित झूठ दिखा रहे थे। जब पूरा प्रदेश धुएं में घुट रहा था, तब इंदौर के आंकड़े मैनेज किए जा रहे थे।
एक ही आसमान के दो सच ?
मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) की 24 नवंबर 2025 की रिपोर्ट में AQI मॉनिटरिंग डेटा में गड़बड़ी सामने आई है। इस रिपोर्ट को याचिका में शामिल किया गया है।

याचिकाकर्ता रारिश नूर खान कहते हैं,
“इंदौर के स्टेशन जानबूझकर शहर के हरे-भरे इलाकों (Green Zone) के बीच स्थापित किए गए हैं। सेंसर पेड़ों की ओट में होने से धूल के कण उन तक पहुंच ही नहीं पाते हैं, जिससे AQI बेहतर दिखाई देता है।”
इस दावे की पुष्टि 29-30 दिसंबर 2025 को MPPCB की संयुक्त टीम के औचक निरीक्षण से होती है। इसमें पाया गया कि एयर क्वालिटी मापने वाली मशीनों में इस्तेमाल होने वाली कैलिब्रेशन गैस एक्सपायर हो चुकी थी। वहीं फिल्टर रिबन बार-बार इस्तेमाल ( Reuse) किया जा रहा था। इस वजह से मशीनों ने ऐसा गलत डेटा दिखाया जो विज्ञान के हिसाब से संभव ही नहीं है।
एमपीपीसीबी, भोपाल क्षेत्रीय कार्यालय अधिकारी ब्रजेश शर्मा समझाते है, ”जैसे PM2.5 का स्तर PM10 से ज्यादा दिखाना। यह वैसा ही है जैसे कोई थर्मोमीटर को बर्फ में रखकर बोले कि मरीज को बुखार नहीं है।”
हालांकि इस खुलासे के बाद जनवरी 2026 में इन स्टेशनों (रीजनल पार्क, मागुडा नगर, बिजासन माता मंदिर और रेजीडेंसी पार्क) को बंद कर दिया गया है। वहीं केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड ने समीर पोर्टल पर इंदौर के डेटा उपयोग को रोकने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, एमपीपीसीबी ने इंदौर क्षेत्रीय कार्यालय को नियमित निरीक्षण करने और मुख्यालय को रिपोर्ट भेजने के निर्देश दिए हैं।
राशिद सवाल करते हैं,
”क्या इंदौर और मध्य प्रदेश के स्वच्छ तमगे की सच्चाई आंकड़ों की बाजीगरी पर टिकी है?”
भोपाल: क्या विकास के मलबे में दफन हो रही है राज्य की राजधानी?

इंदौर अगर डेटा छिपा रहा है, तो भोपाल धूल में नहा रहा है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) में भोपाल और ग्वालियर जिले का प्रदर्शन सबसे खराब रहा है। नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम रैकिंग में राज्य के प्रमुख सात शहरों ( भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन, देवास और सागर) शामिल हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि भोपाल में पीएम 10 का स्तर 130 से 190 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर (µg/m³) के बीच झूल रहा है, जो सुरक्षित मानक (60 µg/m³) से तीन गुना ज्यादा है।
पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे भोपाल की बर्बादी की वजह, शहर में चल रहे अनियोजित विकास कार्यों को बताते हैं, वे कहते हैं,
”इन परियोजनाओं की वजह से ही शहर एक ओपन कंस्ट्रक्शन साइट बन गया है। शहर का ऐसा शायद ही कोई हिस्सा हो जहां पर निर्माण कार्य नहीं किया जा रहा हो।”
दुबे सवाल करते हैं, ”न तो निर्माण स्थलों को ढका जा रहा है, न ही नियमों का पालन किया जा रहा है। जबकि धूल शमन के उपाय भी नदारद हैं। तो यह विकास भोपाल को स्मार्ट सिटी में तब्दील कर रहा है या डस्ट सिटी में? ”
हालांकि 7 जनवरी 2026 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने भी राशिद नूर खान की याचिका पर यही टिप्पणियां की हैं।
वहीं भोपाल का संकट सिर्फ धूल नहीं है, बल्कि उसके फेफड़ों का विनाश भी है। राशिद नूर खान बनाम प्रधान मुख्य वन संरक्षक ( OA160/2024) मामले में एनजीटी के सामने जो तथ्य आए, वे चौंकाने वाले हैं। केरवा और कलियासोत के बीच का जो टाइगर कॉरिडोर, भोपाल के लिए कार्बन सिंक का काम करता था, अब अतिक्रमण का शिकार है। जागरण लेकसिटी यूनिवर्सिटी और अन्य बड़े संस्थानों पर स्लैश एंड बर्न (काटो और जलाओ) के जरिए जंगल साफ करने के आरोप हैं।
राशिद पूछते हैं, ”जब शहर के प्राकृतिक एयर प्यूरीफायर ही काट दिए जाएंगे, तो हवा साफ कैसे रहेगी ?”
ग्वालियर: प्रदूषण का ब्लैक होल
अगर भोपाल बीमार है, तो ग्वालियर आईसीयू में है। नेशनल क्लीन एयर प्राेग्राम (एनसीएपी) के मूल्यांकन में यह शहर लगातार सबसे निचले पायदान पर है। पिछले तीन वर्षों में यहां सुधार की जगह पीएम 2.5 के स्तर में लगभग 65 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
ग्वालियर की समस्या भौगोलिक है, लेकिन विफलता प्रशासनिक है। यह शहर एक कटोरे जैसी संरचना में बसा है। जहां सर्दियों में प्रदूषक फंस जाते हैं। लेकिन प्रशासन ने इसका क्या तोड़ निकाला? कुछ नहीं। शहर का ट्रैफिक आज भी पुराने डीजल वाहनों और बे-रोक-टोक गुजरने वाले भारी मालवाहकों के भरोसे है।
ग्वालियर के सामाजिक कार्यकर्ता राहुल सिंह कहते हैं, ”धूल उड़ती है, अधिकारी पानी छिड़कते हैं। धूप निकलती है और धूल फिर उड़ने लगती है। कोई दीर्घकालिक योजना ज़मीन पर नहीं दिखती है।”
हवा की सेहत सुधारने मिला फंड नहीं किया उपयोग
मध्य प्रदेश में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए राज्य सरकार ने जनवरी 2025 में 5000 करोड़ की महत्वाकांक्षी योजना लगाने का ऐलान किया। दावा था कि जिला-वार एक्शन प्लान बनाकर AQI सुधारा जाएगा। लेकिन 10 माह बीत जाने के बाद भी जिलों से एक्शन प्लान रिपोर्ट नहीं मिली। राज्य के मुख्य सचिव अनुराग जैन ने नवंबर 2025 को अधिकारियों को 30 नवंबर 2025 तक एयर क्वालिटी एक्शन प्लान रिपोर्ट पेश करने के सख्त निर्देश दिए थे। परंतु जनवरी 2026 तक यह रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय (Ministry of Environment, Forest and Climate Change) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अधीन कार्य करने वाली कार्यान्वयन समिति की 15 वीं बैठक हुई। इस बैठक के मिनट्स के अनुसार राज्य को नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के तहत 2019 से अब तक करीब 48.44 करोड़ रूपये मिले, जिनमें से मात्र 14.57 करोड़ रूपए ही खर्च हुए। जबकि 15वां वित्त आयोग ( सड़क/निर्माण के लिए) फंड लगभग 570.5 करोड़ रूपये मिले, जिसका 86 प्रतिशत से अधिक उपयोग कर लिया गया।
हालांकि सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि भोपाल और इंदौर जैसे शहरों में NCAP के तहत मिले फंड का एक भी रूपया उपयोग नही किया गया है।
NCAP फंड उपयोग की स्थिति

याचिककर्ता के वकील हर्षवर्धन तिवारी कहते हैं,
”राज्य के अफसरों ने जिस NCAP फंड से हवा साफ होनी थी, माॅनिटरिंग होनी थी, उसका एक रूपया भी खर्च नहीं किया। जबकि वित्त आयोग का पैसा सड़कों, फ्लाईओर व पेवर ब्लॉक में खपा दिया और प्रशासन ने इसे वायु गुणवत्ता सुधार बता दिया।”
इस पूरे मामले पर सरकारी पक्ष जानने के लिए हमने मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क किया। उन्हाेंने यह कहते हुए टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि मामला एनजीटी में विचाराधीन है, इसलिए हम कुछ नहीं कह सकते।
हर्षवर्धन, आगे मध्य प्रदेश में वायु प्रदूषण को सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल बताते है। वे आगे सवाल उठाते हैं, ”दिल्ली की तर्ज पर मप्र में ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) क्यों लागू नहीं है? जब AQI 400 पार करता है, तो हमारे पास स्कूल बंद करने या निर्माण रोकने का कोई प्रोटोकॉल क्यो नहीं है?”
पर्यावरण कार्यकर्ता सुभाष सी पांडे इसे संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन मानते हैं। वे कहते है, ”सरकार को स्वीकार करना होगा कि यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपादा है।आंकड़ों की बाजीगरी से इमेज चमक सकती है लोगों के फेफड़े नहीं।”
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