Read in English | राजगढ़ | भारत में हर आठ मिनट में एक महिला सर्वाइकल कैंसर से दम तोड़ती है। वैश्विक स्तर पर इस बीमारी से होने वाली कुल मौतों में भारत की हिस्सेदारी लगभग 21 से 25 प्रतिशत है। इन चिंताजनक आंकड़ों के मद्देनजर भारत सरकार ने 28 फरवरी 2026 को एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया, जिसके तहत 14 वर्ष तक की लगभग 1.15 करोड़ किशोरियों को मुफ्त एचपीवी (ह्यूमन पेपिलोमावायरस) टीका लगाया जाएगा।
लेकिन मध्य प्रदेश के राजगढ़ शहर की तंग गलियों और दूर-दराज के गाँवों में यह लड़ाई सिर्फ कैंसर के खिलाफ नहीं है — यह उस अविश्वास के खिलाफ भी है, जो अफवाहों, भ्रामक वायरल वीडियो और कोविड-19 महामारी के बाद से जड़ें जमा चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) टीका-हिचकिचाहट को वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़े खतरे के रूप में चिह्नित करता है, खासकर निम्न और मध्यम आय वाले देशों में।
ज़मीनी स्तर पर इस अभियान की सफलता का सारा दारोमदार अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों के कंधों पर है।
“लड़की का इलाज चल रहा है”: डर को छुपाने के बहाने

राजगढ़ शहर के वार्ड नंबर 1 (भाग 2) में तैनात आंगनबाड़ी कार्यकर्ता शिल्पी साहू हर रोज़ इसी अविश्वास की दीवार से टकराती हैं। 28 फरवरी को अभियान शुरू होने के बाद से वे परिवारों को जागरूक करने में जुटी हैं। उनके वार्ड में लक्ष्य छोटा था, लेकिन उसे पूरा करना उम्मीद से कहीं अधिक कठिन साबित हो रहा है।
सात पात्र लड़कियों में से अब तक केवल दो को ही टीका लग पाया है। शिल्पी प्रतिदिन घर-घर जाकर परिवारों को समझाने की कोशिश करती हैं। वे कहती हैं, “मैं रोज़ दरवाज़ा खटखटाती हूँ, बेटियों को टीका लगवाने की गुज़ारिश करती हूँ। लेकिन बार-बार समझाने के बावजूद परिवार साफ मना कर देते हैं।”
गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स), गर्भाशय का वह निचला हिस्सा है जो योनि से जुड़ता है। WHO के अनुसार, सर्वाइकल कैंसर के लगभग 99 प्रतिशत मामले उच्च जोखिम वाले एचपीवी वायरस के लगातार संक्रमण से होते हैं — यह वायरस यौन संपर्क के ज़रिए फैलता है। एचपीवी के 100 से 200 से अधिक प्रकार हैं, जिनमें से कम से कम 13 उच्च जोखिम वाले हैं और कैंसर का कारण बन सकते हैं। अधिकांश एचपीवी संक्रमण शरीर की प्रतिरोधक क्षमता से अपने आप ठीक हो जाते हैं और इनके कोई लक्षण नहीं होते। लेकिन जब उच्च जोखिम वाले प्रकार वर्षों तक बने रहें, तो वे चुपचाप कोशिकाओं में असामान्य बदलाव कर कैंसर का रूप ले लेते हैं।
इसकी पहचान इसलिए और कठिन हो जाती है क्योंकि एचपीवी के शुरुआती लक्षण प्रायः नहीं होते, और सर्वाइकल कैंसर को विकसित होने में कई साल लग सकते हैं। WHO के अनुसार, स्क्रीनिंग टेस्ट इसीलिए अहम हैं — यह एकमात्र एचपीवी-संबंधी कैंसर है जिसमें प्रभावी जाँच उपकरण उपलब्ध हैं।

शिल्पी टीके का महत्व भली-भाँति समझती हैं। लेकिन जब बात माता-पिता की हिचकिचाहट की आती है, तो उनकी तमाम जानकारी भी अक्सर कम पड़ जाती है। ग्राउंड रिपोर्ट की टीम ने जब शिल्पी के साथ क्षेत्र भ्रमण किया, तो देखा कि इनकार अक्सर बहानों की ओट में छुपा होता है।
एक घर में अभिभावक शांती बाई गुर्जर ने कहा कि उनकी बेटी का इलाज चल रहा है, इसलिए वह टीका नहीं लगवा सकती। शिल्पी ने पूछा कि क्या डॉक्टर ने ऐसा कहा है। माँ ने आँखें चुराते हुए हाँ कहा। यह टाल-मटोल स्पष्ट थी — पास खड़ी बेटी अजीब तरह से सिर हिला रही थी। लेकिन जब डॉक्टर का पर्चा या कोई चिकित्सीय दस्तावेज़ माँगा गया, तो कुछ पेश नहीं किया गया। यह दावा महज़ एक मौखिक बहाना था — बात खत्म करने का तरीका।
2025 में पंजाब में हुए एक अध्ययन ने एचपीवी टीकाकरण की कम दर के पीछे मुख्य कारण बताए — जानकारी का अभाव (90.1%) और टीके की ऊँची कीमत (5.9%)।
कोविड टीके की परछाईं: “अपनी बेटी के साथ जोखिम क्यों लूँ?”
राजगढ़ के डाक बंगला इलाके में गोपाल मेवाड़े के घर के बाहर यह अविश्वास एक और परत लिए हुए है। जब उनकी बेटी के टीकाकरण की बात की गई, तो उन्होंने मना कर दिया। उनकी यह हिचकिचाहट उनकी पत्नी यशोदा मेवाड़े की तबीयत से जुड़ी है — गोपाल का मानना है कि कोविड टीका लगने के बाद उनकी हालत बिगड़ गई।
वे कहते हैं, “उन्हें अब सांस फूलने और घबराहट की शिकायत रहती है, और इलाज का खर्च बढ़ गया है। पहले वे बिल्कुल ठीक थीं। अगर मेरी बेटी के साथ भी ऐसा हुआ, तो मैं उसे कहाँ ले जाऊँगा?”
वैज्ञानिक दृष्टि से कोविड-19 टीका और एचपीवी टीका बिल्कुल अलग हैं। लेकिन गोपाल जैसे लोगों के लिए “टीका तो टीका ही होता है” — यह भेद उनके लिए बेमानी है। उन्हें याद है कि महामारी के दौरान कहा गया था कि टीका लगवाने के बाद भी बीमारी पड़ने की “कोई गारंटी नहीं।” वे बुखार या सिरदर्द जैसी सामान्य, अल्पकालिक प्रतिक्रियाओं को भी गंभीर और दीर्घकालिक नुकसान का संकेत मानते हैं।
वास्तव में, ये दुष्प्रभाव अस्थायी होते हैं और इस बात का सामान्य संकेत हैं कि शरीर सुरक्षा बना रहा है। WHO ने स्पष्ट किया है कि टीका शरीर में रक्त प्रवाह बढ़ाता है ताकि अधिक प्रतिरक्षा कोशिकाएँ संचारित हो सकें, और शरीर का तापमान बढ़ाता है ताकि वायरस नष्ट हो सके — यानी ये संक्षिप्त दुष्प्रभाव इस बात की निशानी हैं कि टीका काम कर रहा है।

दिसंबर 2020 से जून 2021 के बीच करीब दस लाख सर्वेक्षण प्रतिक्रियाओं पर आधारित एक अध्ययन के अनुसार, भारत में कोविड टीके को लेकर हिचकिचाहट राज्यों में अलग-अलग थी। सबसे अधिक तमिलनाडु में (40%), फिर पंजाब (33%), हरियाणा (30%), गुजरात (29%), आंध्र प्रदेश (29%) और मध्य प्रदेश (22%) में थी। इसी सर्वेक्षण में हिचकिचाहट के प्रमुख कारण बताए गए — दूसरों का इंतज़ार (42%), कम ज़रूरत का अहसास (35%), दुष्प्रभावों का डर (34%), प्रभावशीलता पर संदेह (21%) और अविश्वास (11%)। उल्लेखनीय बात यह रही कि 2020-21 में 12 महीनों के भीतर यह हिचकिचाहट 37 प्रतिशत से घटकर केवल 12 प्रतिशत रह गई।
इसमें एक लैंगिक पहलू भी है। प्रति 1,000 पुरुषों पर केवल 891 महिलाओं को टीका लगाया गया। 2024 के एक अध्ययन ने इस असमानता की सांस्कृतिक और सामाजिक-आर्थिक जड़ों की पहचान की — भारत में वयस्क टीकाकरण की अवधारणा ही कमज़ोर है, और सांस्कृतिक रूप से महिलाओं के स्वास्थ्य को कभी भी प्राथमिकता नहीं दी जाती।
सोशल मीडिया: गलतफहमियों का डिजिटल वायरस

राजगढ़ के पास स्थित काली तलाई जैसे गाँवों में यह भ्रामक जानकारी अब दुश्मनी का रूप ले चुकी है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सावित्री गुर्जर कहती हैं कि जब वे टीकाकरण के लिए लोगों से बात करने जाती हैं, तो उनके साथ बदतमीजी होती है। परिवार न उन्हें घर में आने देते हैं और न ही बात करते हैं। एक वीडियो में जब सावित्री ने टीके का ज़िक्र किया, तो एक किशोरी तुरंत कमरे में भाग गई। कुछ परिवारों को अस्पताल तक ले जाने में कामयाबी मिली, लेकिन वे टीका लगने से ठीक पहले डर के मारे वापस चले गए।
ANM (ऑग्ज़िलियरी नर्स मिडवाइफरी) रेखा द्विवेदी बताती हैं कि एक वायरल वीडियो तेज़ी से फैल रहा है जिसमें झूठा दावा किया जा रहा है कि एचपीवी टीका लगवाने से लड़कियाँ भविष्य में बाँझ हो जाएंगी। तेज़ संगीत, अतिरंजित भाषा और तेज़ एनीमेशन से लैस यह वीडियो डर पैदा करने के लिए बनाया गया है।
हालाँकि उसी सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि इंटरनेट की पहुँच और वास्तविक टीकाकरण कवरेज के बीच एक “सकारात्मक संबंध” है — यानी इंटरनेट सिर्फ भ्रम नहीं फैलाता, जागरूकता भी बढ़ाता है।
WHO, CDC और इंडियन अकादमी ऑफ पीडियाट्रिक्स जैसी प्रमुख वैश्विक स्वास्थ्य संस्थाएँ स्पष्ट रूप से कहती हैं कि एचपीवी टीके का प्रजनन क्षमता पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। बल्कि यह उन स्थितियों से बचाता है जिनके इलाज में रेडिएशन थेरेपी जैसे उपचार करने पड़ते हैं, जो प्रजनन स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
लगभग 160 देशों ने एचपीवी टीके को अपनाया है और 90 देशों ने एकल-खुराक कार्यक्रम शुरू किया है। दुनिया भर में 50 करोड़ से अधिक खुराकें दी जा चुकी हैं। राजगढ़ जिला अस्पताल के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. शोभा पटेल के अनुसार, अब तक कोई दीर्घकालिक दुष्प्रभाव दर्ज नहीं किया गया है। उन्होंने बताया कि अस्पताल में “3,000 खुराकें दी गई हैं और एक भी दुष्प्रभाव सामने नहीं आया।” उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि कोल्ड चेन प्रबंधन और टीकाकरण के बाद निगरानी के नियमों का कड़ाई से पालन किया जा रहा है।
भरोसा बनाना: सबसे बड़ी चुनौती

2023 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि “आपातकाल (1976-77) के बाद जन्मे बच्चों में टीकाकरण और अस्पताल में प्रसव की संभावना कम थी।” इससे आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसा कमज़ोर हुआ, खासकर दिल्ली के निकट उन क्षेत्रों में जहाँ ज़बरदस्ती का स्तर अधिक था। पोलियो उन्मूलन अभियान के दौरान भी मुस्लिम समुदाय में हिचकिचाहट देखी गई थी। द न्यूयॉर्क टाइम्स ने 2003 में रिपोर्ट किया था कि इस अभियान ने भी स्वास्थ्य संस्थाओं के प्रति उसी पुराने अविश्वास को जगा दिया था।
चूँकि स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसे को सीधे नहीं मापा जा सकता, इसलिए शोधकर्ता अक्सर कम टीकाकरण दर को ही अविश्वास और हिचकिचाहट का संकेत मानते हैं। कोविड-19 टीकाकरण अभियान के बाद हुए कई अध्ययनों और सर्वेक्षणों ने समुदायों के साथ भरोसा बनाने और जानकारी साझा करने की अहमियत पर ज़ोर दिया है।
राजगढ़ जिला अस्पताल के कर्मचारी जितेंद्र सोंगिरा ने खुद एक मिसाल पेश की। वे अपनी 14 वर्षीय बेटी काशी सोंगिरा को खुद साथ ले जाकर एचपीवी टीका लगवाया। वे कहते हैं, “मैं अपनी बेटी से बहुत प्यार करता हूँ और कैंसर के खतरों को समझता हूँ। यह टीका पूरी तरह सुरक्षित है और उसे एक जानलेवा बीमारी से बचाएगा। सरकारी नीतियाँ भविष्य में बदल सकती हैं — जब यह मुफ्त सुरक्षा उपलब्ध है, तो इसका लाभ उठाना चाहिए।” उन्होंने अन्य माता-पिता से भी देर न करने की अपील की।
तमाम हिचकिचाहट के बीच एक उत्साहजनक खबर भी है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 16 मार्च को X पर पोस्ट किया कि प्रदेश ने “मात्र 15 दिनों में एक लाख से अधिक बेटियों का टीकाकरण” कर लिया।
लेकिन एक बात स्पष्ट है — टीका उपलब्ध करा देना काफी नहीं है। शिल्पी साहू जैसी अग्रिम पंक्ति की कार्यकर्ताओं को न केवल जटिल वैज्ञानिक सवालों के जवाब देने पड़ते हैं, बल्कि वर्षों की शंका और भ्रामक जानकारी से लड़ते हुए भरोसे की नींव भी रखनी पड़ती है। हर हिचकिचाते परिवार के पीछे संदेह का एक लंबा इतिहास है। फिर भी रेखा द्विवेदी के लिए हर टीका लगवाई गई बच्ची एक कदम आगे की निशानी है — उनकी और उनके जैसे तमाम स्वास्थ्यकर्मियों की लगातार मेहनत, बातचीत और भरोसे की जीत।
यह रिपोर्ट Ground Report और Feminism in India की एक संयुक्त शृंखला का हिस्सा है।
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