पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 24 मार्च को आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम उत्पाद वितरण आदेश, 2026 जारी किया। सरकारी भाषा के बरक्स इसे सरल तरीके से समझें तो आदेश साफ़ है: अगर आपके घर के पास पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) की पाइपलाइन है, तो आपको 90 दिनों के अंदर कनेक्शन के लिए आवेदन करना होगा। आपके द्वारा इसके लिए मना करने की सूरत में घर की एलपीजी सप्लाई बंद कर दी जाएगी।
सीधे शब्दों में कहें तो अगर घर तक पीएनजी पाइप है, तो कनेक्शन लेना ही पड़ेगा वर्ना एलपीजी सिलेंडर नहीं मिलेगा।
भारत अपनी कुल एलपीजी का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है। इन आयातों का लगभग 90 प्रतिशत स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज से होकर आता है—यह ईरान और ओमान के बीच का संकरा समुद्री मार्ग है। पश्चिम एशिया में हाल के संघर्ष ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को चुनौती दी है। घर और व्यावसायिक उपयोगकर्ता अभी भी खाना पकाने के ईंधन के रूप में एलपीजी पर निर्भर हैं। ऐसे में इस आदेश के बाद सवाल यही है कि भारत में पीएनजी नेटवर्क कितना विस्तृत है और मध्य प्रदेश इसमें कहां है?

भारत में पीएनजी कितना व्यापक है?
पाइप्ड प्राकृतिक गैस घरों तक सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (सीजीडी) नेटवर्क के माध्यम से पहुंचती है। यह भूमिगत पाइपलाइनों की एक प्रणाली है जो क्षेत्रीय ट्रांसमिशन लाइनों से प्राकृतिक गैस को लगातार रसोई के बर्नर तक ले जाती है, जिससे रिफिल बुक करने की ज़रूरत खत्म हो जाती है।
हमारे शहरों तक पहुंचने से पहले यह गैस कतर, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से आयात की जाती है। आंध्र प्रदेश के कृष्णा-गोदावरी बेसिन और राजस्थान व गुजरात के गैस फील्ड से पाइपलाइनों के माध्यम से गैस शहर तक पहुंचती है और फिर घरों तक आपूर्ति की जाती है।
इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (IEEFA) लीड एनर्जी स्पेशलिस्ट पूर्वा जैन कहती हैं, “अन्य कुछ देशों के विपरीत, भारत प्राकृतिक गैस को क्रॉस-बॉर्डर पाइपलाइनों के माध्यम से आयात नहीं करता। हम इसकी बजाय द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) पर निर्भर हैं।” वह कहती हैं कि “गैस को लगभग माइनस 165 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा किया जाता है ताकि वह तरल बन जाए और टैंकरों में परिवहित की जा सके। जब यह भारत पहुंचती है, तो इसे फिर से गर्म किया जाता है, तट के साथ आयात टर्मिनलों पर पुनः गैसीकृत किया जाता है, और फिर पाइपलाइनों के माध्यम से गैस के रूप में आपूर्ति की जाती है।”

सितंबर 2025 तक, भारत के पास 1.57 करोड़ घरेलू पीएनजी कनेक्शन थे। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस विनियामक बोर्ड (PNGRB) ने 307 भौगोलिक क्षेत्रों में सीजीडी नेटवर्क को अधिकृत किया है।
मगर दिक्कत यह है कि ये कनेक्शन मुख्यतः कुछ ही राज्यों में केंद्रित हैं। महाराष्ट्र और गुजरात पीएनजी अपनाने में अग्रणी हैं, इसके बाद उत्तर प्रदेश और दिल्ली आते हैं। वहीं मध्य प्रदेश में 2025 के अंत तक लगभग 3 लाख कनेक्शन थे। हालांकि भारत ने 2032 तक 12.63 करोड़ पीएनजी कनेक्शन तक पहुंचने का लक्ष्य रख रहा है।
घर को पीएनजी कनेक्शन कैसे मिलता है?
पीएनजी आपूर्ति केवल उन स्थानों तक सीमित है जहां यह नेटवर्क मौजूद है। उपलब्धता की पुष्टि के बाद, उपभोक्ता पहचान और पते के प्रमाण के साथ ऑनलाइन या सेवा केंद्र पर आवेदन जमा करता है। कंपनी साइट निरीक्षण करती है और जहां पाइपलाइन पहले से ही बिछाई जा चुकी है, वहां 7 से 15 दिनों के भीतर कनेक्शन सक्रिय कर दिया जाता है।
मूल रूप से जबलपुर के रहने वाले हर्ष पारोचे अभी भोपाल में एक गैर सरकारी संस्था में काम करते हैं। पारोचे के किराए के मकान में पहले से ही पीएनजी कनेक्शन मौजूद था। लेकिन इसे सक्रिय करवाना उनके लिए संघर्ष का काम साबित हुआ। उन्होंने ग्राउंड रिपोर्ट को बताया, “पहले 4 दिन बहुत चुनौतीपूर्ण रहे; टैक्नीशियन कहते कि आएंगे लेकिन कभी नहीं आते।” उन्होंने आगे कहा, “पांचवें दिन जब वह आए तो इसमें ज्यादा समय नहीं लगा। उन्होंने मीटर चालू किया, ऐप इंस्टॉल किया, सब कुछ लिंक किया और गैस बिल्कुल ठीक से काम करने लगी।”

मध्य प्रदेश की स्थिति
मध्य प्रदेश के पास लगभग 1.25 करोड़ एलपीजी उपभोक्ता हैं। इसके मुकाबले पीएनजी कनेक्शन सीमित हैं। मई 2025 तक, राज्य के पास लगभग 2.94 लाख घरेलू पीएनजी कनेक्शन थे।
राज्य में पीएनजी वितरण का जिम्मा आवंतिका गैस लिमिटेड का है। यह गेल और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड का एक संयुक्त उद्यम है। कंपनी द्वारा फिलहाल इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर और पीथमपुर में सेवा दी जा रही है। इसके अलावा गेल गैस लिमिटेड देवास को कवर करती है। जबकि भोपाल, राजगढ़, रीवा और सतना का विस्तार अभी भी चल रहा है।
संकट की स्थिति में मध्य प्रदेश के खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव रश्मि अरुण शमी ने स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने औद्योगिक और व्यावसायिक इकाइयों को निर्देश दिए कि जहां पाइपलाइन का बुनियादी ढांचा उपलब्ध है वहां पीएनजी कनेक्शन लिए जाए।
पीएनजीआरबी के 30 सितंबर 2025 तक के जिला-स्तरीय आंकड़े प्रदेश में पीएनजी नेटवर्क की एक असमान तस्वीर पेश करते हैं। सतना-शहडोल ने 15,600 के टारगेट के मुकाबले 9,611 कनेक्शन देकर बेहतर काम किया है। लेकिन ज़्यादातर ज़िले अभी भी बहुत पीछे हैं। भोपाल-राजगढ़ में, 5,50,222 के टारगेट के मुकाबले सिर्फ़ 39,373 घरेलू PNG कनेक्शन मिले हैं। जबलपुर, कटनी, खंडवा, खरगोन और बुरहानपुर में लाखों के टारगेट के बावजूद ज़ीरो कनेक्शन मिले हैं, और बैतूल, छिंदवाड़ा, बालाघाट और सिवनी में कुल मिलाकर चार लाख से ज़्यादा के टारगेट के मुकाबले सिर्फ़ 154 कनेक्शन मिले हैं।

मध्य प्रदेश ने क्या किया है, और क्या बाकी है?
मध्य प्रदेश सरकार ने 14 फरवरी 2025 को सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क विकास और विस्तार नीति लागू की। इसका उद्देश्य पीएनजी के माध्यम से स्वच्छ खाना पकाने का ईंधन और सीएनजी के माध्यम से स्वच्छ परिवहन ईंधन की उपलब्धता बढ़ाना है।
2025 की पॉलिसी से पहले इसका विस्तार मुख्य रूप से पीएनजीआरबी के सेंट्रल ऑथराइज़ेशन राउंड और गेल के जॉइंट वेंचर पर निर्भर था। 2025 की राज्य पॉलिसी में पहली बार प्रदेश ने सीजीडी विस्तार को अपना डेडिकेटेड एडमिनिस्ट्रेटिव फ्रेमवर्क दिया।
मध्य प्रदेश के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, इस पॉलिसी के तहत सीजीडी नेटवर्क अब 55 जिलों को कवर करते हुए 25 ज्योग्राफिकल एरिया में फैला हुआ है। इसके मिनिमम वर्क प्रोग्राम में 59.71 लाख पीएनजी कनेक्शन का टारगेट रखा गया है। हालांकि अब तक 3.51 लाख कनेक्शन ही हासिल हुए हैं, जो छह परसेंट से थोड़ा कम है।
25 सितंबर, 2025 को, मध्य प्रदेश ने सीजीडी कंपनियों के लिए एक सिंगल विंडो पोर्टल लॉन्च किया। इससे वे एक ही जगह पर ज़िला प्रशासन से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) ले सकेंगी, जिससे महीनों की सरकारी देरी कम हो जाएगी।
बिजनेस टुडे के अनुसार, केंद्र स्तर पर सरकार ने राज्यों को कोटे का 50 प्रतिशत तक अतिरिक्त कमर्शियल एलपीजी आवंटन की पेशकश की है। इसके बदले सीजीडी की मंज़ूरी तेज़ी से दी जाएगी। इसमें सभी नए PNG परमिट 24 घंटे के अंदर प्रोसेस करना और पाइपलाइन कंपनियों के लिए सड़क ठीक करने का चार्ज माफ़ करना शामिल है।

असमान प्रगति और ‘गैप्स’
जिन शहरों में CGD नेटवर्क मैच्योर है, जैसे दिल्ली, मुंबई और अहमदाबाद के कुछ हिस्से, वहां यह प्रोसेस काफी आसान है।
हालांकि, कई इलाकों में, पाइपलाइन घरों के ठीक बाहर से गुजरती है, फिर भी घरों में कनेक्शन नहीं है। दैनिक जागरण के अनुसार, देश भर में लगभग 60 लाख घरों की यही हालत है; पाइपलाइन तो है, लेकिन लास्ट-माइल कनेक्शन कभी फॉलो नहीं किया जाता।
पूर्वा जैन ने ग्राउंड रिपोर्ट को बताया, “सबसे बड़ा कारण है किफ़ायती होना, जिसमें कनेक्शन की शुरुआती कीमत और महीने का गैस बिल दोनों शामिल हैं। जिन शहरों में नेटवर्क पूरी तरह से उपलब्ध नहीं है, वहां भी यह सीमित है कि कितने घर जुड़ सकते हैं।” “कनेक्शन की कीमत लगभग 6,500 रुपये है, जिसमें एलपीजी कनेक्शन से पीएनजी कनेक्शन में ट्रांसफर करने के लिए सभी सिक्योरिटी डिपॉज़िट और बाकी सब कुछ शामिल है।”
लेकिन पारोचे का अनुभव अलग रहा है। दिल्ली में रहते हुए पारोचे को सिलेंडर खरीदने के लिए कालाबाजारी का सहारा लेना पड़ा था। इस तरह उनको एक सिलेंडर की कीमत 1,100 से 1,200 रुपये पड़ती थी। मगर भोपाल में अब उनके पास रिचार्ज-आधारित पीएनजी सिस्टम है जो कहीं अधिक सुविधाजनक है।
उन्हें एक बड़ी सुविधा भी दिखती है जो कीमत से कहीं ज़्यादा है। “…हर जगह लोग सिलेंडर ढूंढ रहे हैं। भोपाल में वे उन्हें ₹3,000 में ब्लैक में बेच रहे हैं, लेकिन गैस (PNG) के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है। बस किचन में आपको गैस का नॉब शुरू करना है, कोई समस्या नहीं है।”

परोचे अपने गृहनगर को याद करते हुए कहते हैं, “जबलपुर का ग्वारीघाट एक बड़ा इलाका है। यह बहुत ज़रूरी इलाका माना जाता है मगर वहां अभी तक पीएनजी नहीं आया है।”
जैन कहती हैं, “एलपीजी दशकों से है। इसका डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम मज़बूत है और इसीलिए सरकार ने इसके इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी शुरू की। जबकि पीएनजी बहुत नया है। हम इसे पिछले 10 से 12 सालों से ही गंभीरता से ले रहे हैं। आज यह सिर्फ़ 10 से 15 मिलियन घरों तक ही पहुंचता है। यह अभी तक आसानी से उपलब्ध नहीं है।”
वे कहती हैं कि सरकार को कभी भी दोनों ईधनों पर एक साथ सब्सिडी देने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। “सरकार पहले से ही एलपीजी सब्सिडी पर खर्च कर रही थी। इसलिए पीएनजी के लिए ऐसा करने पर कोई ज़ोर नहीं दिया गया।”
जैन का कहना है कि पीएनजी के लिए चुपचाप प्राइस सपोर्ट मौजूद है। उन्होंने कहा, “एक तरह की इनडायरेक्ट सब्सिडी है; आप इसे असल में सब्सिडी नहीं कहेंगे, लेकिन पुराने एडमिनिस्ट्रेटेड प्राइस मैकेनिज्म के तहत एक प्राइस सीलिंग है। रूस-यूक्रेन संकट की वजह से, जब कीमतें बहुत ज़्यादा थीं, तो गैस को और सस्ता बनाने और लोगों को खाना पकाने, ट्रांसपोर्ट और इंडस्ट्री के लिए गैस-बेस्ड इस्तेमाल में मदद करने के लिए लगभग $6.50 की सीलिंग शुरू की गई थी। अगर आप दिल्ली में पीएनजी की कीमतें देखें, तो वे पिछले तीन सालों से लगभग ₹48.5 रही हैं। कोई बदलाव नहीं हुआ है।”
2026 के डिस्ट्रीब्यूशन ऑर्डर ने स्ट्रक्चरल देरी को ठीक करने की कोशिश की है। हाउसिंग सोसाइटियों को अब तीन वर्किंग डेज़ के अंदर पाइपलाइन एक्सेस की इजाज़त देनी होगी। अधिकारियों को 10 दिनों के अंदर राइट-ऑफ़-वे परमिशन क्लियर करनी होगी, और चुप्पी को मंज़ूरी माना जाएगा।
नोट – रिपोर्टिंग में शिशिर अग्रवाल ने मदद की है।
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