मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले में मोहनपुरा डैम के डूब क्षेत्र में आने वाले लगभग 40–50 गांवों के ग्रामीण रोज़ाना नांव से सफर करते हैं। यह सफर बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के होता है। लोग अपनी जान जोखिम में डालकर पानी पार करते हैं।
ऐसा नहीं है कि उन्हें डर नहीं लगता। परिवार की चिंता भी होती है। इसके बावजूद वे यह जोखिम उठाते हैं। उनके पास दूसरा रास्ता मौजूद है। लेकिन वह रास्ता लंबा है और समय भी ज़्यादा लगता है। देर रात आने-जाने में असुरक्षा का डर भी बना रहता है।
यह स्थिति राजगढ़ ब्लॉक के उद्पुरिया और रायपुरिया गांव की हैं। यहां के ग्रामीणों ने समय और पैसे बचाने के लिए डैम के डूब क्षेत्र में खुद ही एक वैकल्पिक रास्ता बना लिया है। इसी रास्ते से सैकड़ों लोग रोज़ नांव से आवाजाही करते हैं।
ग्रामीण बताते हैं कि डैम बनने से पहले करीब 40–50 गांवों को शहर से जोड़ने वाला एक सीधा रास्ता था। इसी रास्ते से वे कम समय और कम खर्च में ब्यावरा पहुंच जाते थे।
वर्ष 2017 में डैम में पानी भरने के बाद वह रास्ता और उस पर बना पुल डूब गया। इसके बाद लोगों ने नाव का सहारा लेना शुरू किया। वे दोपहिया वाहन के साथ नदी पार करते हैं।
नांव चलाने वालों का कहना है कि वे यह काम शौक से नहीं करते। उन्हें दूसरों की जान खतरे में डालने की इच्छा नहीं है। उनका कहना है कि अगर पुलिया और सड़क दोबारा बना दी जाए, तो वे तुरंत नाव चलाना बंद कर देंगे और दूसरे काम करने लगेंगे।
ग्राउंड रिपोर्ट की टीम ने इस मामले में मोहनपुरा परियोजना के प्रबंधक अशोक दीक्षित से बात की। उन्होंने कहा कि
“जिन गांवों से नाव चल रही है, वे पहले ही डूब क्षेत्र में दर्ज हैं। ग्रामीणों को मुआवजा भी दिया जा चुका है।”
उनका कहना है कि ग्रामीण अब गांव के ऊपरी हिस्सों में रह रहे हैं और वहीं उन्होंने मकान बनाए हैं। जिस पुल की बात की जा रही है, वह 2017 में ही डूब चुका है। आज अगर वहां पुल होता भी, तो उस पर लगभग 30 फीट पानी रहता।
दीक्षित के अनुसार रिकॉर्ड में वहां कोई आबादी दर्ज नहीं है, जिसके लिए पुल बनाया जाए। विभाग की ओर से ऐसा कोई प्रस्ताव भी लंबित नहीं है। उन्होंने कहा कि ब्यावरा जाने के लिए डैम की डाउनस्ट्रीम में बना रपटा मौजूद है, जहां से लोग डायवर्ट होकर जा सकते हैं।
डैम के रिज़रवॉयर में नाव संचालन जैसी गतिविधियों को उन्होंने कानून-व्यवस्था का मामला बताया। उनके अनुसार इसकी जिम्मेदारी संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की है, परियोजना की नहीं।
वहीं ग्रामीणों का कहना है कि उनकी आधी ज़मीन डूब गई है और आधी बची हुई है। इसी वजह से वे अब भी वहीं रह रहे हैं। उन्हें यह अंदाज़ा नहीं था कि डैम में इतना पानी भरेगा कि शहर से जोड़ने वाला रास्ता पूरी तरह बंद हो जाएगा।
उस समय लोग मुआवजे और पुनर्वास की चिंता में थे। सड़क और पुल के भविष्य पर ध्यान नहीं गया। अब पानी की सहूलियत उनके लिए परेशानी बन गई है।
ग्रामीण बताते हैं कि यदि वे नांव का इस्तेमाल न करें, तो उन्हें ब्यावरा जाने के लिए 60 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है। रोज़ की 300 रुपये की मज़दूरी में से 100 से 200 रुपये पेट्रोल में खर्च हो जाते हैं। ऐसे में नांव उनके लिए सबसे सस्ता विकल्प बचता है।
पीडब्ल्यूडी (PWD) विभाग के एसडीओ (SDO) प्रेमनारायण धनवाल कहते हैं कि डूबी हुई सड़क और पुलिया उनके विभाग की थी। उनके अनुसार यह डब्ल्यूआरडी (WRD) विभाग की परियोजना के कारण डूबी है। ऐसे में नया ब्रिज बनाना उसी विभाग की जिम्मेदारी है। पीडब्ल्यूडी को कोई भुगतान नहीं किया गया है।
डैम निर्माण के समय ग्रामीणों और विभागीय अधिकारियों को यह अंदाज़ा नहीं था कि आसपास के गांवों को जोड़ने वाली सड़कें और पुल भी डूब जाएंगी। इसका असर केवल डूब क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। आसपास के गांवों का रोजगार भी प्रभावित हुआ।
इसी वजह से न तो उस समय ग्रामीणों ने आवाज़ उठाई और न ही पीडब्ल्यूडी ने कम जलस्तर वाले इलाके में वैकल्पिक सड़क का प्रस्ताव तैयार किया। नतीजा यह है कि आज ग्रामीणों के सामने दो ही विकल्प हैं। या तो वे लंबा सफर करें, या हर दिन जान जोखिम में डालें।
इस पूरे मामले पर राजगढ़ की एसडीएम निधि भारद्वाज का कहना है कि प्रकरण उनके संज्ञान में है। सभी संबंधित विभागों के साथ मिलकर स्थायी समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है।
मोहनपुरा डैम के डूब क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीण आज विकास और व्यवस्था के बीच फंसे हुए हैं। रिकॉर्ड में ये गांव डूब क्षेत्र में दर्ज हैं और मुआवजा ले चुके हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि लोग आज भी रोज़गार और इलाज के लिए नांव से सफर करने को मजबूर हैं।
विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं। ग्रामीण अब भी एक सस्ते, सुरक्षित और स्थायी विकल्प का इंतज़ार कर रहे हैं। यह मामला सिर्फ सड़क या पुल का नहीं है। यह उन लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का सवाल है, जिन्हें हर दिन यह तय करना पड़ता है कि वे लंबा सफर करें या लंबी ज़िंदगी।
भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें।
अन्य वीडियो रिपोर्ट्स
पुल को तरसता सरहदी गांव अराई मलका
राजगढ़: डिफॉल्टर किसानों को खाद नहीं, जो डिफॉल्टर नहीं वो धक्के खा रहे
पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।




