मध्य प्रदेश सरकार की 2 सितंबर 2025 को आयोजित कैबिनेट की बैठक में प्रदेश सरकार ने जल जीवन मिशन के लिए कुल 2,813.21 करोड़ की 27,990 सिंगल विलेज टैप और 148 ग्रुप वाटर सप्लाई स्कीम को मंज़ूरी दी थी। इस दौरान प्रेस वार्ता में प्रदेश के शहरी विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा,
“नल जल योजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार ज़्यादातर बीमारियां वाटर-बोर्न होती हैं। और प्रधानमंत्री मोदी का सपना देश को स्वस्थ्य बनाने का है।”
प्रदेश की राजधानी से 229 किमी दूर बड़वानी जिले के सजवानी गांव में इसी योजना के तहत बिछाई गई पाईपलाइन से आ रहे दूषित पानी पानी पीने से कई लोग बीमार हो गए। गणेश परमार ने बताया कि गांव में दस्त लगने की समस्या धनतेरस 18 अक्टूबर 2025 से शुरु हुई। अगले 2 दिनों में 6120 की जनसंख्या वाले गांव में करीब 200 लोग इसकी चपेट में आ गये।
फिलहाल प्रशासन ने प्रदाय किए जा रहे पानी का पेयजल के रुप में इस्तेमाल न करने की सलाह दी है। गांव में पेयजल के 4-5 टेंकर भिजवाए हैं मगर ग्रामीणों का कहना है कि यह उनकी ज़रूरत के बरक्स नाकाफी हैं।
योजना के सरकारी डाटा पोर्टल के अनुसार गांव के सभी 1161 घरों में योजना के अंतर्गत टैप वाटर कनेक्शन दिया गया है। ग्रामीण हमसे बात करते हुए कहते हैं कि जलप्रदाय लाइनें गंदे नाले से गुज़ारी गई हैं। उन्होंने पाइपलाइन के क्षतिग्रस्त होने और वाल्व की लीकेज को ठीक करने की शिकायत की थी मगर प्रशासन ने उस पर कोई सुनवाई नहीं की।
इस योजना को लेकर कई सरकारी दावे किए गए हैं। कई गांव ऐसे हैं जहां 100% कवरेज दिखाया गया है। ऐसे में ग्राउंड रिपोर्ट ने सरकारी दस्तावेज़ों और ज़मीनी पड़ताल करके इस योजना की धरातलीय सच्चाई जानने की कोशिश की।

जल जीवन मिशन: शुरुआत से अब तक
जल जीवन मिशन (JJM) की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 के लाल किले के संबोधन में की थी। सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार मिशन की शुरुआत से लेकर 18 अगस्त 2025 तक 5.82 लाख गांव के 15.69 करोड़ (81.02%) घरों तक टैप वाटर कनेक्शन पहुंच चुका है। आंकड़ों के अनुसार 2.63 लाख गांवों में 100% घरों तक टैप वाटर कनेक्शन पहुंच चुका है।
इस मिशन का लक्ष्य 2024 तक देश के हर घर में नल से पानी पहुंचाना था। हालांकि देश में नल से जलप्रदाय कवरेज की अत्यंत कमजोर स्थिति और देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक तथा भौगोलिक विभिन्नताओं के कारण 5 वर्षों की समय सीमा में हर घर पानी पहुंचाने का लक्ष्य अत्यंत महत्वकांक्षी प्रतीत हो रहा था। लक्ष्य से दूर रही इस योजना की अवधि केंद्र सरकार ने बढ़ाकर 2028 कर दी है।
भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें
मैदानी जांच और सरकारी दस्तावेजों के अध्ययन से हमने पाया कि बड़वानी और धार जिलों में जल जीवन मिशन के तहत स्वीकृत पेयजल योजनाओं में गुणवत्ताहीन निर्माण सामग्री का उपयोग किया गया।
ग्राउंड रिपोर्ट को प्राप्त 4 अप्रैल 2023 के एक आदेश में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग, इंदौर द्वारा बताया गया कि धार जिले के निसरपुर विकास खंड के विभिन्न गांव में मिशन के तहत काम करने का ठेका अहमदाबाद स्थित फर्म ‘मेसर्स जय खोडियार इंटरप्राइजेज’ को दिया गया था। 4 फ़रवरी 2021 को आवंटित यह काम 6 माह में पूरे होने थे। मगर 2023 के इस आदेश तक फार्म द्वारा काम पूरे नहीं किए गए।
आखिरकार अप्रैल 2023 में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा ठेकेदार फर्म को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। ब्लैकलिस्टेड होने के बावजूद अधिकारी इस ठेकेदार फर्म से अधूरे काम पूरे करने का निवेदन करते रहे। नतीजे में, इस फर्म द्वारा गुणवत्ताहीन सामग्री का उपयोग कर पूर्ण दिखाए गए काम 4 साल बाद आज भी अधूरे पड़े हैं।
इसी दौरान कंपनी द्वारा निर्माण सामग्री परीक्षण रिपोर्ट में किया गया फर्जीवाड़ा भी उजागर हुआ। प्लास्टिक सामग्री की गुणवत्ता का निर्धारण एक सरकारी एजेंसी सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोकेमिकल्स् इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नोलॉजी (CIPET) द्वारा किया जाता है। सीपेट के भोपाल कार्यालय ने अगस्त 2023 में खुलासा किया कि उसने मेसर्स जय खोडियार इंटरप्राइजेज द्वारा उपयोग किए गए प्लास्टिक (एचडीपीई) पाईप की कोई रिपोर्ट जारी नहीं की है। यानी फर्म द्वारा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग को प्रस्तुत सीपेट रिपोर्ट फर्जी थी। फर्म के इस अस्वीकार्य फर्जीवाड़े के बावजूद विभाग ने फर्म के खिलाफ कोई कार्रवाई करने के बजाय योजना में उपयोग किए गए पाईप बदलने का आदेश दिया।
लेकिन फर्म ने इस आदेश का भी पालन नहीं किया। विश्वनाथखेड़ा (बड़वानी) के ग्रामीणों ने हमें बताया कि ठेकेदार ने गुणवत्ताहीन पाईप नहीं बदले हैं। इस संबंध में जब आधिकारिक पक्ष जानने के लिए हमने लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग, बड़वानी के कार्यपालन यंत्री आरएस बामनिया से बात की तो ने इस संबंध में गांववार स्पष्ट जवाब देने के बदले गोलमाल जवाब दिया कि कुछ जगहों पर कंपनी ने पाईप बदले हैं।

136 करोड़ का भ्रष्टाचार
जल जीवन मिशन से संबंधित योजनाओं में भ्रष्टाचार की पुष्टि रीवा जिले की सरकारी रिपोर्ट से भी हुई है। कलेक्टर रीवा द्वारा गठित जांच दल ने पाया कि अधिकारियों और ठेकेदारों मिलीभगत से फर्जी प्रगति रिपोर्ट के आधार पर 136 करोड़ रुपए का भ्रष्टाचार किया है।
जांच दल ने पाया कि 90% से अधिक गांवों में नल तो लगा दिए गए, लेकिन उनमें पानी की आपूर्ति नहीं होने के बावजूद ठेकेदारों को भुगतान कर दिया गया। दोषियों पर कार्यवाही करने की अनुशंसा करते हुए रिपोर्ट का निष्कर्ष यही निकलता है कि रीवा में मिशन पूर्णतः सफल नहीं हो सका।
इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने वाले रीवा के राजनैतिक कार्यकर्ता विनोद शर्मा कहते हैं,
“किसी भी भ्रष्टाचार में राजनैतिक संरक्षण का शक होता है। लेकिन भ्रष्टाचार साबित हो जाने के बाद भी यदि उस पर कार्यवाही न की जाए तो यह शक यकीन में बदल जाता है।”
शर्मा द्वारा मामले की शिकायत आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ, रीवा मे दर्ज करवा दी गई है। प्रकरण में शिकायतकर्ता के बयान भी दर्ज किए जा चुके हैं।
मंत्री के खिलाफ जांच और क्लीन चिट
पिछले दिनों एक हजार करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोप में प्रदेश की लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री संपतिया उईके के खिलाफ जांच के आदेश जारी हो गए। यह आदेश पूर्व विधायक किशोर समरीते द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय में की गई शिकायत के संदर्भ में जारी हुआ था। शिकायत के अनुसार मंत्री ने यह भ्रष्टाचार मैदानी अधिकारियों से मिल कर किया है। हालांकि केवल 10 दिन में ही मंत्री को क्लीन चिट दे दी गई। मंत्री की जांच का आदेश देने वाले प्रमुख अभियंता संजय अंधवान को ही अनुशासनहीनता का नोटिस जारी कर दिया।
उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार का संदेह मध्यप्रदेश में मध्यावधि समीक्षा के बाद लागत में बड़े बदलाव से हुआ। जल जीवन मिशन की योजनाओं से छूटे 8 लाख घरों को शामिल करने के लिए 8425 एकलग्रामनल-जलयोजनाओं की समीक्षा की गई जिससे इन योजनाओं की लागतमें 2800 करोड़ की बढ़ौत्तरी हो गई। इस वृध्दि को केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने स्वीकार करने से इंकार कर दिया। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री संपतिया उईके के प्रभार वाले सिंगरौली जिले की योजनाओं में हुई अप्रत्याशित 265% बढ़ौत्तरी से संदेह गहराया और शक की सुई मंत्री की ओर भी घूम गई।

सिलिकोसिस पीड़ित गांव और योजना
धार जिले के अंतर्गत आने वाला बलवानी गांव विंध्याचल पर्वत श्रंखला की मध्यम ऊंचाई की पहाड़ियों के बीच बसा है। यहां रहने वाली माधवी भाबर ने बताया कि 2005 से उनके गांव से लोगों का मजदूरी के लिए गुजरात की ओर पलायन शुरू हुआ। भाबर के अनुसार लगभग 2 साल में इस तरह पलायन करने वाले लगभग 100 लोग जब वापस आए तो वह बीमार पड़ गए।
2007 में ‘स्वास्थ्य अधिकार मंच’ के माध्यम से ग्रामीणों को पता चला कि गुजरात से लौटे लोगों को लाईलाज बीमारी सिलिकोसिस है। कांच (Silica) के महीन कण फेफड़ों में चले जाने से बीमार की कमजोरी से मौत भी हो जाती है।
भाबर बताती हैं कि उनके गांव के 21 लोगों की सिलिकोसिस से मौत हुई है। इस आंकड़े में उनके 2 भाई और एक भाभी भी शामिल हैं। जो जिंदा हैं वे भी कोई शारीरिक श्रम नहीं कर पाते हैं।
ऐसे में घर-घर पानी पहुंचना यहां के लिए एक बेहद ज़रूरी चीज़ है। जल जीवन मिशन पोर्टल के अनुसार इस गांव के सभी 303 घरों में नल जल का कनेक्शन पहुंच चुका है।
मगर भाबर कहती हैं, “दवणीपुरा ऊंचाई पर बसा फलिया (मोहल्ला) है। यहां कई सिलिकोसिस पीड़ित रहते हैं। लेकिन,इस फलिए तक पाईपलाईन ही नहीं डाली गई है। मानकरपुरा फलिए में रहने वाले गरीब परिवारों को समय-समय पर पानी से इसलिए वंचित कर दिया जाता है कि वे 100 रुपए महिना जलप्रदाय शुल्क नहीं चुका पाते हैं। ट्यूबवेल की मोटर खराब होती है तो न तो लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग उसे ठीक करता है और न ही ग्राम पंचायत। दोनों का कहना है कि सरकार ने एक बार योजना बना कर सौंप दी है अब गांव वाले खुद इसे चलाएं। जिन घरों में कमाने वाले सदस्य सिलिकोसिस से पीड़ित हैं, काम नहीं कर पाते वे भला कैसे चलाएं?”
सरकारी पोर्टल के अनुसार मिशन के अंतर्गत गांव में 4 सरकारी परियोजना काम कर रही हैं। इनकी कुल लागत 1,47,266 लाख रूपए है। भाबर कहती हैं, “यह खर्च हमारी कल्पना से परे है। यदि सरकार हमें एक नल कनेक्शन के लिए खर्च की गई राशि उपलब्ध करवा दे तो हम उतने पैसे में पूरे फलिए को पानी पिला सकते हैं।”

मंत्री सांसद के गांवों की स्थिति
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के बड़वानी जिला पंचायत अध्यक्ष बलवंत पटेल ने खुद सार्वजनिक रुप से स्वीकार किया कि बड़वानी जिले के 80% गांवों में पानी नहीं पहुंचा। पटेल के गांव मेणीमाता (बड़वानी) में योजना शुरु नहीं हो पाई। इसी तरह बड़वानी लोकसभा सांसद गजेन्द्र पटेल के गांव पान्या और राज्यसभा सांसद सुमेरसिंह सोलंकी के गांव ठान (बड़वानी) में भी हर घर नल कनेक्शन नहीं हो पाया है।
27 गांवों की तलून समूह जलप्रदाय योजना के अंतर्गत आने वाले ग्राम बालकुआ में जलप्रदाय योजना का संचालन बहुत ही अस्वास्थकर परिस्थितियों में किया जा रहा है। कुछ स्थांनों पर पाईप जमीन के ऊपर हैं जबकि कुछ स्थानों पर सीवर लाईन (गटर) के साथ पाईप लाईनें डाली गई है। नाले का गंदा पानी लीकेज पाईप लाईन में भर जाता है जो जल वितरण के समय घरों में पहुंच जाता है। ठेकेदार कंपनी टूट-फूट की मरम्मत पर भी कोई ध्यान नहीं दे रही है। पाईप लाईन डालने के लिए तोड़े गए खरंजों को भी कंपनी ने ठीक नहीं किया था। बाद में पंचायत को अपने स्तर पर यह काम करवाना पड़ा। वाटरमैन मोहन परमारने बताया कि कुछ वाल्व 2-3 माह पहले खराब हो चुके हैं लेकिन ठेकेदार कंपनी उन्हें सुधार नहीं रही है।
गांव में ऊंचाई पर बसे भेरुबाबा, तेजल बाबा और टॉवर इलाके में पर्याप्त प्रेशर नहीं मिलता। टॉवर क्षेत्र में पानी पहुंचाने के लिए 1200 फूट पाईप लाईन पंचायत को डालनी पड़ी। जल जीवन मिशन की योजना से एक दिन छोड़कर जल आपूर्ति की जाती है जो ग्रामीणों के लिए पर्याप्त नहीं है इसलिए ग्राम पंचायत की पूर्व निर्मित योजना से भी जलप्रदाय करना पड़ता है। यदि पंचायत की योजना किसी कारण से बंद हो जाए तो गांव में जल संकट खड़ा हो जाएगा।
आज भी जारी पुरानी जलप्रदाय व्यवस्था
देशभर में जल जीवन मिशन के निराशाजनक प्रदर्शन से धार जिले के पूरा गांव (तहसील-कुक्षी, जिला-धार) के निवासी पूरी तरह अप्रभावित हैं। कारण, न तो उनके गांव में जल जीवन मिशन योजना आई है और न ही उन्हें ऐसी किसी योजना में कोई रुचि है। 30 साल पहले शुरु की गई गांव की जलप्रदाय योजना आज भी बिना किसी बाधा के जारी है। स्थानीय समुदाय की जरुरत का आकलन किए बिना हड़बड़ी में थोपी जा रही अत्यंत महँगी योजनाओं के दौर में यह विकेंद्रित योजना एक मिसाल है।
अस्सी-नब्बे के दशकों में इस इलाके को कई बार अल्प वर्षा और सूखे का सामना करना पड़ा। छोटे जलस्रोत रीतने लगे। स्थाई जलस्रोतों से दूर स्थित गांवों में पीने के पानी का संकट हो गया था। ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए तब के बुजुर्गों मोतीलाल बाबा,दयाराम दादा,कोरजी बाबा,शिवजी बाबा,हीरा बाबा आदि ने 4 किमी दूर ग्राम चिखल्दा स्थित नर्मदा नदी से पेयजल प्रबंध की योजना बनाई। योजना के लिए इंजीनियर, प्लंबर, मजदूर जिस कौशल की जरुरत पड़ी सारी भूमिकाएँ ग्रामीणों ने ही निभाई।
इस जलप्रदाय योजना का संचालन पाटीदार समाज पंच करता है। हर साल बारी-बारी से 5 परिवारों को जलप्रदाय की जिम्मेदारी दी जाती है जिसे ‘सेवा’ कहा जाता है। चयनित परिवारों को बिना किसी पारितोषिक के जलप्रदाय और मरम्मत का काम करना पड़ता है। मरम्मत कार्य के लिए दिए जाने वाले समय के साथ परिवहन खर्च भी सेवादार परिवारों को उठाना पड़ता है। दिन में 2 बार जलप्रदाय करने वाली इस योजना में महीने का जलप्रदाय शुल्क 30 रुपए निर्धारित है। जगदीश पाटीदार ने बताया कि उनके गांव में ज्यादातर लोग एडवांस में जल दरों का भुगतान करते देते हैं। किसी पर कोई बकाया नहीं रहता है।

गांव के बुजुर्गों द्वारा 30 साल पहले शुरु की गई जलप्रदाय योजना नई पीढ़ी के सेवाभावी दृष्टिकोण के कारण आज भी सफलतापूर्वक संचालित हो रही है। वल्लभ पाटीदार (55) ने बताया कि उन्हें याद नहीं है कि इस योजना के बाद गांव में कभी भी गांव में एक दिन से अधिक जलप्रदाय बाधित रहा हो।
पिछले साल 2024 में गांव के बोर वेल में समस्या होने पर गांव से 2 किलोमीटर दूर 15 लाख खर्च कर पेयजल व्यवस्था दुरस्त की गई। पाटीदार पंच ने यह राशि कुल्मी पाटीदार समाज की कृषि ज़मीन से होने वाली आय से खर्च की गई है। पंच प्रदीप रामेश्वर पाटीदार ने बताया कि निर्बाध जलापूर्ति के लिए जलस्रोत पर सोलर सिस्टम लगाया जाना प्रस्तावित है।
लगातार असफल हो रही जल जीवन मिशन की योजनाओं की भीड़ में इस छोटे से गांव ने सफलता की एक मिसाल कायम की है।
जल जीवन मिशन की शुरुआत ग्रामीण इलाकों में न केवल नल बल्कि उससे स्वक्छ जल पहुंचाने के लिए की गई थी। मगर मध्य प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों और सरकारी कागजों की पड़ताल करते हुए हमने पाया कि यह योजना सरकारी फाइलों में तो सफल है मगर असल में फेल। बालकुआं के लोगों को त्यौहार के दिन भी अस्पताल के चक्कर काटने पड़े क्योंकि योजना के तहत हुई लापरवाही के कारण वह लोग दूषित जल पीने को मजबूर थे। अब यह मिशन 2028 तक जारी रहने वाला है। अगर सरकारी आंकड़ों को आधार मानें तो अब भी लगभग 20% घरों में नल पहुंचना बाकी है। ऐसे में आने वाले समय में सरकार को न सिर्फ बचे हुए घरों में योजनाबद्ध, नीतिगत और नौतिक रूप में पानी पहुंचाना होगा बल्कि अब तक जहां-जहां गड़बड़ियां हुई हैं उनको सुधारना भी होगा।
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