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मोदी जी के ‘जैन आलू’ के पीछे का विज्ञान, ‘एयरोपोनिक्स’ को समझिए

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दिसंबर 2023 में ग्वालियर के राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्व विद्यालय में एक अनोखी इकाई का उद्घाटन हुआ। यहां न मिट्टी है, न परंपरागत खेत, फिर भी आलू के पौधे बेहद स्वस्थ और रोगमुक्त बीज दे रहे हैं। इस तकनीक का नाम है एयरोपोनिक्स, और यह भारत में आलू के बीज उत्पादन को एक नई दिशा देने की कोशिश है। यह वही तकनीक है जिसका जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “जैन आलू” के संदर्भ में किया था।

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक देश है। लेकिन आलू की खेती अनाज से अलग है, यहां किसान बीज नहीं, बल्कि कंद (ट्यूबर) बोते हैं। परंपरागत तरीके से रोगमुक्त और उच्च गुणवत्ता वाले कंद तैयार करने में कई साल लग जाते हैं। इस बीच बीमारी और जलवायु परिवर्तन की मार फसल पर पड़ती रहती है।

एयरोपोनिक्स इसी समस्या का समाधान लेकर आई है।

क्या है एयरोपोनिक्स?

Aeroponics is a cultivation technique in which plant roots are suspended in air rather than soil or water.
एरोपोनिक्स खेती की एक तकनीक है जिसमें पौधों की जड़ें मिट्टी या पानी के बजाय हवा में लटकी रहती हैं।

एयरोपोनिक्स में पौधों की जड़ें न मिट्टी में होती हैं, न पानी में, वे हवा में लटकी रहती हैं। समय-समय पर पोषक तत्वों से भरी बारीक फुहार इन जड़ों पर छिड़की जाती है। इससे जड़ों को भरपूर ऑक्सीजन मिलती है, पोषण भी पूरा होता है और पानी की खपत परंपरागत सिंचाई के मुकाबले 90 से 95 प्रतिशत तक कम हो जाती है।

“पोषक तत्व एक मिस्ट सिस्टम के जरिए जड़ों तक पहुंचते हैं। टाइमर के जरिए हर कुछ मिनट में फॉगिंग होती है और बचा हुआ पानी टैंक में वापस चला जाता है, यानी पानी की बर्बादी न के बराबर है,” कृषि वैज्ञानिक डॉ. सुषमा तिवारी बताती हैं।

“क्योंकि पूरा सिस्टम नियंत्रित वातावरण में काम करता है, इसलिए मिट्टी से होने वाली बीमारियों का खतरा भी नहीं रहता।”

एक पौधे से 100 कंद

Dr Sushma Tiwari said, “Compared to conventional irrigation, this technique can save up to 90–95 percent of water.”
डॉ. सुषमा तिवारी ने कहा, “पारंपरिक सिंचाई की तुलना में इस तकनीक से 90-95 प्रतिशत तक पानी की बचत हो सकती है।”

परंपरागत खेत में एक आलू का पौधा पांच से सात कंद देता है। एयरोपोनिक्स में यही पौधा 50 से 100 से भी अधिक मिनी-ट्यूबर यानी छोटे कंद दे सकता है। इससे बीज गुणन की रफ्तार कई गुना बढ़ जाती है।

ग्वालियर की इकाई में तापमान 22 से 23 डिग्री सेल्सियस पर नियंत्रित रखा जाता है। एग्जॉस्ट सिस्टम, कूलिंग पैड और ओवरहेड मिस्टिंग से यह संभव होता है। पौधे पैनलों पर लगे होते हैं, उनकी जड़ें बंद चेंबर में लटकी रहती हैं। यहां तैयार होने वाले कंद “G0 जनरेशन” कहलाते हैं, यानी रोगमुक्तता की सबसे पहली और शुद्धतम अवस्था। बाद में इन्हें खुले खेतों में दो पीढ़ियों तक और विकसित करके किसानों तक पहुंचाया जाता है।

डॉ. सुषमा तिवारी मूलतः बायोटेक्नोलॉजिस्ट हैं। वे बताती हैं, “पहले हम यहां टिशू कल्चर और मॉलिक्युलर वर्क करते थे, वहीं से यह रुचि जागी।” उन्होंने बताया कि जब कुछ संस्थानों ने इस तकनीक को पेटेंट कर ऊंचे दाम वसूलने शुरू किए, तो विश्वविद्यालय ने तय किया कि इसे खुद मानकीकृत किया जाए।

इस परियोजना के लिए मध्यप्रदेश मंडी बोर्ड से करीब 9.5 करोड़ रुपए का अनुदान मिला। इंदौर और सीहोर में भी इसी प्रयोग से जुड़ी इकाइयां कार्यरत हैं।

कौन सा आलू है बेहतर?

Prime Minister Narendra Modi called the potatoes produced through this technique “Jain Aloo”. 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस तकनीक से उत्पादित आलू को “जैन आलू” कहा।

ग्वालियर की इस इकाई में अभी करीब 20 किस्मों का परीक्षण चल रहा है, जिनमें लेडी रोजेटा, नीलकंठ, थार और हिमालिनी प्रमुख हैं।

“लेडी रोजेटा किस्म को लेकर हमने पढ़ा है कि इसमें शुगर और स्टार्च कम होता है, इसलिए इसे मधुमेह रोगियों के लिए बेहतर माना जाता है। हम यह भी जांच रहे हैं कि यह सच में ऐसा है या नहीं,” डॉ. तिवारी बताती हैं। नीलकंठ किस्म की बात करें तो इसकी बाहरी परत बैंगनी रंग की होती है और इसमें एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा अधिक होती है, जो इसे सामान्य आलू से ज्यादा पोषक बनाती है।

हाइड्रोपोनिक्स, एयरोपोनिक्स और एक्वापोनिक्स में फर्क क्या है?

अक्सर इन तीनों को एक ही समझ लिया जाता है, लेकिन ये अलग-अलग हैं। हाइड्रोपोनिक्स में जड़ें पोषक जल में डूबी रहती हैं। एयरोपोनिक्स में जड़ें हवा में रहती हैं और मिस्ट से पोषण मिलता है, ऑक्सीजन सबसे ज्यादा मिलती है, इसलिए यह आलू जैसी फसलों के लिए ज्यादा कारगर है। एक्वापोनिक्स में मछलीपालन और पौधों की खेती साथ-साथ होती है, मछली का अपशिष्ट पौधों को पोषण देता है और पौधे पानी को शुद्ध करते हैं। यह तकनीक पत्तेदार सब्जियों के लिए ज्यादा उपयुक्त मानी जाती है।

देशभर में ICAR, केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान और कई राज्य कृषि विश्वविद्यालय एयरोपोनिक्स पर काम कर रहे हैं। पंजाब, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में प्रदर्शन इकाइयां स्थापित की जा चुकी हैं। मध्यप्रदेश में अभी यह मुख्यतः शोध और प्रदर्शन के स्तर पर है, लेकिन किसानों में इसके प्रति जागरूकता और रुचि लगातार बढ़ रही है।

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  • Rajeev Tyagi is an independent environmental journalist in India reporting on the intersection of science, policy and public. With over five years of experience, he has covered issues at the grassroots level and how climate change alters the lives of the most vulnerable in his home country of India. He has experience in climate change reporting, and documentary filmmaking. He recently graduated with a degree in Science Journalism from Columbia Journalism School. When he is not covering climate stories, you’ll probably find Tyagi exploring cities on foot, uncovering quirky bits of history along the way.

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