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जीवन कनेरिया: गुईलेन बैरे सिंड्रोम से जीतकर दूसरों का सहारा बनने की कहानी 

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इंटरनेट पर जीबीएस लिखकर खोजने पर एक बिमारी से संबंधित जानकारियां दिखाई देती हैं। इससे पीड़ित कई लोगों की फ़ोटो और कहानियां भी दिखती हैं। मगर ‘जीबीएस फाइटर’ लिखकर खोजने पर जीवन कनेरिया की कहानी ही दिखती है। 44 वर्षीय कनेरिया इंदौर में रहते हैं। जून 2025 को मैं उनसे पहली बार मिला। लक्ष्मीपुरी में अपने 2 मंजिला घर से वह हर कदम संभाल कर रखते हुए मेरे पास आ रहे थे। उनके हाथों की उंगलियां थोड़ा मुड़ी हुई हैं मगर चेहरे पर मुस्कराहट है। 

कनेरिया को 10 साल पहले गुईलेन बैरे सिंड्रोम यानि जीबीएस नाम की बिमारी ने घेर लिया। लगभग 20 महीनों तक वह अस्पताल में इस बिमारी से लड़ते रहे। अस्पताल से घर लौट कर शरीर को वापस पहले जैसा गतिशील बनाने के लिए प्रयास करते हुए उनके दिमाग में इलाज के दौरान आई कठिनाइयां चल रही थीं। इसी दौरान उन्होंने अपने जैसे जीबीएस के मरीज़ों का उत्साह बढ़ाने का निश्चय किया। मोटिवेशन स्पीकर से शुरू हुआ यह सफ़र अब एक नेटवर्क में बदल चुका है। कनेरिया देश भर में जीबीएस के मरीज़ों को इलाज करवाने और मानसिक तनाव से उभरने में मदद करते हैं।           

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जीवन कनेरिया को सीढ़ियां चढ़ने के लिए अब भी सहारे की ज़रूरत होती है मगर इससे उनकी मुस्कान कम नहीं होती। फ़ोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

जब अचानक आई बिमारी

कनेरिया ने अपना करियर हिंदी दैनिक के सर्कुलेशन विभाग में शुरू किया। हर रोज़ सुबह 4 बजे उठकर वह फील्ड पर जाकर यह सुनिश्चित करते थे कि अखबार पाठकों तक पहुंच जाए। मगर 1 अप्रैल 2016 को वह अपनी पूरी ताकत से उठ नहीं सके। उनके शरीर का एक हिस्सा सुन्न हो चुका था। सुबह-सुबह जब वह एक जनरल फिजिशियन के पास पहुंचे तो डॉक्टर ने उन्हें बताया कि उनका ब्लड प्रेशर असामान्य रूप से बढ़ा हुआ है। कनेरिया को कभी भी बीपी या फिर डाईबिटीज की समस्या नहीं रही। ऐसे में उन्हें न्यूरोलॉजिस्ट को दिखाने की सलाह दी गई। 

सुबह 8 बजे जब वह न्यूरोलॉजिस्ट के पास पहुंचे तक तब तक उनके एक हाथ की चेतना पूरी तरह जा चुकी थी। उनकी बिमारी का पता लगाने के लिए कई तरह के टेस्ट किए गए। अंत में उनके नर्वस सिस्टम की कार्यक्षमता को मापने के लिए नर्व कंडक्शन वेलोसिटी टेस्ट (NCV) करवाया गया। इस टेस्ट के माध्यम से यह मापा जाता है कि किसी भी व्यक्ति के शरीर में इलेक्ट्रिक इम्पल्स कितनी तेज़ी से गुज़र रहा है। 

इस टेस्ट के बाद कनेरिया और उनके परिवार ने पहली बार गुईलेन बैरे सिंड्रोम का नाम सुना। कभी फुटबॉल का प्रदेश स्तरीय खिलाड़ी रहा यह व्यक्ति अब जीबीएस का मरीज़ बन चुका था।  

क्या होती है जीबीएस बिमारी?

गुईलेन बैरे सिंड्रोम (Guillain-Barré syndrome) बहुत कम लोगों को होने वाला (rare) न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है। इसमें किसी व्यक्ति का इम्यून सिस्टम गलती से उसके पेरिफेरल नर्वस सिस्टम के एक हिस्से पर हमला कर देता है। पेरिफेरल नर्वस सिस्टम दिमाग और रीढ़ की हड्डी के बाहरी हिस्से में पाया जाने वाला वो सिस्टम है जो दिमाग से शरीर के सभी हिस्सों को जोड़ता है। 

आसान भाषा में कहें तो इस डिसऑर्डर के कारण दिमाग का शरीर के बाकी हिस्सों से संपर्क कम हो जाता है या टूट जाता है। इससे पैरालिसिस, कुछ भी महसूस करने की क्षमता और कभी-कभी सांस लेने की क्षमता भी प्रभावित हो जाती है। हालांकि इसके शुरूआती लक्षण शरीर के किसी हिस्से के सुन्न होने से शुरू होते हैं। मगर घंटे भर में भी इसकी गंभीरता बढ़ सकती है। 

डॉ अमित व्यास मानते हैं कि कनेरिया जल्द और सही इलाज दिलाने में अहम भूमिका निभाते हैं। फ़ोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

इस बिमारी का इतिहास पहले विश्वयुद्ध के भी पहले का है। 1859 में जीन-बैप्टिस्ट ऑक्टेव लैंड्री नाम के फ़्रांसिसी फिजिशियन ने इसके लक्षणों की खोज की थी। हालांकि तब इसे लैंड्री पैरालिसिस के नाम से जाना जाता था। मगर पहले विश्वयुद्ध के दौरान 1916 में, फ्रांसीसी चिकित्सक आंद्रे स्ट्रोहल, जॉर्जेस गुइलैन और जीन-एलेक्जेंडर बैरे ने पैरालिसिस से प्रभावित दो फ्रांसीसी सैनिकों का इलाज करते हुए इस रोग के बारे में व्यवस्थित जानकारी दी। 1927 के बाद से यह गुईलेन बैरे सिंड्रोम के रूप में प्रचलित हुआ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कैम्पिलोबैक्टर जेजुनी नाम का बैक्टीरिया जीबीएस के मुख्य कारणों में से एक है। इस बैक्टीरिया के चलते फ़ूडबोर्न इन्फेक्शन होते हैं। हालांकि इंदौर में बीते 17 साल से प्रैक्टिस कर रहे न्युरोलॉजिकल विशेषज्ञ डॉ अमित व्यास कहते हैं कि यह किसी भी तरह के वायरस यहां तक की दूषित पानी से भी हो सकता है। 

महाराष्ट्र के पुणे में फरवरी 2025 में दूषित पानी के कारण जीबीएस के केस दर्ज किए गए थे। लोकसभा में 28 मार्च को दिए एक जवाब के अनुसार महाराष्ट्र में इसके 208 मामले दर्ज किए गए थे। मीडिया रिपोर्ट (WION,Feb 20, 2025) के मुताबिक देश भर में इसके चलते 23 लोगों की मौत हुई थी। 

रेयर बिमारी का इलाज कठिन     

कनेरिया के परिवार ने इस बिमारी का नाम पहली बार सुना था। इसका इलाज कैसे होता है और इसके लिए क्या करना होगा यह सारे सवाल अनुत्तरित थे। हालत बिगड़ने के चलते कनेरिया को 3 महीने तक वेंटिलेटर सपोर्ट में रखना पड़ा। ख़त्म होती बचत, बहन की आर्थिक सहायता के बीच परिवार के लिए इंट्रावेनस इम्यूनोग्लोबुलिन (IVIG) के इंजेक्शन खोजना बड़ा चैलेंज था। यह जीबीएस के इलाज में काम आने वाली सबसे कारगर दवाई है। 

3 महीने बाद उन्हें एम्बुलेंस में घर लाया गया। शरीर में गतिशीलता लाने के लिए फिजियोथेरेपी जारी थी। 2017 में कनेरिया के फिजियोथेरेपिस्ट ने अपने एक अन्य मरीज़ से बात करने की गुज़ारिश की। इंदौर का यह व्यक्ति पैरालिसिस से जूझ रहा था। कनेरिया हर रोज़ उससे बात करते और उसे हिम्मत न हारने का हौसला देते। वह याद करके कहते हैं, 

“2 जून 2017 को मैंने उनको (अन्य मरीज़ को) फोन पे बताया कि मैं उनसे मिलने आ रहा हूं। जब मैं उनके घर पहुंचा तो वह अपनी बिगड़ी हालत के बाद भी मुझसे मिलने के लिए उत्साहित थे। इस उत्साह और प्रेम ने मुझे जीबीएस के अन्य मरीज़ों की मदद करने के लिए प्रेरित किया।”

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कनेरिया मरीज़ों के लगातार संपर्क में रहते हुए उन्हें इलाज की प्रक्रिया समझाते रहते हैं। फ़ोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

कैसे नेटवर्क बना?      

उपरोक्त घटना के बाद कनेरिया ने सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों को खोजना शुरू किया जो इस तरह की बिमारी से जूझ रहे हैं। इसी दौरान वह लगातार इंटरनेट पर इस बिमारी के बारे में पढ़ रहे थे। इसी दौरान उन्हें जीबीएस सीआईडीपी फाउंडेशन के बारे में पता चला। यह अंतरराष्ट्रीय संस्था विश्वभर में एक नेटवर्क के ज़रिए जीबीएस से पीड़ित लोगों की मदद करती है। कनेरिया उनसे ईमेल के ज़रिए संपर्क में आए। अब वह भारत के उन चार आधिकारिक लोगों में से एक हैं जो इस संस्था के प्रतिनिधि के रूप में लोगों की मदद कर सकते हैं।

जीवन बताते हैं कि मरीज़ों के संपर्क में आने के लिए वो दो तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। जीबीएस सीआईडीपी फाउंडेशन की वेबसाईट पर जाकर मदद मांगने वाले लोगों को जीवन या उनके अन्य 3 साथियों से संपर्क करवाया जाता है। मदद के बारे में और बताते हुए कनेरिया कहते हैं, 

“सबसे पहले तो हम पेशेंट या उनके परिजन से इलाज और लक्षण की पूरी जानकारी लेते हैं। हम पूछते हैं कि उनको क्या हुआ है और कितना समय हुआ है? इसके अलावा कौन-कौन से टेस्ट और आईबीआईजी के कितने इंजेक्शन लग चुके हैं जैसे प्राथमिक सवालों से हम जानकारी इकट्ठी करते हैं।”

इसके बाद वह बताते हैं कि इलाज में आगे क्या-क्या होगा और इस दौरान क्या-क्या सावधानी रखनी है। चूंकि इसका इलाज महंगा होता है इसलिए कनेरिया मुख्यमंत्री राहत कोष या अन्य माध्यम से मरीज़ को आर्थिक सहायता दिलवाने का भी प्रयास करते हैं। 

डॉ व्यास भी जीवन के इस काम को महत्वपूर्ण मानते हैं। वह कहते हैं, “हमारे समाज में इस बिमारी को लेकर अब भी जागरूकता नहीं है। जीवन जैसे सामाजिक कार्यकर्ता जो खुद इसके मरीज़ रहे हों, जब बिमारी के बारे में बताते हैं तो मरीज़ और उसके परिजनों का हौसला बढ़ता है।” डॉ व्यास बताते हैं कि इस बिमारी का जल्द पता चलना और उसका सही इलाज शुरू होना मरीज़ को घातक स्थिति में पहुंचने से रोक सकता है। कनेरिया सही और किफ़ायती इलाज में सहयोग करते हैं।   

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कनेरिया को जीबीएस के मरीज़ों के साथ काम करने के लिए कई सम्मान मिल चुके हैं। फ़ोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

भोपाल के रहने वाले हरिनारायण श्रीवास्तव के बेटे मयंक श्रीवास्तव को अक्टूबर 2021 में जीबीएस हुआ। इलाज के तरीके को लेकर चल रही मानसिक उथल-पुथल के बीच वह अपने एक रिश्तेदार के ज़रिए कनेरिया के संपर्क में आए। श्रीवास्तव कहते हैं, “कनेरिया जी हमसे रोज़ बात करते और हौसला देते। उन्होंने बताया कि इलाज के इस पड़ाव के बाद सुधार देखने मिलेगा। इससे हमारी हिम्मत बनी रहती।” वह बताते हैं कि आईवीआईजी के इंजेक्शन भोपाल में उन्हें 16000 रूपए के मिल रहे थे मगर कनेरिया के सहयोग से इंदौर से खरीदने पर उन्हें केवल 8000 रूपए ही देने पड़े।

श्रीवास्तव कहते हैं कि इस बिमारी में दवा से ज़्यादा हौसले और मानसिक सहयोग की ज़रूरत होती है। कनेरिया इसी ज़रूरत को बिना किसी भुगतान के पूरा करते हैं। 

जीवन कनेरिया का यह प्रयास लगातार जारी है। वह अब तक 23 राज्यों के 1000 से भी अधिक मरीज़ों की मदद कर चुके हैं। कई बार ठीक होने के बाद मरीज़ कनेरिया से बात नहीं करते। इसका कारण बताते हुए कनेरिया कहते हैं, “कोई भी अपना बुरा वक़्त नहीं याद करना चाहता।” मगर यह सब कुछ उन्हें प्रभावित नहीं करता। कनेरिया कहते हैं कि जब वो बीमार हुए तो उन्हें कोई भी बताने वाला नहीं था, आगे किसी के साथ ऐसा न हो इसके लिए वो लगातार प्रयास करते रहेंगे। 

कनेरिया धीरे-धीरे अपने पुराने दिनों में लौटने का प्रयास कर रहे हैं। फिलहाल वह भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) में बीमा एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं। उन्हें सीढ़ी चढ़ने के लिए अपने पिता, बेटे या दो जुड़वा बेटियों के सहारे की ज़रूरत होती है। मगर वह शौख से खुद ही दोपहिया वाहन चला लेते हैं। दिन के अंत में वह मुझे गाड़ी पर अपना शहर दिखाते हुए बस अड्डे तक छोड़कर आते हैं।

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  • Shishir identifies himself as a young enthusiast passionate about telling tales of unheard. He covers the rural landscape with a socio-political angle. He loves reading books, watching theater, and having long conversations.

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