मध्य प्रदेश की सर्दियां अब केवल मौसमी बदलाव नहीं रहीं। पिछले एक दशक में यह एक जलवायु संकट के रूप में सामने आई हैं। प्रदेश के उत्तरी हिस्से (ग्वालियर-चंबल) से लेकर पश्चिमी क्षेत्र (मालवा-निमाड़) तक, शीतलहर की घटनाएं न केवल बार-बार हो रही हैं, बल्कि ये अधिक लंबी और जानलेवा भी बन गई हैं।
ग्वालियर के सबसे बड़े सरकारी जयारोग्य अस्पताल (JAH) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 29 दिसंबर 2025 से 9 जनवरी 2026 के बीच हार्ट अटैक के 308 और ब्रेन स्ट्रोक के 123 मरीज पहुंचे। इनमें से 23 की मौत हो गई। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन मृतकों में 30 से 45 वर्ष के युवा भी शामिल हैं।
अस्पताल के अधीक्षक डॉ. आरकेएस धाकड़ बताते हैं, “ओपीडी में हृदय और श्वास रोगियों की संख्या दोगुनी हो गई है। यह सामान्य सर्दी नहीं है। हमारे पास ऐसे युवा आ रहे हैं जिनकी धमनियों में पहले कोई ब्लॉकेज नहीं था, फिर भी उन्हें कोल्ड स्ट्रोक पड़ा।”
कैसे ठंड बन रही है हार्ट अटैक का कारण?
जीआर मेडिकल कॉलेज, ग्वालियर के कार्डियोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. पुनीत रस्तोगी इसके पीछे की साइंस समझाते हैं: “4°C तापमान में शरीर गर्मी बचाने के लिए रक्त वाहिकाओं को सिकोड़ लेता है। इससे ब्लड प्रेशर अचानक 160/100 के पार चला जाता है। युवाओं में तनाव और खराब लाइफस्टाइल के कारण धमनियों में मौजूद हल्की प्लाक इस दबाव से फट जाती है, जिससे तत्काल थक्का बनता है और मैसिव हार्ट अटैक होता है।”
डॉ. रस्तोगी आगे कहते हैं, “ग्लोबल वार्मिंग के दौर में हमने एसी और हीटर लगाकर घरों को तो बदल लिया, लेकिन शरीर थर्मल शॉक के लिए तैयार नहीं है। ठंड में प्यास कम लगने से डिहाइड्रेशन होता है, खून गाढ़ा हो जाता है। यही गाढ़ा खून ब्रेन स्ट्रोक का कारण बन रहा है।”
क्लाइमेट व्हिप्लैश: 2025 की गर्मी का बर्फीला बदला
इस बार की ठंड ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। दिसंबर-जनवरी में कई जिलों में पारा 5 डिग्री से नीचे गिरा। मंदसौर में 2.5 डिग्री तक पहुंचा, जबकि भोपाल में रात का तापमान 3.8 डिग्री तक लुढ़क गया—पिछले एक दशक में सबसे कम। ग्वालियर में घने कोहरे के साथ लगातार कोल्ड डे दर्ज किए गए।
वैज्ञानिक इस घटना को ‘क्लाइमेट व्हिप्लैश’ कह रहे हैं—यानी मौसम का पेंडुलम की तरह एक चरम से दूसरे चरम पर तेजी से झूलना।
IMD की वैज्ञानिक डॉ. दिव्या सुरेंद्र समझाती हैं, “2025 भारत के इतिहास (1901 के बाद) का 8वां सबसे गर्म साल था। मध्य प्रदेश में मानसून के बाद भी असामान्य गर्मी बनी रही। वायुमंडल में जमा हुई इस अतिरिक्त ऊष्मा ने मौसम प्रणालियों को अस्थिर कर दिया। जैसे ही जनवरी शुरू हुआ, सिस्टम पलट गया और जमा हुई ऊर्जा चरम शीत लहर के रूप में बाहर आई।”
आर्कटिक वार्मिंग का असर मध्य प्रदेश तक
भोपाल मौसम केंद्र के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस समय उत्तर भारत के ऊपर 12.6 किलोमीटर की ऊंचाई पर सब-ट्रॉपिकल वेस्टर्ली जेट स्ट्रीम 240 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चल रही है।
डॉ. दिव्या बताती हैं, “आमतौर पर यह जेट स्ट्रीम सीधी बहती है, लेकिन आर्कटिक के गर्म होने के कारण यह कमजोर होकर लहरदार हो गई है। इस वजह से जनवरी 2026 में इसका एक निचला हिस्सा सीधे ग्वालियर, चंबल और भोपाल के मैदानी इलाकों में 278 किमी/घंटा की रफ्तार से ठंडी हवा पंप कर रहा है। यही कारण है कि धूप निकलने के बाद भी गलन कम नहीं हो रही।”
सूखी ठंड और जहरीला चैंबर
दिसंबर 2025 में मध्य प्रदेश सहित देश भर में औसत वर्षा में 69 प्रतिशत की भारी कमी दर्ज हुई। नमी न होने के कारण हवा सूखी और भारी हो गई है। यह सूखी ठंड प्रदूषक तत्वों (PM 2.5) को जमीन के पास फंसा लेती है, जिससे एक जहरीला चैंबर बन जाता है। यह स्थिति फेफड़ों और दिल के लिए गीली ठंड से कहीं ज्यादा घातक है।
जबलपुर में कोहरे और प्रदूषण ने सांस लेना दूभर कर दिया है। यहां भी ब्रेन स्ट्रोक के मामलों में 20-30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
सबसे खतरनाक है दिन का तापमान गिरना
IMD वैज्ञानिकों के अनुसार, 2026 की सबसे खतरनाक बात न्यूनतम तापमान नहीं, बल्कि अधिकतम तापमान का गिरना है। भोपाल और ग्वालियर जैसे शहरों में जनवरी माह में दिन का तापमान सामान्य से 6-7 डिग्री नीचे (18°C-20°C) बना रहा।
डॉ. पुनीत रस्तोगी कहते हैं, “इसका मतलब है कि शरीर को 24 घंटे में कभी भी रिकवरी का मौका नहीं मिल रहा। जिससे हाइपोथर्मिया और हार्ट फेलियर का खतरा बढ़ गया है।”
पिछले दशक में कैसे बदला मौसम?
पिछले दशक (2016-2026) के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो एक स्पष्ट पैटर्न दिखता है—अस्थिरता। पहले सर्दी का एक निश्चित पैटर्न था, अब हर साल नए रिकॉर्ड टूट रहे हैं।
2021 में जनवरी दशक का सबसे गर्म महीना था, जबकि 2026 में यह सबसे ठंडे महीनों में से एक बन गया। महज पांच साल में यह भारी बदलाव जलवायु परिवर्तन का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
पॉलिसी में कमी: कोल्ड वेव अभी भी आपदा नहीं

राज्य सरकार ने मध्य प्रदेश स्टेट एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज (MP-SAPCC 2022-27) लागू किया है, जिसमें लू से निपटने के शानदार प्रोटोकॉल हैं, ORS कॉर्नर, हीट ओपीडी, कूल रूफ्स आदि। आपदा प्रबंधन नियमों में लू-बाढ़ के लिए मुआवजे का भी प्रावधान है।
लेकिन शीतलहर के लिए ऐसी कोई ठोस रणनीति जमीनी स्तर पर नहीं दिखती।
पर्यावरण कार्यकर्ता राशिद नूर खान कहते हैं, “सरकारी फाइलों में ठंड से होने वाली मौतों को अक्सर कार्डियक अरेस्ट या बीमारी माना जाता है, क्लाइमेट डिजास्टर नहीं। इसलिए पीड़ित परिवारों को वह मुआवजा नहीं मिलता जो बाढ़ या बिजली गिरने पर मिलता है।”
हालांकि प्रशासन ने तत्परता दिखाते हुए ग्वालियर, भोपाल, इंदौर सहित कई जिलों में स्कूलों का समय बदला या छुट्टियां घोषित की हैं। ग्वालियर कलेक्टर रुचिका चौहान ने रैन बसेरों और जिला अस्पताल का निरीक्षण कर बेघरों के लिए अलाव और कंबल की व्यवस्था सुनिश्चित की है।
राशिद इसे अस्थायी मानते हैं: “हमारे अस्पताल लू के मरीजों के लिए तैयार किए जा रहे हैं, लेकिन कोल्ड स्ट्रोक और विंटर कार्डियक इमरजेंसी के लिए नहीं। अस्पतालों में वार्मिंग रूम्स या विशेष विंटर ओपीडी की अवधारणा अभी नदारद है।”
क्या करना होगा?
मध्य प्रदेश में जनवरी की यह सर्दी एक चेतावनी है। जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार, जैसे-जैसे पृथ्वी गर्म होगी, जेट स्ट्रीम और अधिक अस्थिर होगी। इसका मतलब है कि भविष्य में हमें और भी भयानक, अचानक और जानलेवा सर्दियों का सामना करना पड़ेगा।
डॉ. पुनीत रस्तोगी 30-45 वर्ष के युवाओं को सलाह देते हैं, “सुबह 4 से 8 बजे के बीच टहलना बंद कर दें। धूप निकलने पर ही बाहर निकलें। यह समय हार्ट अटैक के लिए सबसे संवेदनशील है।”
पर्यावरण कार्यकर्ता सुभाष पांडे कहते हैं, “शीतलहर को आधिकारिक तौर पर राज्य आपदा घोषित किया जाए। अस्पतालों में सर्दियों के लिए विशेष प्रोटोकॉल और इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार किए जाएं। जलवायु परिवर्तन कार्य योजना को कागजों से निकालकर धरातल पर उतारना होगा। इसमें अर्बन प्लानिंग, ग्रीन कवर बढ़ाने और प्रदूषण नियंत्रण शामिल होना चाहिए।”
अस्पतालों के फर्श पर लेटे मरीज और मुरझाई हुई फसलें हमें बता रही हैं—अगर हमने मौसम के इस बदले मिजाज को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाले साल इससे भी अधिक भयावह हो सकते हैं।
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