मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के पलकौंहा और दौधन सहित 20 से अधिक गांव केन–बेतवा लिंक परियोजना के पहले चरण में बनने वाले दौधन बांध के डूब क्षेत्र में आ रहे हैं। प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें पर्याप्त मुआवजा और पुनर्वास नहीं दिया जा रहा है। इसी मुद्दे को लेकर फरवरी के दूसरे सप्ताह में विरोध प्रदर्शन तेज हुआ, पुलिस ने लाठीचार्ज किया और अब प्रशासन फिर से सर्वे करवाने की बात कर रहा है।

दरअसल केन–बेतवा लिंक परियोजना के पहले चरण में केन नदी पर 77 मीटर ऊंचा दौधन बांध और करीब 221 किलोमीटर लंबी नहर बनाई जा रही है, जिसके जरिए केन का अधिशेष जल बेतवा बेसिन में भेजा जाएगा। सरकार का दावा है कि इससे बुंदेलखंड को सिंचाई और पेयजल में राहत मिलेगी, लेकिन प्रभावित गांव पुनर्वास और मुआवजे को लेकर अभी भी असंतुष्ट हैं।

बांध का निर्माण और प्रदर्शन
पलकौहां गांव के भानु प्रताप यादव को उनकी 3 एकड़ जमीन के लिए 15 लाख रूपये मुआवजे के तौर पर मिले हैं। भानु प्रताप की शिकायत है कि जमीन की कीमत इससे ज्यादा लगाई जानी चाहिए थी क्योंकि उन्हें कहीं भी 5 लाख रूपये में एक एकड़ जमीन नहीं मिल रही। भानु की तरह और भी ग्रामीण इसी तरह की असंतुष्टता ज़ाहिर करते हैं।
इन ग्रामीणों को बीते 4 महीनों से अलग-अलग तारीखों में मुआवजा राशि मिली है। इसी दौरान दौधन बांध का काम भी शुरू हो गया। मगर मुआवजे से असंतुष्ट लोगों ने निर्माण क्षेत्र में प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। वह यहां 6 से 8 फरवरी के बीच डटे रहे।
तनाव तब बढ़ा जब सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर को 9 फरवरी को पुलिस ने, भारतीय न्याय संहिता की धारा 191 (दंगा करना) के तहत हिरासत में ले लिया। उनकी गिरफ्तारी के बाद 10 फरवरी को हजारों लोग बिजावर तहसील कार्यालय के बाहर एकत्रित हुए और धरना दिया।
ग्रामीणों का आरोप है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान ही पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया और वाटर कैनन से पानी छोड़ा। दौधन में रहने वाली शांति कोंदर उस वक़्त प्रदर्शनकारियों में शामिल थीं। वह बताती हैं कि रात 11.30 बजे पहले लाठीचार्ज हुआ फिर आधी रात के बाद पानी छोड़ा गया जिससे महिलाएं और बच्चे भीग गए। ग्रामीणों का दावा है कि तड़के दो बजे फिर बल प्रयोग हुआ।

इस पर बिजावर के एसडीएम राकेश शुक्ला कहते हैं, “केन बेतवा परियोजना के तहत दौधन में बन रहे बांध स्थल पर कुछ लोगों ने बिना पूर्व सूचना दिए काम रुकवा दिया। यह कदम अमित भटनागर और कुछ अन्य लोगों के नेतृत्व में उठाया गया और प्रशासन को पहले से कोई लिखित सूचना नहीं दी गई।”
तीन दिन बाद हुई रिहाई के बाद अमित भटनागर ने अन्य ग्रामीणों के साथ कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपा। इसमें घटना स्थल के सीसीटीवी फुटेज, घायल व्यक्तियों की मेडिकल जांच और आंदोलन से जुड़े व्यक्तियों पर दर्ज एफआईआर/प्रकरण की सूची व प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराने की मांग की गई। इसके अतिरिक्त महिलाओं, बच्चों पर बल प्रयोग एवं जातिसूचक शब्दों के प्रयोग की जांच की मांग की गई है।
क्या है ग्रामीणों की शिकायतें?
दौधन प्राथमिक शाला की एक दीवार पर परियोजना से प्रभावित गांव के कुल 363 परिवार को दिए गए मुआवज़ा की लिस्ट चस्पा है। प्रत्येक परिवार के आगे 12 लाख 50 हजार रुपये की फिक्स राशि लिखी है। इस प्रकार दौधन के कुल 363 परिवारों को कुल 46.50 लाख करोड़ रुपये दिए गए हैं। लेकिन गांव वालों का आरोप है कि यह राशि अपर्याप्त है और उन्हें कम से कम 25 लाख रुपये (प्रति परिवार) मिलना चाहिए।

इसके अलावा ग्रामीणों का आरोप है कि लाभार्थियों में परिवार की महिलाओं को शामिल नहीं किया गया है। पलकौंहा की भगवती यादव बताती हैं कि उनकी बेटी 25 साल की है, लेकिन उसे मुआवजे की राशि नहीं दी गई है। भगवती कहती हैं, “अधिकारियों ने हमसे कहा कि बेटी को मुआवजा नहीं मिलेगा। मैं पूछती हूं कि लड़की इंसान नहीं होती क्या?”
इसी गांव के विनोद अहिरवार की बहन पूजा अहिरवार (19) का नाम भी सूची में नहीं जोड़ा गया है। मुआवजे को लेकर हुए सर्वे के दौरान उनकी बहन गांव से बाहर काम करने गई हुई थी।
भूमि अधिग्रहण कानून 2013 की धारा 3(m) में ‘परिवार’ की परिभाषा दी गई है। इसमें एक व्यक्ति, उसका पति/पत्नी, नाबालिग बच्चे और उस पर निर्भर नाबालिग भाई-बहन शामिल होते हैं। कानून यह भी स्पष्ट करता है कि हर वयस्क व्यक्ति को अलग परिवार माना जा सकता है। लेकिन पति और पत्नी को सामान्य तौर पर एक संयुक्त परिवार इकाई माना जाता है, इसलिए पत्नी के लिए अलग से अतिरिक्त मुआवजा राशि का प्रावधान नहीं है।
शांति कोंदर मांग करती हैं कि पत्नी को भी अलग मुआवजा राशि मिलनी चाहिए। वह सवाल करती हैं,
अगर पूरी राशि पति द्वारा शराब पीकर गैर-जिम्मेदाराना ढंग से खर्च कर दी गई, तो हमारे बच्चों के भविष्य का क्या होगा?
सर्वे पर सवालिया निशान
दौधन के बिहारी आदिवासी सर्वे की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं। वह कहते हैं, “हमारे मकान की लंबाई, ऊंचाई और चौड़ाई मापी गई, लेकिन हमारे आंगन और बाड़ तक के हिस्से को नहीं मापा गया।”

भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार पहले अधिसूचना जारी होती है, फिर प्रभावित परिवारों का विस्तृत सर्वे किया जाता है। इसमें जमीन, मकान, आजीविका के नुकसान, सार्वजनिक सुविधाओं और सामुदायिक संसाधनों का पूरा विवरण दर्ज किया जाता है।
कानून यह भी कहता है कि जमीन अधिग्रहण से पहले सामाजिक प्रभाव आकलन किया जाए और इसके लिए स्थानीय पंचायत या नगर निकाय से परामर्श हो। इसकी अधिसूचना स्थानीय भाषा में जारी हो और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाए। रिपोर्ट बनने से पहले प्रभावित क्षेत्र में सार्वजनिक सुनवाई करना अनिवार्य है, ताकि लोग अपनी बात रख सकें।
सर्वे को लेकर छतरपुर के जिलाधिकारी पार्थ जायसवाल ने बताया कि ग्रामीणों की मांग पर विचार करते हुए 13 प्रभावित गांवों के लिए अलग से सर्वे दल गठित कर दोबारा सर्वे करवाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पैकेज से छूट गए लोगों का पुनः सर्वे कराया जाएगा। साथ ही उन्होंने कहा कि यदि कोई पात्र व्यक्ति दस्तावेजों की कमी के कारण सूची में शामिल नहीं हो पाया है तो उसके दस्तावेज तैयार कराने में प्रशासन मदद करेगा। ऐसे सभी पात्र लोगों का नाम जोड़कर उन्हें मुआवजा दिया जाएगा।
जिलाधिकारी के अनुसार डैम का निर्माण कार्य वापस शुरू कर दिया गया है। उन्होंने आश्वासन दिया कि परियोजना से संबंधित जानकारी समय-समय पर प्रभावित गांवों को उपलब्ध कराई जाती रहेगी।
दूसरी ओर ग्रामीण 25 लाख रुपये मुआवजा, हर वयस्क को राशि, जमीन का उचित दाम और महिलाओं को भी अलग से मुआवजा दिए जाने की मांग पर कायम हैं। अमित भटनागर ने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा कि, हम सड़क से समाधान की ओर बढ़ना चाहते हैं। लेकिन अगर प्रशासन बल का प्रयोग करेगा, अन्याय करेगा तो हम इसका जोरदार विरोध करेंगे। वहीं भगवती आदिवासी का कहना है कि उनकी मांग पूरी हुए बिना वो बांध नहीं बनने देंगी, चाहे उनकी जान ही क्यों न चली जाए।
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