खंडवा जिले के रहटिया गांव में एक पक्काघर निर्माणाधीन है। इसके आगे के हिस्से में टिन की चद्दर के ऊपर घास और मिट्टी की दीवारों से बनी एक मोटर मकैनिक वर्कशॉप है। मगर यहां गाड़ी का पंचर जोड़ने, डिस्क वायर बदलने और किसी भी तरह की खामी को दूर करने के लिए पुरुष के बजाए एक महिला जुटी हुई है।
यह सुंदर जांभेकर की दुकान है। वही इस वर्कशॉप का संचालन करती हैं। यही उनकी कमाई का मुख्य ज़रिया है। इसी से होने वाली कमाई से वो अपने पक्के घर का निर्माणकार्य करवा रही हैं।
मगर लगभग 5 साल पहले तक वह अपनी आजीविका के लिए पलायन करके महाराष्ट्र के कपास और ‘गन्ने के देस’ में जाती थीं। वह कहती हैं, “हम महाराष्ट्र में कपास तोड़ने जाते थे। कुछ महीने के लिए वापस घर आते और फिर किसी मज़दूरी के लिए निकल जाते।” 2020 में लगे देशव्यापी लॉकडाउन में उन्हें अपने घर लौटने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी। बाद में वह स्पंदन समाज सेवा समिति नामक एनजीओ के संपर्क में आईं और मोटर मैकेनिक की ट्रेनिंग हासिल की।
एनजीओ ने ‘कर्मयोगिनी’ नामक पहल के अंतर्गत उन्हें ट्रेनिंग के अलावा मोटर मकैनिक टूल भी दिए। कच्ची दीवारों पर टिन की छत डाल कर उन्होंने काम शुरू भी कर दिया। अब वह इसे और बेहतर, बड़ा और पक्का करना चाहती हैं। उनके साथ ट्रेनिंग लेने वाली मनीषा चौहान भी अपने संसाधनों को और दुरुस्त करना चाहती हैं ताकि काम आसान हो और कमाई बेहतर हो सके। राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर इनके लिए कई योजनाएं भी हैं। मगर इन्हें न इसके बारे में किसी ने बताया और ना ही कोई लाभ मिला।

मज़दूर से मालिक बनने का सफ़र
सुंदर अपने पलायन के दिन याद करते हुए बताती हैं कि जब महाराष्ट्र के अकोला में खेतों में वो काम करती थीं तो वहां रहने, खाने और पीने के पानी के बहुत ही ख़राब हालत थे। “हमें तंबू बनाकर रहना पड़ता और पीने का पानी भी नहीं मिलता था।” मज़दूरी पर जाने से पहले लकड़ियां इकठ्ठा करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा होता। इसके अलावा उन्हें खुले में ही शौच और नहाना पड़ता था।
सुंदर यह सब बताते हुए उदास हो जाती हैं। वह कहती हैं, “घर पर रहते तो ऐसे खुले नहीं जाना पड़ता। ऐसे नहीं रहना पड़ता।”
इसी तरह बुरहानपुर जिले के साईखेड़ा खुर्द की रहने वाली 24 वर्षीय मनीषा चौहान अपने गांव की अन्य महिलाओं के साथ मज़दूरी पर जाती थीं। वह भी इसी तरह की ख़राब परिस्थितियों से दुखी थीं।
मगर लॉकडाउन के दौरान उन्हें भी मोटर मैकेनिक का प्रशिक्षण प्राप्त करने का मौका मिला। जहां एक ओर सुंदर के परिजन इसके लिए राजी थे वहीं मनीषा के परिजन इसे लेकर असहज थे। वह कहती हैं, “मुझे घरवालों ने कहा कि तुम मैकेनिक का काम करोगी तो गांववाले क्या कहेंगे? मैंने कहा कि जब पलायन पर जाते हैं तब तो वो कुछ नहीं कहते। अपना काम करने में क्या शर्म करना?”
मनीषा को पहले गांव के जो लोग उन्हें ये काम करने से रोकते थे आज वो उनकी गाड़ियां भी बनाती हैं। “लोग कहते हैं कि हमें लगा नहीं था कि आप ये काम कर पाओगी।”
पलायन पर रहते हुए सुंदर का दिन सुबह 4 बजे शुरू हो जाता। ईंट से बने चूल्हे पर खाना बनाने के बाद वो 8 बजे खेत में पहुंच जातीं। यहां शाम को दिन ढलने तक काम करतीं। फिर घर आकर खाना बनाना, पानी भरना और अगले दिन से पहले सो जाना। पूरा दिन काम करके उनको 200 रूपए मज़दूरी मिलती थी। मनीषा की भी प्रतिदिन की कमाई यही थी।
अब वो दिन भर में 1500 रूपए तक कमा लेती हैं। सुंदर की दुकान गांव की मुख्य सड़क पर है। इससे उन्हें ग्राहक मिलने में आसानी होती है। वहीं मनीषा ने भी टिन के शेड से अपनी दुकान बनाई है। काम के टूल्स उन्हें स्पंदन से ही मिले। उन्होंने जगह और दुकान के लिए निर्माण खुद से करवाया। मनीषा अंदाज़ा लगाते हुए कहती हैं कि इसमें लगभग 50,000 का खर्च आया था।

पलायन, प्रयास और पूंजी का संकट
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 45.6 करोड़ लोग यानि कुल जनसंख्या का 38% हिस्सा पलायन करता है। 2001 से 2011 के बीच जहां जनसंख्या 18% की दर से बढ़ी है वहीं पलायन 45% की दर से बढ़ा है। मध्य प्रदेश में 29 लाख 79 हज़ार 492 लोग दूसरे प्रदेशों में पलायन करते हैं। वहीं 2 करोड़ 18 लाख 94 हज़ार 713 लोग प्रदेश में ही पलायन करते हैं।
20 जून 2020 को केंद्र सरकार ने गरीब कल्याण रोज़गार अभियान की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य महामारी के दौरान पलायन से लौटे और सामान रूप से प्रभावित ग्रामीणों को रोज़गार एवं आजीविका के मौके देना था। इसके तहत मध्य प्रदेश सहित 6 राज्यों के कुल 116 जिलों में 25 तरह के काम दिए जाने थे। मध्य प्रदेश में इसके तहत 15,664 लोगों को ट्रेनिंग तो दी गई मगर आधे लोग (6,589) ही प्रशिक्षण के बाद किसी तरह का काम पा सके। मगर इनमें सुंदर और मनीषा दोनों शामिल नही हैं।
स्पंदन समाज सेवा समिति की सीमा प्रकाश बताती हैं कि उनके द्वारा कुल 50 महिलाओं और युवतियों की ट्रेनिंग देने का काम किया गया।
मनीषा ने इसके बाद अपना व्यापार तो शुरू कर लिया मगर उन्हें अब कई और साधनों की ज़रूरत महसूस होने लगी है। वह कहती हैं, “मुझे दिन भर पंप से हवा भरना पड़ता है। अब काम बढ़ रहा है। दिनभर इससे हवा भरने के बाद हाथ और कमर दर्द होने लगती है।” इसलिए वो चाहती हैं कि उन्हें मोटरपंप मशीन मिल जाए। इसके अलावा टिन के ढांचे में काम करना गर्मियों में मुश्किल हो जाता है। वह अपने निर्माण को पक्का करना चाहती हैं। मनीषा चाहती हैं कि वह और भी टूल्स खरीदें, कुछ लोगों को काम पर रखें ताकि कमाई बढ़ाई जा सके।
मगर ऐसा करने में उन्हें पूंजी का संकट है। हालांकि वह अपनी बचत को जोड़कर वर्कशॉप बेहतर कर रही हैं लेकिन खर्चों के आगे यह बचत बहुत कम है।

कहां हैं सरकार?
सुंदर और मनीषा जैसे युवाओं को खुद का रोज़गार शुरू करने में आर्थिक मदद देने के लिए अप्रैल 2022 को मुख्य मंत्री उद्यम क्रांति योजना शुरू की गई थी। इस योजना के तहत मध्य प्रदेश का कोई भी व्यक्ति जिसकी उम्र 18 से 45 साल के बीच है और 8वीं पास है, शामिल है। योजना में सेवा क्षेत्र के लिए 10 लाख से लेकर 25 लाख तक का लोन दिलवाने का वादा किया गया है। लाभार्थी को सरकार द्वारा 7 सालों तक 3% ब्याज अनुदान दिया जाएगा।
मगर इन दोनों महिलाओं को इस योजना के बारे में नहीं पता है। मनीषा कहती हैं कि उन्हें कुछ लोगों ने बैंक से लोन लेने की सलाह तो दी मगर उन्हें लगता है कि इसके लिए भारी ब्याज देना पड़ेगा। इसी तरह सुंदर को भी बैंक से लोन लेने और संबंधित योजनाओं के बारे में कम ही पता है।
योजना के प्रति कम जागरूकता के बारे में बात करने पर जिला उद्योग केंद्र के महाप्रबंधक मनोज रावत कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति इसके लिए जिला व्यापार एवं उद्योग केंद्र में प्रबंधक सपना विजयकर और सहायक प्रबंधक से संपर्क कर सकता है।
ज़िले की वेबसाईट इससे संबंधित सामग्री सर्च करने पर कई लेख नज़र आते हैं। इसमें पवन गौर की सफलता की कहानी भी है जिन्होंने योजना के तहत ऑटो गैरेज खोलने के लिए ही 2,35,000 रूपए का लोन प्राप्त किया है।
हालांकि आर्थिक सर्वे 2025-26 के अनुसार प्रदेश भर में संबंधित वित्तीय वर्ष में कुल 7250 आवेदन ही स्वीकृत किए गए हैं जबकि इसके आधे 4239 आवेदन विचाराधीन थे।
सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर आर्थिक स्वावलंबन की ओर बढ़ रही ये महिलाएं अब भी इन योजनाओं से अछूती है। प्रदेश में योजनाएं तो हैं मगर आंतरिक इलाकों में रह रहे ग्रामीणों तक इनकी जानकारी अब भी कम है। सुंदर अपनी बचत और प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत अपना घर को पक्का कर लेंगी। मगर उनकी दुकान को इसके लिए अब भी इंतज़ार करना पड़ेगा।
बैनर ईमेज – अपनी मोटर वर्कशॉप में काम करतीं सुंदर जांभेकर | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल
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