शाम के धुंधलके में जब धर्मजयगढ़ के जंगलों में सन्नाटा पसरने लगता है, तो वर्षों से आसपास के गांवों में रह रहे लोग कुछ और सतर्क हो जाते हैं। लेकिन जावेद के लिए यह सन्नाटा एक ‘अलर्ट’ है। बचपन से हाथियों को ट्रैक करने का उनका शौक अब उनकी पहचान बन चुका है। 40 वर्षीय जावेद जैसे ‘हाथी मित्र’ आज छत्तीसगढ़ के उन इलाकों में उम्मीद की आखिरी किरण हैं, जहां इंसान और हाथियों के बीच एक लंबा तनाव बना हुआ है।
यह कहानी सिर्फ आंकड़ों की नहीं है, यह उन पदचापों की है जो रात के अंधेरे में बस्ती की ओर बढ़ते हैं, और उन हौसलों की भी जो उन्हें वापस जंगलों की गोद में भेजने का हुनर जानती हैं।
और इसी हुनर का एक वायरल नमूना इंटरनेट के ज़रिए हम सबकी मोबाइल स्क्रीन तक भी पहुंचा – “जाओ बाबू, जंगल के अंदर जाओ… अच्छे बच्चे हो ना?” यह किसी फिल्म का सीन नहीं, बल्कि एक हकीकत है जिसे प्रकाश भगत रोज़ जीते हैं। एक तरफ पांच टन का विशालकाय हाथी और दूसरी तरफ निहत्था खड़ा एक इंसान। लेकिन प्रकाश के लिए यह कोई बहादुरी का स्टंट नहीं था, यह उस ‘रिश्ते’ की आवाज़ थी जो उनके अनुभव में है।
जंगल की विरासत और ‘हाथी मित्र’ का फर्ज
प्रकाश के पिता फॉरेस्ट रेंजर थे। उनके लिए जंगल कोई ऐसी जगह नहीं थी जहाँ कभी-कभार घूमने जाया जाए; उनके लिए जंगल उनका घर था। प्रकाश कहते हैं,
“बचपन में जब दूसरे बच्चे कहानियों में हाथियों को देखते थे, मैं उन्हें पगडंडियों पर महसूस कर रहा था। मुझे जंगल से प्यार है, और यही वजह है कि मैंने ‘हाथी मित्र’ बनना चुना।”
लेकिन प्रकाश अकेले नहीं हैं। जावेद जैसे सात-आठ साथियों की एक टोली है, जो धर्मजयगढ़ की बस्तियों और हाथियों के बीच एक ‘जीवित दीवार’ का काम करती है।
संघर्ष का भूगोल: झारखंड से धर्मजयगढ़ तक
हाथियों और छत्तीसगढ़ का यह टकराव कोई कुदरती हादसा नहीं, बल्कि एक विस्थापन की लंबी दास्तान है। 80 और 90 के दशक में झारखंड और ओडिशा के जंगलों में जब कुल्हाड़ियां चलीं और मशीनें गरजने लगीं, तो हाथियों ने अपनी पुरखौती जमीनों को छोड़ दिया। वे भोजन और शांति की तलाश में छत्तीसगढ़ आए, लेकिन यहां उनका सामना हुआ बिजली के तारों, रेल की पटरियों और अपनी फसलों के लिए जान देने को तैयार किसानों से।
वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) की मार्च 2025 की एक हालिया रिपोर्ट इस त्रासदी का कच्चा-चिट्ठा पेश करती है। पिछले 23 सालों में राज्य ने 828 ऐसी घटनाएं देखीं जिन्होंने दिल दहला दिया। इस दौरान 737 इंसानों ने अपनी जान गंवाई। लेकिन यह जंग एकतरफा नहीं है। अकेले धर्मजयगढ़ में 33 हाथियों की मौत हुई। ताज्जुब की बात यह है कि ये मौतें किसी बीमारी से नहीं, बल्कि इलेक्ट्रोक्यूशन (करंट) से हुईं। वह बिजली, जो बस्तियों को रोशन करने के लिए थी, जंगल के इन मूल निवासियों के लिए ही काल बन गई।
हाथी मित्र दल, एक सामूहिक पहल

प्रकाश और जावेद जैसे ही कुछ जुनूनी युवाओं को मिलाकर छत्तीसगढ़ सरकार ने ‘हाथी मित्र दल’ बनाया है। पहले 2012 में वोलेंटियर्स बेसिस पर चार युवाओं जावेद, अजय, आशीष और विशाल ने काम करना शुरू किया। तब इन्हें दिन के अनुसार मानदेय मिलता था। 2018 में इस प्रोग्राम को स्थाई कर दिया है। फिलहाल धर्मजयगढ़ में कुल सात हाथी मित्र हैं। इसके अलावा रायगढ़, कोरबा, जसपुर, सरगुजा, कटघोरा और महासमुंद में भी हाथी मित्र दल सक्रिय हैं।
इनका काम सुनने में जितना सीधा लगता है, हकीकत में उतना ही जोखिम भरा है। ये लोग जंगल के उन रास्तों से वाकिफ हैं जहां से हाथी गुज़रते हैं। जब भी कोई झुंड रिहायशी इलाकों की तरफ बढ़ता है, ये दल एक ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ की तरह सक्रिय हो जाता है और गांव वालों को सावधान करता है।
ये स्वयंसेवक फॉरेस्ट गार्ड्स, स्थानीय ट्रैकर्स और ग्राम प्रधानों के साथ मिलकर एक ‘रैपिड रिस्पॉन्स टीम’ की तरह काम करते हैं। इनका काम सिर्फ हाथियों को भगाना नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि इंसान और हाथी दोनों सुरक्षित रहें। लेकिन क्या यह काम उतना ही आसान है जितना वीडियो में दिखता है?
जुनून, रातें और ₹10,000 की विडंबना
धर्मजयगढ़ में सात वॉलंटियर्स की एक छोटी सी टोली है। जावेद इनमें से एक हैं। जावेद बताते हैं कि उनकी ड्यूटी घड़ी की सुइयों से नहीं, हाथियों की आहट से तय होती है। “आधिकारिक तौर पर हम दोपहर 3 बजे से फील्ड पर होते हैं, जब हाथी अपनी ओट छोड़कर बाहर निकलते हैं। लेकिन असल चुनौती तब शुरू होती है जब ग्रामीण सुबह-सुबह महुआ, तेंदू पत्ता और बारिश के दिनों में फूटु (जंगली मशरूम) बीनने जंगल जाते हैं। हमें तब भी जागना पड़ता है।”
हाथी मित्र सप्ताह के सातों दिन और लगभग 24 घंटे चौकन्ने रहते हैं। उनकी दिनचर्या का कोई निश्चित समय नहीं है। कभी-कभी वे लगातार दो रातों तक नहीं सोते। अंधेरी रात, हाथ में एक टॉर्च और झाड़ियों के पीछे से आती किसी भी सरसराहट को भांपने की शक्ति-यही उनकी पूंजी है। लेकिन इस जोखिम की कीमत क्या है? महज़ ₹10,000 का मासिक मानदेय। जावेद कहते हैं,
“अगर कोई इसे सिर्फ आजीविका (Livelihood) समझकर करेगा, तो वह एक रात भी जंगल में नहीं टिक पाएगा। यऊ हां मौत और आपके बीच बस कुछ फीट का फासला होता है। न कोई बीमा है, न ही सुरक्षा के आधुनिक उपकरण। आज भी हमने सुबह का खाना शाम 4 बजे खाया है।”
जावेद बताते हैं कि उनका काम सिर्फ़ हाथियों तक सीमित नहीं है है। “कई बार जब गांव वालों को लगता है कि हाथी उनके खेत के आसपास हो सकता है तो वे उसे दूर भगाने के लिए जंगल में आग लगा देते हैं। ऐसे में मौके पर पहुंचकर, जंगल की आग बुझाना भी हमारी ज़िम्मेदारी होती है। कई अन्य जानवरों का भी रेस्क्यु हम करते रहते हैं। चोट हो तो फर्स्ट एड देना फिर इलाज के लिए आगे भेजना हमारा काम है और अब तक लगभग एक हज़ार सांपों का भी रेस्क्यू मैं कर चुका हूं।’’ यह कहते हुए उनकी आवाज़ गर्व से भारी हो जाती है।
जावेद और प्रकाश जैसे लोगों का जुनून नीति बनाने में सहायक तो है, लेकिन नीतियों को सिर्फ ‘अलर्ट’ देने तक नहीं, बल्कि ‘सह-अस्तित्व’ (को – एग्जिस्टेंस) की ज़मीन तैयार करने तक जाना होगा।
तकनीक बनाम तजुर्बा

धर्मजयगढ़ के जॉइंट डीएफओ बालगोविंद साहू बताते हैं कि ट्रैकिंग की प्रक्रिया काफी जटिल है। पैरों के निशान, हाथी की लीद की गंध और टूटी हुई टहनियां हमें झुंड तक ले जाती हैं। सरकारी तंत्र ने ‘गज संकेत’ जैसा ऐप बनाया है, लेकिन ज़मीन पर काम करने वाले इसे ‘अधूरा’ मानते हैं। एक स्वयंसेवक ने दबी ज़बान में कहा, “ऐप हमें 10-20 किलोमीटर का घेरा तो बता देता है, लेकिन हाथी किस झाड़ी के पीछे खड़ा है, यह तो हमारी आँखें और कान ही बताते हैं।”
जब हाथी मक्का या तरबूज के खेतों की ओर बढ़ते हैं, तो तनाव चरम पर होता है। किसान अपनी साल भर की कमाई को उजड़ते नहीं देख सकता। ऐसे में हाथी मित्र अक्सर हाथियों और नाराज ग्रामीणों के बीच एक ‘सैंडविच’ बन जाते हैं।
समाधान की तलाश: NGOs और विशेषज्ञ
इस बिखराव को जोड़ने के लिए कुछ संस्थाओं ने हाथ आगे बढ़ाए हैं। Wildlife SOS ने 2017 से महासमुंद और बलौदाबाजार जैसे इलाकों में ‘रेडियो-कॉलरिंग’ और वॉलंटियर्स की ट्रेनिंग पर काम किया है। वहीं, हाथी बचाओ संघर्ष समिति (सजल मधु) जैसी टीमें तकनीक और मुआवजे के बीच की कड़ी बनी हुई हैं। लेकिन समस्या यह है कि फंडिंग की कमी और सीमित दायरा इन कोशिशों को एक मुकम्मल समाधान नहीं बनने देता।

वहीं, हाथी और इंसान के इस पेचीदा मसले पर Conservation Core Society की फाउंडर मीतू गुप्ता एक बेहद ज़रूरी पहलू सामने रखती हैं। वे कहती हैं:
“वन्यजीव और स्थानीय लोग एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अगर हम इसका पक्का हल चाहते हैं, तो हमें यह मानना होगा कि दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं। हाथी, तेंदुए और भालू जैसे जानवरों के साथ होने वाले संघर्ष को रोकने के लिए सबको मिलकर काम करना होगा। इसमें प्रकृति को बचाने के साथ-साथ लोगों की आजीविका और सुरक्षा का भी ध्यान रखना ज़रूरी है, ताकि इंसान और जानवर साथ-साथ रह सकें।”
मीतू गुप्ता एक बड़ी चुनौती की ओर इशारा करती हैं-तकनीकी क्षमता। उनका मानना है कि हाथी मित्रों को सिर्फ ‘चौकीदार’ बनाकर नहीं रखा जा सकता। उन्हें वन्यजीव व्यवहार (Animal Behavior) और वैज्ञानिक डेटा कलेक्शन की पेशेवर ट्रेनिंग देनी होगी। जब वे वैज्ञानिक डेटा इकट्ठा करेंगे, तभी हम भविष्य के लिए एक ऐसी नीति बना पाएंगे जो सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि जंगलों में भी असर दिखाएगी।
सारांश: एक अनकहा समझौता
धर्मजयगढ़ की कहानी सिर्फ ‘कॉन्फ्लिक्ट’ की कहानी नहीं है, यह उस ‘Coexistence’ (सह-अस्तित्व) की तलाश है जो वक्त के साथ धुंधली पड़ गई है। हाथी मित्र दल के ये सात-आठ लोग सिर्फ हाथियों को नहीं हांक रहे, बल्कि वे उस भरोसे को हांक रहे हैं जो इंसान और प्रकृति के बीच टूट चुका है।
उनकी फटी हुई चप्पलें, रात की ड्यूटी के बाद सूजी हुई आंखें और ₹10,000 का मेहनत से कम मानदेय-यह सब उस महान संघर्ष का हिस्सा है जो हर रात धर्मजयगढ़ के जंगलों में लड़ा जाता है।
धर्मजयगढ़ की गलियों में आज भी जब रात के 2 बजे किसी वॉट्सऐप ग्रुप पर मैसेज फ्लैश होता है, तो पूरा गांव चैन की नींद सो जाता है, क्योंकि वे जानते हैं कि कहीं अंधेरे में जावेद और प्रकाश की टॉर्च की रोशनी हाथियों को सही रास्ता दिखा रही होगी। यह समर्पण ही छत्तीसगढ़ के इन ‘अनसीन हीरोज’ की असली ताकत है।
नीति निर्माताओं को समझना होगा कि ये ‘मित्र’ सिर्फ कर्मचारी नहीं, बल्कि उस जंगल की ‘आत्मा’ हैं जिसे हर तरह से सशक्त बनाना आज सबसे बड़ी ज़रूरत है।
जब तक हम इन मित्रों को सम्मान, सुरक्षा और सही तकनीक नहीं देंगे, तब तक ‘अच्छे बच्चे’ कहे जाने वाले ये गजराज और उन्हें पुकारने वाले ये रक्षक, दोनों ही इस व्यवस्था के संघर्ष से इसी तरह जूझते रहेंगे।
यह स्टोरी मूल रुप से Indiaspend.com पर प्रकाशित हो चुकी है। ग्राउंड रिपोर्ट पर यह पुनर्प्रकाशित की जा रही है। शिवांक साहू द्वारा इसका हिंदी अनुवाद किया गया है।
यह रिपोर्ट Climate Narrative Hub की पहल का हिस्सा है, जिसे The Migration Story के सहयोग से तैयार किया गया है।
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