धार जिले के खेड़ली गांव में 19 फरवरी की सुबह ज़मीन पर ड्रिलिंग करने वाली कुछ मशीनों के साथ कुछ लोग और भारी मात्रा में पुलिस बल मौजूद था। यह इलाका धार की एक चूना पत्थर खदान ब्लॉक का हिस्सा है। पुलिस सुरक्षा में यहां इसी खदान के लिए सैम्पलिंग की जानी थी। मगर स्थानीय ग्रामीणों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। विवाद इतना बढ़ा कि लोगों ने पुलिस और प्रशासन की गाड़ियों में पथराव करना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में सैंकड़ों लोग पथराव करते और पुलिस के लोग इससे बचकर वापस जाते हुए दिख रहे हैं।
पथराव में कई सरकारी वाहन क्षतिग्रस्त हुए और अधिकारियों को सर्वे अधूरा छोड़कर लौटना पड़ा। ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना उनकी खेती, भूजल और आदिवासी भूमि अधिकारों को खतरे में डालती है। मगर सवाल यह है कि क्या यह विवाद अचानक हुआ? या फिर यह महीनों से चल रहे घटनाक्रम का हिस्सा था। हमने स्थानीय लोगों से बात कर और सरकारी दस्तावेज़ों से गुज़रते हुए इसी सवाल का जवाब जानने की कोशिश की।
विवाद का केंद्र चूना खदान
कुक्षी सरपंच संघ के अध्यक्ष विजय रावत ग्राउंड रिपोर्ट से बात करते हुए बताते हैं खेड़ली गांव 2 चूना खदान ब्लॉक के बीच स्थित है। कंपनी को ईस्ट ऑफ़ डावरी ब्लॉक में मार्च 2024 और बामनबर्डी लाइमस्टोन ब्लॉक में मार्च 2025 से तीन साल के लिए खनन चूना खदान की अनुमति राजस्थान की श्री सीमेंट्स लिमिटेड को दी गई।
दोनों ब्लॉक के अंतर्गत क्रमशः 815 और 913.39 हैक्टेयर क्षेत्र आते हैं। जहां बामनबर्डी ब्लॉक के तहत बामनबर्डी गांव आता है वहीं डाबरी ब्लॉक में टकारी, तलावड़ी और घोड़ा गांव शामिल हैं। दोनों ही ब्लॉक धार ज़िले की कुक्षी तहसील के अंतर्गत आते हैं, विवाद की जगह खेड़ली बामनबर्डी से लगभग 7 किमी दूर है।
मगर रावत कहते हैं कि चूंकि उनका क्षेत्र अनुसूचित आदिवासी क्षेत्र और प्रदेश में पेसा एक्ट (Panchayats Extension to Scheduled Areas) लागू है।अनुसूचित क्षेत्र की भूमि से जुड़े मामलों के जानकार सत्यम श्रीवास्तव बताते हैं,
“चूना खदान चूंकि माइनर मिनरल्स में आता है इसलिए इसके खनन के लिए अनुमति की प्रक्रिया कोयले जितनी जटिल नहीं होती। अधिसूचित क्षेत्र होने के चलते इस स्थान में किसी भी तरह के खनन की नीलामी से पहले ग्रामसभा की अनुमति अनिवार्य होती है।”
उन्होंने प्रक्रिया समझाते हुए बताया कि ग्राम सभा से अनुमति के बाद नीलामी होती है फिर एरिया नोटिफाई किया जाता है। इसके बाद लोगों को नोटिस देते हुए उनकी भूमि अधिग्रहण के संबंध में बताया जाता है।
हालांकि स्थानीय लोगों को अब तक किसी भी तरह के विस्थापन का नोटिस नहीं मिला है। न ही कोई सरकारी कागज़ सरपंचों को मिला है जिसमें प्रोजेक्ट में शामिल सरकारी और निजी भूमि का ज़िक्र हो। मगर “जमीन बचाओ महाआंदोलन” नाम के साथ संगठित हुए इन लोगों का नेतृत्व करने वाले रविराज बघेल कहते हैं,
“जहां यह खनन होना है वहां सरकारी ज़मीन से लगी हुई निजी ज़मीनें हैं। हमें पता चला है कि यहां 300 जगह ड्रिलिंग होनी है। वह किस-किस जगह पर होगी यह भी प्रशासन नहीं बता रहा है और गुमराह कर रहा है।”
तलावड़ी गांव के निरपाल को भी अब तक विस्थापन या परियोजना से संबंधित कोई भी सरकारी नोटिस नहीं मिला है। वो कहते हैं कि लगातार पुलिस और प्रशासन के दखल और स्पष्ट जवाब न मिलने के कारण ग्रामीणों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है।
विस्थापन के सवाल को लेकर जब रिपोर्टर ने कुक्षी एसडीएम से संपर्क करने की कोशिश की तो उनका फोन बंद आ रहा था। हमने उनको अपने सवाल टेक्ट्स मैसेज के माध्यम से भेज दिए हैं, जवाब मिलने पर खबर अपडेट की जाएगी।
विरोध की शुरुआत

धार पुलिस अधीक्षक द्वारा 13 नवंबर 2025 को लिखे पत्र के अनुसार स्थानीय विरोध और धरना प्रदर्शन के कारण खदान के पूर्वेक्षण का कार्य पूरा नहीं हो पा रहा था। इसी के चलते एसपी द्वारा अनुविभागीय अधिकारी (SDO) को समुचित सुरक्षा सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया था। बाद में एसडीओ द्वारा कुक्षी थाना प्रभारी को 22 दिसंबर 2025 को होने वाले अन्वेषण कार्य के दौरान पुलिस सुरक्षा प्रदान करने का आदेश दिया गया।
बघेल बताते हैं कि 22 दिसंबर को जब कंपनी के लोग ड्रिलिंग का काम करने पहुंचे थे तो लोगों ने उसका भी विरोध किया था, जिसके बाद वो लोग शांतिपूर्वक लौट गए थे। अगले ही दिन कुक्षी में इस प्रोजेक्ट के खिलाफ एक रैली का आयोजन किया गया। बघेल दावा करते हैं कि इस रैली में लगभग 5000 लोगों ने शिरकत की थी। इस दौरान मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार ने भी सभा को संबोधित किया।
बघेल ने बताया कि रैली के बाद धार कलेक्टर प्रियंक मिश्रा खुद बाघ क्षेत्र के मोगरा गांव आए थे। “उन्होंने हम लोगों को आश्वासन दिया था कि स्थानीय लोगों, ग्रामसभा और जनप्रतिनिधियों की मंज़ूरी के बिना खनन कार्य नहीं किया जाएगा।”
फिर हिंसक हुआ प्रदर्शन
23 दिसंबर को हुई रैली के दौरान ही स्थानीय लोगों द्वारा स्थानीय कलेक्टर को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, केन्द्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री के नाम का ज्ञापन भी सौंपा गया। इसमें धार जिले में स्वीकृत चूना पत्थर और ग्रेफाईट की खदानों के लिए किए जा रहे सर्वे को लेकर चिंता जताई गई। ज्ञापन में इन खनन स्वीकृतियों को निरस्त करने की मांग रखी गई।
रावत कहते हैं, “हमने जो ज्ञापन दिया था उसका क्या हुआ हमें पता ही नहीं चला। हम शांति से बात करके मामले का हल निकालने की कोशिश कर रहे थे”।
रावत कहते हैं कि 19 फरवरी को भारी मात्रा में पुलिस के साथ जब सर्वे किया जा रहा था तब भी ग्रामीणों ने विरोध करते हुए पहले बात करने के लिए कहा। बकौल रावत,
“पुलिस ने हमसे बात करने के बजाए ज़ोर ज़बरदस्ती करना शुरू कर दिया जिससे लोग भड़क गए”।
वहीं बघेल हिंसा को गलत बताते हैं। घटना के अगले दिन उन्होंने स्थानीय लोगों से बात कर कानून हाथ में न लेने की अपील की। वह कहते हैं कि अगर प्रशासन उनकी मांग नहीं मानता है तो वह कोर्ट में इसके खिलाफ अपील करेंगे।
वहीं मामले पर सरकारी पक्ष जानने के लिए हमने जिले के अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की। जिला जनसंपर्क अधिकारी से इस बारे में सवाल करने पर उन्होंने हमें स्थानीय अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व (SDM) द्वारा जारी बयान भेजा। बयान में एसडीएम प्रमोद गुर्जर ने बताया कि घटना के दौरान ग्रामीणों को समझाइश दी गई कि वे अपनी आपत्तियां लिखित रूप में प्रस्तुत करें। गुर्जर के अनुसार आपत्तियों का निराकरण सक्षम स्तर पर नियमानुसार किया जाएगा।
उन्होंने किसी भी तरह की जनहानि से इनकार करते हुए कहा कि मौके पर शांति व्यवस्था सुनिश्चित कर दी गई है।
इस मामले को लेकर आगामी रविवार, 22 फरवरी को कुक्षी सरपंच संघ द्वारा एक बैठक का आयोजन किया गया है जिसमें सरपंच, पटेल और अन्य जनप्रतिनिधि सहित सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होंगे। इन घटना क्रम से गुज़रते हुए एक बात स्पष्ट होती है कि 19 फरवरी को हुआ विवाद अचानक नहीं उपजा। हालांकि इसके कुछ तात्कालिक कारण हो सकते हैं मगर यह उस घटनाक्रम का हिस्सा था जो 2 महीने से भी अधिक समय से जारी था।
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