सतपुड़ा की पहाड़ियों से मेलघाट के जंगलों को जोड़ने वाले क्षेत्र में अब गंजाल बांध परियोजना की तैयारियां आगे बढ़ रही हैं। 24 नवंबर 2025 को केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने गंजाल बांध के स्टेज-1 वन स्वीकृति प्रदान की है। परियोजना के तहत 811.29 हेक्टेयर वन भूमि के डूब क्षेत्र में आने की संभावना है। यह मंजूरी दो वर्षों तक चली प्रशासनिक प्रक्रिया और बार-बार स्थगन के बाद दी गई है।
तीन बार टली फाइल, 11 दस्तावेजों के बाद स्वीकृति
परियोजना को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) ने ‘सतपुड़ा-मेलघाट टाइगर कॉरिडोर’ के लिए ‘घातक’ बताया था और वैकल्पिक स्थल तलाशने की सिफारिश की थी। इसके बावजूद यह स्वीकृति नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (NVDA) को वन (संरक्षण) अधिनियम की धारा 2(1)(ii) के तहत दी गई।
मंत्रालय ने इसे ‘चरणबद्ध दृष्टिकोण’ और ‘डेटा-संचालित निर्णय’ बताया है। हालांकि परियोजना से जुड़े दस्तावेजों की समीक्षा से यह स्पष्ट होता है कि यह मामला बाघ संरक्षण और विकास के बीच प्राथमिकताओं के टकराव से जुड़ा है। इस प्रक्रिया में विकास को आगे रखा गया है। वहीं, वन्यजीवों से जुड़े प्रभावों का आकलन आगामी छह वर्षों तक चलने वाले अध्ययन के आधार पर किया जाएगा।
मध्य प्रदेश सरकार ने पहली बार 26 अप्रैल 2023 को मोरंड-गंजाल संयुक्त सिंचाई परियोजना के लिए प्रस्ताव भेजा था। मूल प्रस्ताव में 2,272.05 हेक्टेयर वन भूमि की मांग की गई थी। बाद में इसे संशोधित कर 2,250.05 हेक्टेयर कर दिया गया। इस परियोजना का उद्देश्य होशंगाबाद, अब नर्मदापुरम, बैतूल, हरदा और खंडवा जिलों में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना बताया गया है।

सरकारी दावों के अनुसार, इससे 52,000 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि सिंचित होगी तथा पेयजल उपलब्धता और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। वहीं, प्रस्ताव के तहत बड़े पैमाने पर वन भूमि के जलमग्न होने और आदिवासी समुदायों के विस्थापन को लेकर चिंताएं भी दर्ज की गई हैं।
प्रस्ताव की जांच के दौरान केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने बार-बार कमियां दर्ज कीं। 13 जून 2023 को पहली बार आपत्तियां उठाई गईं। इसके बाद 20 सितंबर 2023 और 16 अक्टूबर 2023 को अतिरिक्त जानकारी मांगी गई। 14 नवंबर 2023 को सलाहकार समिति की बैठक में प्रस्ताव को टाल दिया गया।
समिति ने कहा कि राज्य सरकार ने न तो पेड़ों की प्रजाति-वार गणना प्रस्तुत की, न ही वन्यजीव संस्थान (WII) का प्रभाव अध्ययन, न ही राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की टिप्पणियां संलग्न की गईं। इसके अलावा राज्य वन्यजीव बोर्ड (SCNBWL) की मंजूरी और प्रतिपूरक वनीकरण की विस्तृत योजना भी उपलब्ध नहीं कराई गई थी।
28 फरवरी 2024 की बैठक में भी यही कमियां दोहराई गईं और प्रस्ताव फिर से स्थगित कर दिया गया। 27 अगस्त 2024 की बैठक में तीसरी बार प्रस्ताव टालते हुए कहा गया कि राज्य सरकार ने पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई है। इस अवधि में राज्य सरकार ने 9 अक्टूबर, 13 नवंबर 2024 और 7 जनवरी 2025 तक बार-बार अधूरी जानकारियां भेजीं। कुल मिलाकर ग्यारह बार अतिरिक्त दस्तावेज जमा किए गए, लेकिन हर चरण में कुछ न कुछ कमी बनी रही।
इस बीच, सलाहकार समिति ने ई-फाइल के माध्यम से एनटीसीए से टिप्पणी मांगी। जनवरी 2025 में एनटीसीए की आपत्तियों के बाद प्रस्ताव पर आगे की प्रक्रिया धीमी हो गई। इसके बाद जनवरी 2025 में एक उप-समिति का गठन किया गया, जिसने 27-28 मार्च 2025 को साइट विजिट किया और 30 जून 2025 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।

रिपोर्ट के आधार पर 27 अक्टूबर 2025 को सलाहकार समिति ने प्रस्ताव को स्वीकृति देने की सिफारिश की। इसके एक माह के भीतर, 24 नवंबर 2025 को परियोजना को स्टेज-I की सशर्त वन स्वीकृति जारी की गई।
NTCA की चेतावनी, जिसे किया गया नजरअंदाज
केंद्रीय जनजाति मंत्रालय (MOTA) ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) से राय मांगी। इसके जवाब में प्राधिकरण ने कहा कि प्रस्तावित साइट सतपुड़ा–मेलघाट के बीच स्थित एक महत्वपूर्ण कनेक्टिंग कॉरिडोर में आती है। यह कॉरिडोर एनटीसीए द्वारा चिन्हित है और टाइगर संरक्षण योजना में शामिल है।

एनटीसीए की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय बाघ अनुमान अभ्यास 2022 में यह क्षेत्र बाघों के उपयोग वाला वन क्षेत्र दर्ज किया गया है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि यहां तेंदुआ, भारतीय भेड़िया, जंगली कुत्ता और धारीदार लकड़बग्घा जैसी अनुसूची-1 की प्रजातियां मौजूद हैं। प्राधिकरण ने कहा है कि प्रस्तावित बांधों के निर्माण से ऐसे वन क्षेत्र जलमग्न हो सकते हैं, जो सतपुड़ा और मेलघाट के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं।
रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया गया है कि दोनों टाइगर रिजर्व में बाघों का घनत्व अपेक्षाकृत कम है और वे मेटा-पॉपुलेशन फ्रेमवर्क के तहत कार्य करते हैं। ऐसे में इस कॉरिडोर के माध्यम से आवाजाही को आनुवंशिक आदान-प्रदान और आबादी की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए आवश्यक बताया गया है।
एनटीसीए ने यह भी उल्लेख किया है कि दोनों रिजर्व स्वैच्छिक गांव पुनर्वास के बाद रिकवरी चरण में हैं और राष्ट्रीय बाघ अनुमान 2022 में वन्यजीव आबादी में सुधार दर्ज किया गया है। रिपोर्ट में पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए वैकल्पिक स्थलों की खोज की सिफारिश की गई है।
7 जनवरी 2025 को सलाहकार समिति ने एक उप-समिति का गठन किया। इसके अध्यक्ष तत्कालीन अतिरिक्त महानिदेशक वन (संरक्षण) अंजन कुमार मोहंती थे। समिति में गैर-सरकारी सदस्य नित्यानंद श्रीवास्तव, क्षेत्रीय कार्यालय भोपाल के डीडीजीएफ (NTCA) के प्रतिनिधि और कृषि मंत्रालय के प्रतिनिधि डॉ. मेहराज शेख शामिल थे।

उप-समिति ने 27–28 मार्च 2025 को साइट विजिट किया, हालांकि डॉ. मेहराज शेख अन्य दायित्वों के कारण इसमें शामिल नहीं हो सके। 30 जून 2025 को रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जिसमें अध्यक्ष ने बताया कि साइट निरीक्षण में शामिल सभी सदस्यों ने रिपोर्ट से सहमति व्यक्त की है।
उप-समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि प्रस्तावित क्षेत्र के परिदृश्य में पहले से एक बड़ा जलाशय और बैतूल–भोपाल राजमार्ग जैसे रैखिक बुनियादी ढांचे मौजूद हैं। इसके बावजूद, समिति के अनुसार उपलब्ध अनुभवजन्य साक्ष्य, जिनमें कैमरा ट्रैप डेटा और मानव-वन्यजीव संघर्ष से जुड़े आंकड़े शामिल हैं। ये साक्ष्य बाघों की आवाजाही में किसी बड़े व्यवधान की ओर संकेत नहीं करते।
रिपोर्ट में कहा गया है कि वन्यजीव गलियारों की कार्यक्षमता केवल मैप की गई सीमाओं से तय नहीं होती। यह वास्तविक मूवमेंट डेटा पर निर्भर करती है। इसमें हैबिटेट पार्मिएबिलिटी भी एक अहम कारक है। रिपोर्ट के अनुसार परिदृश्य में उपलब्ध वैकल्पिक मार्ग अब भी मौजूद हैं।

रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया गया कि राज्य सरकार के अधिकारियों ने मौजूदा बुनियादी ढांचे के वन्यजीवों की आवाजाही पर प्रभाव से संबंधित कोई विस्तृत जानकारी प्रस्तुत नहीं की। न तो टेलीमेट्री डेटा, न कैमरा ट्रैप रिकॉर्ड और न ही फील्ड-आधारित संघर्ष आकलन उपलब्ध कराया गया।
समिति ने यह भी नोट किया कि कॉरिडोर को चिन्हित किए एक दशक से अधिक समय बीत चुका है। इसके बावजूद राज्य वन विभाग ऐसी कोई जानकारी प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे यह सिद्ध हो सके कि चिन्हित कॉरिडोर वर्तमान में अपने उद्देश्य की पूर्ति कर रहा है।
इन्हीं आधारों पर उप-समिति ने निष्कर्ष निकाला कि मौजूदा जलविज्ञानीय और अन्य बुनियादी ढांचे से कॉरिडोर की कार्यात्मक अखंडता पर महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ता। रिपोर्ट में कहा गया है कि मोरंड-गंजाल जलाशयों के निर्माण से होने वाली जलमग्नता से बाघों के प्रसार में गंभीर बाधा की संभावना कम है। रिपोर्ट के अनुसार आसपास के वन क्षेत्र और पहाड़ी मार्ग अब भी उपलब्ध हैं। इन्हें वैकल्पिक आवागमन मार्ग माना गया है।
हालांकि एनटीसीए की उप महानिरीक्षक बानुमति जी. इस रिपोर्ट से असहमत रहीं और उन्होंने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए।
सब-कमेटी ने पलटा पासा
उप-समिति ने सिफारिश की कि केवल एक बांध, गंजाल, के लिए ही ‘इन-प्रिंसिपल’ मंजूरी दी जाए। समिति ने सिफारिश की कि मोरंड बांध पर निर्णय गंजाल परियोजना के प्रभावों के विस्तृत अध्ययन के बाद लिया जाए। 27 अक्टूबर 2025 को सलाहकार समिति ने इस सिफारिश को स्वीकार किया। समिति ने गंजाल बांध के लिए 811.29 हेक्टेयर वन भूमि की मंजूरी की अनुशंसा की। इसके एक माह के भीतर, 24 नवंबर 2025 को केंद्र सरकार ने परियोजना को स्टेज-I की सशर्त मंजूरी जारी की।
मंजूरी की शर्तों में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा कॉरिडोर की कार्यक्षमता पर एक लघु अवधि का अध्ययन शामिल है। राज्य वन्यजीव बोर्ड (SCNBWL) की सिफारिश भी अनिवार्य रखी गई है। यह सिफारिश स्टेज-II यानी अंतिम वन मंजूरी से पहले प्रस्तुत करनी होगी।
इसके अलावा राज्य सरकार को NTCA और WII के सहयोग से काम करना होगा। सरकार को मध्य भारतीय परिदृश्य में बाघों की उपस्थिति और उनकी आवाजाही का मैपिंग करना होगा। यह मैपिंग द्विवार्षिक आधार पर की जाएगी। यह प्रक्रिया कम से कम छह वर्षों तक जारी रहेगी। गंजाल बांध के कैचमेंट एरिया के लिए कैचमेंट एरिया ट्रीटमेंट (CAT) प्लान तैयार करना भी शर्तों में शामिल है।
पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे का कहना है,
“यह कागजों पर सावधानी जैसा दिखता है, लेकिन व्यवहार में यह पहले बांध बना लो, फिर देखेंगे जैसा मॉडल है।”
वहीं भोपाल के अर्बन टाइगर मामलों में एनजीटी में कई याचिकाएं दायर कर चुके पर्यावरण कार्यकर्ता राशिद नूर खान सवाल उठाते हैं,
“अगर राज्य वन विभाग दस वर्षों में यह साबित नहीं कर सका कि कॉरिडोर काम कर रहा है, तो छह साल की मॉनिटरिंग यह कैसे साबित करेगी कि बांध से कोई नुकसान नहीं हुआ।”
दोनों कार्यकर्ताओं ने यह सवाल भी उठाया कि यदि बांध वास्तव में कॉरिडोर को नुकसान पहुंचाता है, जैसा कि NTCA की आशंका है। ऐसे में छह साल बाद, जब अध्ययन के निष्कर्ष सामने आएंगे, तब तक हुए नुकसान की भरपाई कैसे होगी। उन्होंने यह भी पूछा कि उस नुकसान की जिम्मेदारी किसकी होगी।
गंजाल बांध को दी गई स्टेज-I मंजूरी ने सतपुड़ा-मेलघाट टाइगर कॉरिडोर के मामले में एहतियात से अधिक प्रयोग का रास्ता खोल दिया है। NTCA की चेतावनियों के बावजूद 811.29 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन को आगे बढ़ाया गया है। सरकार ने इसे स्टैगर्ड अप्रोच बताते हुए मोरंड बांध पर निर्णय को भविष्य के अध्ययनों पर टाल दिया है।
हालांकि एक बार वन क्षेत्र जलमग्न होने के बाद छह वर्षों की मॉनिटरिंग भी उस नुकसान को वापस नहीं ला सकती। अब निर्णायक बिंदु स्टेज-II अर्थात अंतिम मंजूरी से पहले होने वाली वन्यजीव संस्थाओं की प्रक्रिया और कॉरिडोर की कार्यक्षमता पर स्वतंत्र और डेटा-आधारित जांच होगी। यही तय करेगा कि यह निर्णय विकास का उदाहरण माना जाएगा या संरक्षण नीति में एक बड़ी चूक।
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