राजगढ़ जिले के खाजला गांव के किसान श्रीलाल सौंधिया आज उन चुनिंदा किसानों में गिने जाते हैं, जिन्होंने खेती को परंपरा की सीमाओं से आगे ले जाकर मुनाफे का स्मार्ट मॉडल बना दिया है। श्रीलाल का मानना है कि पारंपरिक खेती, गेहूं, चना, सोयाबीन में आमदनी सीमित रहती है। हर दो से चार साल में प्राकृतिक आपदाएं फसल को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे किसान की आर्थिक स्थिति और भी कमजोर हो जाती है। इसी को देखते हुए उन्होंने कृषि विभाग से लगातार संपर्क कर मार्गदर्शन लिया और ड्रिप इरिगेशन के माध्यम से उन्होंने उद्यानिकी खेती की ओर कदम बढ़ाया।
तकनीक और अनुभव के बेहतरीन तालमेल से उन्होंने न केवल अपनी आमदनी बढ़ाई, बल्कि गांव के अन्य लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी तैयार किए हैं। उनकी इसी सोच और मेहनत को देखते हुए हाल ही में गणतंत्र दिवस के अवसर पर जिला प्रशासन ने उन्हें सम्मानित किया। इसके अलावा, 30 जनवरी को भोपाल में आयोजित प्रदेश स्तरीय कार्यक्रम में भी उन्हें प्रशंसा पत्र देकर नवाजा गया।
कितनी लागत, कितना मुनाफा?

ग्राउंड रिपोर्ट से बातचीत में श्रीलाल बताते हैं कि उनके पास करीब 30 बीघा जमीन है। पहले वे भी अन्य किसानों की तरह पारंपरिक खेती करते थे, लेकिन उनके मन में हमेशा यह विश्वास रहा कि खेती को लाभ का धंधा बनाया जा सकता है। इसी सोच ने उन्हें कुछ नया और अलग करने की प्रेरणा दी। वे बताते हैं कि जब भी मोबाइल हाथ में लेते हैं, तो उनका ध्यान इस एक सवाल पर टिका रहता है कि खेती को और अधिक लाभदायक कैसे बनाया जाए। नई तकनीक, नई फसलें और आधुनिक तरीके, यही उनकी खोज का केंद्र रहे हैं।
उनके मन में पहले से ही कुछ अलग करने की चाह थी, ऐसा कुछ, जिससे आमदनी के साथ-साथ बचत भी हो। उद्यानिकी विभाग से संपर्क करने पर उन्हें पपीता, केला और स्ट्रॉबेरी जैसे फल उगाने की सलाह दी गई। उन्होंने ड्रिप इरिगेशन से सिंचाई शुरू की और 10 हजार स्ट्रॉबेरी के पौधे लगाए। करीब दो लाख रुपए की लागत से शुरू हुई इस खेती ने पहले ही साल चार लाख रुपए की आमदनी देकर उन्हें एक नई दिशा दिखा दी।
आज श्रीलाल ढाई एकड़ जमीन पर करीब 50 हजार स्ट्रॉबेरी पौधों की खेती कर रहे हैं। पौधे, ड्रिप और मल्चिंग सहित कुल लागत करीब सात लाख रुपए आई है। फिलहाल उन्हें प्रतिदिन लगभग 15 हजार रुपए की बिक्री हो रही है, जो आगे बढ़कर 30 हजार रुपए प्रतिदिन तक पहुंचने की संभावना है। यह सिलसिला अप्रैल के पहले सप्ताह तक जारी रहेगा।
फसल उगाने से लेकर बेचने तक

श्रीलाल सिर्फ खेती तक सीमित नहीं हैं, अपने उत्पाद की मार्केटिंग भी वे खुद संभालते हैं। जहां बेहतर दाम मिलते हैं, वहीं माल भेजते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि जब तक किसान खुद अपने उत्पाद की बिक्री में सक्रिय नहीं होगा, तब तक मुनाफा सीमित ही रहेगा। स्ट्रॉबेरी का सीजन समाप्त होने के बाद वे स्वीट कॉर्न की खेती करते हैं, जिसकी बाजार में 20 से 22 रुपए प्रति किलो कीमत मिलती है। अब वे ब्लूबेरी की खेती का भी परीक्षण करने की योजना बना रहे हैं। यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो वे बड़े स्तर पर इसकी खेती शुरू करेंगे।
पारंपरिक खेती से उन्होंने पूरी तरह नाता नहीं तोड़ा है। करीब तीन हेक्टेयर जमीन पर वे गेहूं की फसल भी लेते हैं, लेकिन आधुनिक तकनीक के साथ। खेत में मिनी स्प्रिंकलर सिस्टम लगा है, जिससे सिंचाई सहज हो गई है और रात में उठकर पानी देने की जरूरत नहीं पड़ती। खाद और पानी का उपयोग भी वे वैज्ञानिक सलाह और अपने अनुभव के आधार पर करते हैं, ताकि लागत कम रहे और संसाधनों की बर्बादी न हो।
अगली पीढ़ी के भविष्य का ध्यान
दसवीं तक पढ़े श्रीलाल अपने उस बेटे को, जिसने कृषि की पढ़ाई की है, इस क्षेत्र में आगे बढ़ाना चाहते हैं। उनका मानना है कि जब पढ़ा-लिखा युवा खेती से जुड़ेगा, तभी कृषि का भविष्य वास्तव में मजबूत होगा और किसान आत्मनिर्भर बन सकेगा।
आज श्रीलाल अपने खेत में 10 लोगों को रोजगार दे रहे हैं और अन्य किसानों को भी नई तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इसका असर भी साफ दिखने लगा है, पिछले वर्ष जिले में जहां केवल 15 हजार स्ट्रॉबेरी पौधे आए थे, वहीं इस वर्ष यह संख्या 90 हजार तक पहुंच गई है। अब कई किसान उद्यानिकी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं और अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।
कृषि विभाग के उपसंचालक सचिन कुमार जैन बताते हैं कि
“शासन द्वारा ड्रिप सिंचाई और मिट्टी परीक्षण पर अनुदान दिया जाता है, जिससे किसानों का आर्थिक बोझ कम होता है। साथ ही, समय-समय पर फसल का निरीक्षण और मार्गदर्शन भी किया जाता है, ताकि किसानों को किसी प्रकार की कठिनाई न हो।”
मोबाइल की स्क्रीन से अर्जित ज्ञान को खेत की मिट्टी में उतारकर श्रीलाल ने साबित कर दिया है कि तकनीक और तजुर्बे का सही मेल हो, तो खेती केवल गुजारे का साधन नहीं, बल्कि सफलता और समृद्धि की मजबूत राह बन सकती है।
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