मध्य प्रदेश के मंडला जिले की बीजाडांडी के पिंडरई माल गांव की पगडंडी पर बैठे 55 वर्षीय पुरुषोत्तम मलगाम रात को सो नहीं पाते।
“मेरे बाबूजी बरगी बांध में विस्थापित हुए थे। उन्हें कहा गया था कि बांध से सिंचाई होगी, खेत हरे होंगे। वो इंतजार करते-करते चल बसे। 36 साल बाद न उन्हें पानी मिला न हमें।”
पुरुषोत्तम मलगाम की आवाज में गुस्सा है, “अब फिर से हमारी जमीन के लिए सर्वे हो रहा है। इस बार ‘पंप स्टोरेज’ के नाम पर। पहले बांध के लिए उजड़े, अब बिजली बनाने के लिए उजड़ेंगे।” वे सवाल करते हुए कहते हैं,
“यह पानी किसके लिए है—किसानों के लिए या पावर प्लांट्स के लिए?”
यह सवाल अकेले पुरुषोत्तम मलगाम का नहीं है। यह सवाल मंडला के 95 विस्थापित गांवों का है, जिन्हें 36 साल बाद भी सिंचाई का पानी नहीं मिला। यह सवाल रीवा-सतना के 885 गांवों का भी है, जहां बरगी डायवर्जन से एक बूंद पानी नहीं पहुंचा। अब वही बरगी जलाशय का पानी तीसरे पावर प्रोजेक्ट, 1000 मेगावाट के बरगी पंप हाइड्रो स्टोरेज को दिया जा रहा है।
अधूरा वादा: सिंचाई परियोजना जो सिंचाई न कर सकी

बरगी बांध को “रानी अवंती बाई सागर सिंचाई परियोजना” के रूप में 1971 में मंजूर किया गया था। यह बांध 1988 में बनकर तैयार हुआ। मूल योजना 4,37,000 हेक्टेयर में सिंचाई की थी। इसी वादे के नाम पर 162 गांवों को विस्थापित करना “जनहित” में जायज ठहराया गया।
लेकिन 36 साल बाद हकीकत यह है कि अभी मात्र 36,000 हेक्टेयर में सिंचाई हुई है—यानी लक्ष्य का केवल 5.4 प्रतिशत। रीवा-सतना के 885 गांवों में आज तक एक बूंद पानी नहीं पहुंचा। बरगी डायवर्जन प्रोजेक्ट की 197.5 किमी मुख्य नहर अभी भी अधूरी है। साल 2010 तक 104 किमी नहर बनी, उसके बाद साल दर साल सिर्फ डेडलाइन बढ़ती जा रही है। अब सरकार ने बरगी डायवर्जन को पूरा करने की डेडलाइन मार्च 2026 तय की है।
रीवा के नगोद ब्लॉक के 62 वर्षीय किसान रामप्रसाद पटेल कहते हैं,
“1990 में हमें बताया गया था कि बरगी से नहर आएगी। मैंने अपने खेत में इंतजार किया, बेटों ने इंतजार किया, अब पोते बड़े हो रहे हैं। पानी नहीं आया। हम अभी भी बोरिंग पर निर्भर हैं, बरसात का मुंह देखते हैं।”
नर्मदा विकास संभाग कटनी के असिस्टेंट इंजीनियर दीपक मंडलोई ने बताया कि स्लीमनाबाद के पास अंडर टनल निर्माण दिसंबर 2025 तक पूरा होने का लक्ष्य है, जबकि वाटर सप्लाई का लक्ष्य मार्च 2026 है। इसके बाद 1450 गांवों को सिंचाई सुविधा मिलना शुरू हो जाएगी।
पहले झाबुआ पावर प्लांट को मिला पानी
किसानों को सिंचाई का पानी नहीं मिला, लेकिन बरगी जलाशय से सिवनी के घंसौर तहसील में स्थापित 600 मेगावॉट झाबुआ पावर प्लांट को पानी की आपूर्ति शुरू हो गई। इस थर्मल पावर प्लांट को 2,362 क्यूबिक मीटर प्रति घंटा पानी चाहिए, जो बरगी जलाशय से पाइपलाइन के माध्यम से दिया जा रहा है।
बगदरी घंसौर के 48 वर्षीय किसान धनसिंह मरकाम कहते हैं, “पाइपलाइन हमारी जमीन से गुजरी। हमें बहुत कम मुआवजा दिया गया। हमारा पानी प्लांट में जाता है, लेकिन हमारे खेत सूखे रहते हैं। हमने विरोध किया, धरना दिया, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है।”

2012 में जब पाइपलाइन के लिए जमीन अधिग्रहण हुआ, तो बगदरी गांव के किसानों ने लंबे समय तक विरोध किया था। लेकिन प्लांट चालू हो गया और बरगी का पानी थर्मल बिजली बनाने में जाने लगा।
फिर चुटका परमाणु प्रोजेक्ट का प्रस्ताव
2009 में Nuclear Power Corporation of India Limited (NPCIL) ने 1,400 मेगावॉट (700×2) क्षमता का चुटका न्यूक्लियर पावर प्लांट प्रस्तावित किया। यह 21,000 करोड़ रुपये की परियोजना नर्मदा नदी के किनारे चुटका, टाटीघाट और कुंडा गांवों की 497.72 हेक्टेयर जमीन पर बनेगी। यह परमाणु संयंत्र प्रति वर्ष 7.25 करोड़ क्यूबिक मीटर पानी बरगी जलाशय से लेगा। स्थानीय कार्यकर्ताओं का आरोप है कि आदिवासियों पर जमीन छोड़ने के लिए दबाव बनाया जा रहा है।
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टाटीघाट के 52 वर्षीय श्यामलाल बर्मन, जो मछुआरे समुदाय से हैं, कहते हैं, “मैं दो बार विस्थापित हो चुका हूं। पहले बरगी बांध में, फिर पुनर्वास की जगह से। अब तीसरी बार परमाणु संयंत्र के लिए हमें उजड़ने को कहा जा रहा है। क्या हम इंसान नहीं हैं?”
अब 4,690 करोड़ का पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट
यह परियोजना मंडला जिले के नारायणगंज और बीजाडांडी ब्लॉक के पिंडराई माल, सलैया माल, जमठार, खापा, निवारी और पोंडी गांवों में प्रस्तावित है। यह 4,689.89 करोड़ की 1000 मेगावॉट की “ओपन लूप पंप भंडारण प्रणाली” है। इसका उद्देश्य पीक आवर्स (6 घंटे) में बिजली बनाना और ऑफ-पीक आवर्स (7 घंटे) में पानी को बरगी जलाशय (निचला) से ऊपरी (नया) जलाशय में पंप कर 2,078 मिलियन यूनिट सालाना बिजली बनाना है।
इसमें 200 मेगावॉट की चार और 100 मेगावॉट की दो यूनिट्स लगेंगी। सेरेनटिका रिन्यूएबल्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (Serentica Renewables India 21 Pvt. Ltd.) कंपनी को अगस्त 2025 में राज्य नवीकरणीय ऊर्जा विभाग से आवंटन पत्र मिला। नवंबर 2025 में, इसे केंद्र सरकार से मंजूरी (कैटेगरी-ए) के लिए टर्म्स ऑफ रिफरेंस (TOR) जारी हुआ।
परियोजना के लिए 381.50 हेक्टेयर जमीन (271 हेक्टेयर वन भूमि) चाहिए और पांच गांवों का विस्थापन संभावित है। टर्म्स ऑफ रिफरेंस जारी होने के बाद पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट और पर्यावरण प्रबंधन रिपोर्ट तैयार होगी, इसके बाद जनसुनवाई आयोजित होगी। हालांकि गैर-वनीय उपयोग के लिए वन भूमि की आवश्यकता होने के बावजूद अभी वन मंजूरी के लिए आवेदन नहीं किया गया है।
किसानों का सवाल: पानी किसके लिए?

सलैया माल की 42 वर्षीय सुकमती बाई कहती हैं,
“मेरे पति के दादा बरगी बांध में विस्थापित हुए थे। हमारे पास 4 एकड़ खेत थे, 2 एकड़ डूब में चले गए। बचे 2 एकड़ में धान, कोदो-कुटकी उगाते हैं। अब फिर से ऊपरी झील बनाने के लिए विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है।”
नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े और जल विशेषज्ञ श्रीपाद धर्माधिकारी पूछते हैं,
“अगर बरगी बांध से झाबुआ पावर प्लांट को 2,362 m³/hr पानी जा रहा है, पंप स्टोरेज को 25+ MCM एक बार + 2.75 MCM हर साल देना है और बांध से 90 मेगावॉट जल विद्युत भी बन रही है, तो किसानों के लिए क्या बचेगा? हमारे खेतों में क्या पानी आएगा?”
सालों से बरगी बांध से विस्थापितों के हक की लड़ाई लड़ रहे राजकुमार सिन्हा कहते हैं,
“बरगी जलाशय पर अब चार (सिंचाई, हाइड्रो पावर, थर्मल पावर और परमाणु पावर) दावेदार हैं। सबसे कमजोर दावेदार किसान हमेशा हारता है। उनकी लॉबी नहीं है। उनका राजनीतिक दबाव नहीं है।”
परियोजना के दावे बनाम जमीनी सच्चाई
सेरेंटिका रिन्यूएबल्स की परियोजना रिपोर्ट में निर्माण व संचालन चरण में रोजगार, 1000 मेगावॉट पीक पावर आपूर्ति और 24.6 हेक्टेयर हरित पट्टी के विकास जैसे सामाजिक-पर्यावरणीय लाभों का दावा किया गया है। हालांकि, जमीनी हकीकत इसके विपरीत नजर आती है।
परियोजना के लिए चौरई रिजर्व फॉरेस्ट सहित 271 हेक्टेयर घना वन (सागौन और मिश्रित) काटा जाएगा। निर्माण से निकलने वाले 22.14 मिलियन क्यूबिक मीटर मलबे में से 12.37 MCM मलबा 100 हेक्टेयर गैर-वन भूमि पर डंप होगा, जो स्थानीय पारिस्थितिकी को प्रभावित करेगा।
पुनर्वास की समस्या

पुनर्वास में 5 गांवों के 81 परिवार सीधे प्रभावित होंगे, जिन्हें “सीधी बातचीत” और आपसी सहमति के आधार पर केवल नकद मुआवजा मिलेगा। प्रभावित किसान इसे स्थायी आजीविका के लिए अपर्याप्त बताते हैं।
राजकुमार सिन्हा कहते हैं,
“स्पष्ट है कि विस्थापित परिवारों को जमीन के बदले जमीन नहीं, बल्कि नकद मुआवजा दिया जाएगा। यह भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013 की भावना के विपरीत है।”
कानूनी उल्लंघन की आशंका
आदिवासी मामलों के जानकार और जबलपुर हाईकोर्ट के वकील राहुल सिंह कहते हैं,
“मंडला जिला पांचवीं अनुसूची क्षेत्र है। यहां पेसा और FRA के तहत ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है।”
हालांकि परियोजना दस्तावेज स्पष्ट रूप से बताता है कि वन स्वीकृति (FC-I) के लिए FRA प्रक्रिया “NO” है। इसके बावजूद 11 अगस्त 2025 को प्रारंभिक आवंटन पत्र जारी किया गया।
राजकुमार सिन्हा ने सवाल उठाया है,
“विस्थापित ग्राम सभा की सहमति के बिना प्रक्रिया क्यों आगे बढ़ रही है?”
रोजगार का दावा भी सीमित है, क्योंकि निर्माण चरण केवल 36 महीने का है। इसके बाद केवल सीमित रखरखाव कर्मियों की आवश्यकता होगी। स्थानीय लोगों को चिंता है कि बरगी बांध विस्थापितों की तरह उनका भी भविष्य असुरक्षित हो जाएगा, जब उनकी जमीन-जंगल चले जाएंगे।
जमठार गांव के 50 वर्षीय किसान देवलाल मलगाम कहते हैं,
“कंपनी कहती है रोजगार मिलेगा। कितने दिनों के लिए? निर्माण खत्म होने के बाद? हमारा जंगल, हमारा पानी सब चला जाएगा। फिर हम कहां जाएंगे? बरगी के विस्थापितों को अभी तक न्याय नहीं मिला। हमें क्या मिलेगा?”
162 गांव डूबे, 885 गांवों को पानी नहीं
बरगी बांध के निर्माण में जबलपुर, मंडला और सिवनी के 162 गांव प्रभावित हुए। हजारों लोग विस्थापित हुए, जिनमें अधिकांश आदिवासी और मछुआरे समुदाय के थे।
चुटका गांव के 60 वर्षीय दादूलाल कुङापे कहते हैं,
“बाबूजी को 1980 में कहा गया था कि बांध से खेती को पानी मिलेगा, इलाका हरा होगा। उन्होंने जमीन दे दी। इतने साल बीत जाने के बाद हम बोरिंग पर निर्भर हैं। वहीं पानी अब बिजली बनाने वालों को दिया जा रहा है।”
दूसरी तरफ रीवा-सतना के 885 गांवों का भरोसा टूट चुका है। बरगी डायवर्जन प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 5,127 करोड़ रुपये थी, लेकिन अभी तक नहर अधूरी है।
सतना के मैहर तहसील के किसान जगदीश प्रसाद कहते हैं, “हमारे इलाके में बारिश कम होती है, जमीन सूखी रहती है। बरगी डायवर्जन हमारी आखिरी उम्मीद थी। लेकिन जिस पानी से हमारे खेत हरे होने थे, वह पावर प्लांट्स में जा रहा है। यह धोखा दोनों तरफ के किसानों के साथ हुआ है।”
विकास किसके लिए?
नर्मदा बचाओ आंदोलन के स्थानीय कार्यकर्ता शारदा यादव कहते हैं, “बरगी एक सिंचाई परियोजना है। इसे सिंचाई के लिए ही मंजूर किया गया था, लेकिन अगर उसी पानी को थर्मल प्लांट, परमाणु प्लांट और अब पंप स्टोरेज को देना है, तो यह स्पष्ट रूप से मूल परियोजना के उद्देश्य का उल्लंघन है।”
जबलपुर के किसान संगठन नर्मदा विस्थापित संघर्ष समिति के महेंद्र सिंह कहते हैं, “बरगी बांध की कहानी बताती है कि भारत में विकास किसके लिए है। आदिवासी और किसान अपनी जमीन देते हैं, लेकिन लाभ शहरों, उद्योगों और कॉर्पोरेट कंपनियों को मिलता है। 162 गांव डूबे, सिंचाई नहीं मिली। 885 गांव सालों से इंतजार कर रहे हैं, पानी प्लांट्स को मिल रहा है।”
अंतिम सवाल
पिंडरई माल के पुरुषोत्तम मलगाम आखिर में पूछते हैं, “अगर बरगी बांध सिंचाई के लिए नहीं था, तो हमें पहले ही बता देते। हमने अपनी जमीन सिंचाई के वादे पर दी, वादा पूरा नहीं हुआ। अब फिर हमसे जमीन ले रहे हैं—बिजली बनाने के लिए। यह बिजली किसके घर रोशन करेगी? हमारे बच्चे तो आज भी अंधेरे में हैं।”
यह सवाल सिर्फ बरगी बांध का नहीं है। यह उस विकास मॉडल का सवाल है, जहां आदिवासी और किसान कुर्बानी देते हैं, लेकिन फायदा कहीं और पहुंचता है। 36 साल बाद भी जब सिंचाई का वादा अधूरा है, तो नए पावर प्रोजेक्ट्स के वादों पर कैसे भरोसा किया जाए? यह सवाल आज हर विस्थापित के मन में है।
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