फरवरी की एक दोपहर में फुल्कई अपने पति और पोते के साथ घर के अगले हिस्से में बैठी हुई हैं। लगभग 1.5 घंटे की बातचीत में मेरे साथ मौजूद सामाजिक कार्यकर्ता सीमा प्रकाश उनको हर बार ‘फुल्कई माई’ कह कर पुकारती हैं। इस कोरकू परिवार के 14 सदस्य 5 कमरों के कच्चे घर में रहते हैं। मगर फुल्कई की 3 नाती बहुएं अपने पतियों के साथ ‘ईंट के देस’ और ‘गन्ने के देस’ यानि ईंटभट्टे और गन्ने के खेतों में काम करने के लिए दूसरे ज़िलों और राज्य में गए हुए हैं। फिलहाल उनके पास उनकी एक बहु और बेटा हैं मगर सुबह होते ही वह भी काम पर निकल जाते हैं।
लगभग 9 साल पहले उनका घर इतना खाली नहीं होता था। फुल्कई अपनी बेटी के साथ मिलकर खंडवा ज़िले के अम्बाड़ा गांव में क्रैश (crèche) चलाती थीं। गांव की ऐसी महिलाएं जो मज़दूरी करने के लिए आस-पास के खेतों में जाती थीं वह अपने बच्चे क्रैश में छोड़ जातीं। यहां दोनों कोरकू महिलाएं अपने घर में ही बच्चों को खाना खिलातीं और सुनिश्चित करतीं कि बच्चा सुरक्षित और पोषित रहे। लगभग 3 साल तक चलने के बाद यह क्रैश बंद हो गया। अब फुल्कई सरकार और सामाजिक संस्थाओं से इसे वापस शुरू करने की अपील कर रही हैं।

“कुत्ते बच्चों के हाथ से रोटी छुड़ा लेते थे”
57 साल की यह महिला पुराने दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि 2009 से 2018 तक उनके गांव सहित पूरे खालवा में बहुत कुपोषण था। उस दौर की विकटता को याद करते हुए वह कहती हैं, “कुत्ते बच्चों के हाथ से रोटी छुड़ा लेते थे, उनको काट लेते थे।” उनकी पंचायत की एकमात्र आंगनवाड़ी लगभग 6 किमी दूर थी। इस दूरी के चलते ज़्यादातर परिजन अपने बच्चों को वहां नहीं ले जा पाते।
इसी बीच उनकी मुलाक़ात स्पंदन समाज सेवा समिति की सीमा प्रकाश से हुई। उन्होंने फुल्कई को अपने घर में क्रैश खोलने के लिए प्रेरित किया। उनके लिए यह शब्द नया था। स्पंदन के कार्यकर्ताओं के ज़रिए उन्हें पता चला कि क्रैश एक ऐसी जगह है जहां माता-पिता अपने बच्चों को छोड़कर काम पर जा सकते हैं। यहां बच्चों को उनके सकल विकास के लिए बेहतर माहौल दिया जाता है। क्रैश आमतौर पर 6 साल तक के बच्चों को ग्रुप केयर देने के लिए बनाए जाते हैं, जिन्हें दिन में घर से दूर देखभाल, गाइडेंस और सुपरविज़न की ज़रूरत होती है।
हालांकि फुल्कई इसे इस रूप में समझ सकीं कि उन्हें अपने गांव के बच्चों को सुबह 8 से शाम 6 बजे तक अपने घर में रखना होगा। इस दौरान उन्हें खाना खिलाने और उनकी देखभाल करने की ज़िम्मेदारी फुल्कई की थी। हालांकि पहली बार जब सीमा ने इसका ज़िक्र फुल्कई से किया तो उन्होंने यह ज़िम्मेदारी लेने से मना कर दिया। इसका कारण बताते हुए वह कहती हैं, “मैं सोची कि इतने सारे बच्चों की ज़िम्मेदारी मैं कैसे उठा पाउंगी।” लेकिन अपनी बेटी से बात करने के बाद वह इसके लिए राज़ी हो गईं।
उनकी बेटी श्यामवती तब केवल 14-15 साल की थी। अपनी बेटी को याद करते हुए फुल्कई केवल इतना कहती हैं, “वो भी कमज़ोर और दुबली-पतली थी।” हर सुबह श्यामवती गांव में घर-घर जाकर परिजनों को काम पर जाने से पहले अपने बच्चे को उनके घर छोड़ जाने के लिए प्रेरित करतीं। इस क्रैश में ऐसे बच्चों की देखभाल होती जिनकी उम्र 6 महीने से अधिक और 4 साल से कम होती।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार दुनिया भर में 5 साल से कम उम्र के लगभग 190 लाख बच्चे गंभीर कुपोषण से प्रभावित हैं। डब्लूएचओ के अनुसार इससे हर साल लगभग 400,000 बच्चों को अपनी जान गंवानी पड़ती है।
इन आंकड़ों में अम्बाड़ा के बच्चे शामिल न हों इसके लिए फुल्कई और श्यामवती दिन भर उनकी देखभाल करते। हर रोज़ बच्चों का वज़न और लम्बाई माप कर एक कॉपी में नोट की जाती। फिर उन्हें दिन भर में अनाज आधारित 3 समय का खाना दिया जाता। शाम 6 बजे तक जब मां-बाप काम से लौटते तो वह अपने बच्चे को वापस ले जाते। इस तरह हर बच्चे का पोषण ट्रैक किया जाता।
इस प्रयास के लिए फुल्कई को स्पंदन की ओर से पहले प्रतिमाह 2000 और बाद में 5000 रूपए दिए जाते थे। संस्था की सीईओ सीमा प्रकाश बताती हैं कि स्थानीय लोगों के सहयोग से ऐसे कुल 8 क्रैश खालवा ब्लॉक में 2014 से 2017 तक संचालित किए गए थे। उनके अनुसार हर सेंटर में अधिकतम 15 बच्चे एनरोल होते थे मगर असल में 20 बच्चे भी एक क्रैश में रहते थे। इस प्रोजेक्ट के ज़रिए उन्होंने कुल 221 बच्चों को सहायता प्रदान की।

कुपोषण से जूझता ज़िला और प्रदेश
जिस समय फुल्कई इस क्रैश को संचालित कर रहीं थी वह कुपोषण के लिहाज़ से इस इलाके के लिए एक भयानक समय था। चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-16) के अनुसार खंडवा जिले के ग्रामीण क्षेत्र के 6 से 23 माह की उम्र के दूध पीते हुए केवल 1.9% बच्चों को ही पर्याप्त आहार मिल रहा था। अगर इस उम्र के मां का दूध नहीं पीने वाले बच्चों को भी मिला दें तो यह प्रतिशत गिरकर 1.7% हो जाता है। शहरी क्षेत्रों में भी केवल 2.7% बच्चों को ही पर्याप्त आहार मिल रहा था।
इसी का परिणाम था कि 5 साल से कम उम्र के 49.9% बच्चे अंडरवेट थे। 46.8% बच्चे नाटे और 23.2% बच्चे कमज़ोर (wasted) थे। इन आंकड़ों की भयावहता को ऐसे समझिए कि जिले में 2016 में 3 महीनों में 17 आदिवासी बच्चे कुपोषण के कारण मर गए।
प्रदेश में भी आंकड़े बहुत उत्साहजनक नहीं थे। ग्रामीण क्षेत्रों के केवल 6% बच्चों (6-23 माह) को ही पर्याप्त आहार मिल रहा था। इनमें शहरी बच्चों को शामिल कर लेने पर भी आंकड़ा केवल 6.6% ही जा पाया।
लोक स्वास्थ्य पर काम करने वाले ग्रुप पब्लिक हेल्थ रिसोर्स नेटवर्क की सदस्य डॉ वंदना प्रसाद ग्राउंड रिपोर्ट से बात करते हुए बताती हैं कि आदिवासी क्षेत्रों में क्रैश की सुविधाएं कुपोषण और प्रारंभिक उम्र की देखभाल (early chlid care) में महती भूमिका निभाते हैं। इससे कम उम्र में ही कुपोषण की पहचान करना और बच्चे को उससे बाहर निकालना आसन होता है।
वह इसके लैंगिक पक्ष को रेखांकित करते हुए कहती हैं, “कामकाजी महिलाओं पर पहले ही जिम्मेदारियों का बोझ होता है ऐसे में क्रैश उनको काम करते वक्त बच्चे संभालने की ज़िम्मेदारी से राहत देते हैं। इससे उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को भी फायदा मिलता है।” वह कहती हैं कि बच्चे के क्रैश में रहने से माता-पिता के भीतर भी असुरक्षा की भावना नहीं आती।

देश में कैसे संचालित हुए क्रैश?
1994 में भारत सरकार ने 19.99 करोड़ रूपए के कॉर्पस फंड से नेशनल क्रैश फंड स्थापित किया। 2003 तक देशभर में 4885 क्रैश खुले जिनमें मध्य प्रदेश के 216 क्रैश शामिल थे। हालांकि 2006 में इसे एक अन्य योजना के साथ मिलाकर राजीव गांधी राष्ट्रिय क्रैश योजना लॉन्च की गई। 2015 तक इस योजना के तहत देशभर में 23,293 क्रैश संचालित हो रहे थे। मगर 2017 से इसे ‘कामकाजी माताओं के बच्चों के लिए राष्ट्रीय क्रैश योजना’ के साथ मर्ज कर दिया गया। साथ ही इस योजना में गरीबे रेखा के नीचे आने वाले बच्चों के परिजनों से प्रत्येक माह प्रति बच्चा 20 रूपए लेने का प्रावधान भी रखा गया ताकि ‘सामुदायिक स्वामित्व’ का भाव विकसित किया जा सके। मार्च 2020 तक देश में क्रैश की संख्या 6453 रह गई।
केंद्र सरकार ने महिला सुरक्षा, संरक्षण और सशक्तिकरण के उद्देश्य से शुरू किए गए ‘मिशन शक्ति’ के तहत 1 अप्रैल 2022 को क्रैश के लिए संचालित पुरानी योजना का नाम बदलकर पालना योजना कर दिया। इसके तहत सभी महिलाओं (चाहे वो कामकाजी न भी हों) को शामिल किया गया। इस योजना का उद्देश्य 6 माह से 6 साल तक के बच्चों को पोषण, स्वास्थ्य और विकास संबंधी सहयोग और गुणवत्तापूर्ण क्रैश सुविधा देना है।
इस योजना के तहत आंगनवाड़ी को ही क्रैश के रूप में विकसित करने का प्रावधान रखा गया। केंद्र सरकार ने यह तय किया कि 2025-26 तक वह 17000 आंगनवाड़ी-सह-क्रैश (AWCC) स्थापित करेगी।
23 जुलाई 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार केंद्र ने देशभर में 14,599 एडब्लूसीसी की मंज़ूरी तो दी है मगर इनमें से केवल 2448 ही संचालित हो रहे हैं।
प्रसाद मानती हैं कि यह सरकारी योजनाएं धरातल पर अच्छी तरह लागू नहीं हो सकी हैं। उनके अनुसार एडब्लूसीसी भी केवल कागजों में है। “एक क्रैश को चलाने के लिए सरकार को एक आंगनवाड़ी में 2 अतिरिक्त कार्यकर्ता चाहिए मगर वह नही हैं।”
मध्य प्रदेश में एडब्लूसीसी के संचालन के लिए 1 कार्यकर्त्ता और एक सहायिका का ही प्रावधान है।
इसके अलावा वह राजनीतिक इक्षाशक्ति और बजट की कमी को भी चिह्नाकित करती हैं।

“खंडवा में क्रैश नहीं हैं”
जिले में आंगनवाड़ी कम क्रैश की स्थिति जानने के लिए जब हमने महिला एवं बाल विकास विभाग की ज़िला प्रोग्राम अफसर रत्ना शर्मा से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि खंडवा में अभी पालना योजना के तहत कोई भी आंगनवाड़ी कम क्रैश संचालित नहीं हो रहे हैं। वह बताती हैं कि यह योजना फिलहाल खंडवा में संचालित नहीं हो रही हालांकि इसके बंद होने की तारीख उन्हें नहीं पता।
उन्होंने बताया कि जिले में कुपोषित बच्चों के लिए ‘मिशन आंचल’ की शुरुआत की गई है। इसके तहत जन समुदाय के लोगों को ही गंभीर तीव्र कुपोषित (SAM) बच्चों को गोद लेकर उनकी पोषण ज़रूरतों को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
2019 से 2021 के बीच किए गए पांचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार अब भी खंडवा में 6 से 23 माह के केवल 3.5% बच्चों को ही पर्याप्त आहार मिल रहा है। यानि अब भी स्थिति में अभूतपूर्व सुधार नहीं आया। शर्मा बताती हैं कि सितम्बर 2025 तक जिले में 849 बच्चे कुपोषित पाए गए थे। साथ ही वह यह मानती हैं कि और भी बच्चों की पहचान करने की ज़रूरत है।
शर्मा के अनुसार ज़िले में सरकारी क्रैश तो संचालित नहीं हैं मगर आंगनवाड़ी में बच्चे को सुबह 9 बजे से 2 बजे तक बैठाया जा सकता है।
मगर अम्बाड़ा की दिक्कत यही है कि आंगनवाड़ी अब भी दूर है। सीमा प्रकाश बताती हैं कि 2017-18 के बाद डोनर से आर्थिक सहायता बंद होने के कारण उन्हें अपना यह प्रोजेक्ट बंद करना पड़ा। स्पंदन से सहयोग बंद होने के बाद फुल्कई को भी क्रैश बंद करना पड़ा। 3 साल पहले उनकी बेटी श्यामवती का निधन टीबी से हो गया। ‘कमज़ोर और दुबली-पतली’ वह महिला अपने मृत्यु के वक्त लगभग 22 साल की थी और एक बच्चे की मां बन चुकी थी।
फुल्कई कहती हैं कि अगर सरकार या फिर कोई एनजीओ उनकी आर्थिक मदद कर दे तो वह बहुओं के साथ मिलकर फिर से क्रैश संचालित करेंगी। हालांकि ज़िले के महिला बाल विकास विभाग कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार फिलहाल सरकार द्वारा क्रैश संचालित करने के लिए कोई भी अनुदान नहीं दिया जाता।
जबकि स्पंदन की सीमा प्रकाश कहती हैं कि वह अन्य डोनर की मदद से इस काम को वापस शुरू करने के रास्ते खोज रही हैं। मगर डॉ प्रसाद मानती हैं कि यह काम एनजीओ का नहीं सरकार का है। “एनजीओ का काम मॉडल देना होता है जो वह कर रहे हैं। मगर सुविधा तो सरकार को ही देनी होगी।” वह कहती हैं कि यह केवल सुविधा नहीं बल्कि गरीब महिलाओं का अधिकार है।
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