हाल के वर्षों में भोपाल के पास स्थित छोटा सा शहर सीहोर बदलता हुआ दिखाई देता है। स्थानीय लोग इस बदलाव का श्रेय मध्य प्रदेश के सीहोर के पास तेजी से विकसित हो रहे एक धार्मिक स्थल कुबेरेश्वर धाम को देते हैं, जो कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा से जुड़ा है।
हर साल फरवरी में महाशिवरात्रि के दौरान लाखों श्रद्धालु कुबेरेश्वर धाम पहुंचते हैं। पिछले कुछ वर्षों में यह धाम एक प्रमुख धार्मिक स्थल के रूप में उभरा है, खासकर रुद्राक्ष महोत्सव और महाशिवरात्रि जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान, जहां मध्य भारत के कई राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
कुछ साल पहले जब ग्राउंड रिपोर्ट की टीम यहां पहुंची थी, तब यह जगह काफी छोटी और सीमित थी — लाखों की भीड़ संभालने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी, हालात अव्यवस्थित थे। राज्य राजमार्ग पर ट्रक और ट्रॉलियां खड़ी रहती थीं, जबकि कई लोग सड़क किनारे बैठकर सामान्य कीमत से लगभग चार गुना दाम पर पानी की बोतलें खरीदते दिखे थे।
श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के साथ एक और चिंता भी बढ़ी है — कचरे का बढ़ता दबाव और उसका प्रबंधन। दैनिक भास्कर सहित कई मीडिया रिपोर्टों में स्थानीय अनुमान के आधार पर बताया गया है कि बड़े आयोजनों के दौरान आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या हर साल बढ़ती गई है, जो 2026 में लगभग 2 से 3 लाख तक पहुंच गई।
इस वर्ष धाम में भोजन वितरण, बड़े स्तर पर धार्मिक आयोजन, और पीने के पानी तथा एम्बुलेंस जैसी मुफ्त या सस्ती सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। हालांकि इतने बड़े आयोजन के साथ कचरे की मात्रा भी बढ़ती है, खासकर सिंगल-यूज़ प्लास्टिक बोतलों और खाद्य पैकेजिंग के रूप में।
पिछले वर्षों की तुलना में इस बार मंदिर समिति और स्थानीय प्रशासन द्वारा सफाई और कचरा प्रबंधन में सुधार के प्रयास साफ दिखाई देते हैं। हालांकि, ग्राउंड रिपोर्ट की टीम द्वारा किए गए अवलोकन और श्रद्धालुओं व कामगारों से बातचीत से पता चलता है कि इतनी बड़ी भीड़ के बीच व्यवस्था लागू करने में अभी भी चुनौतियां बनी हुई हैं।

इस वर्ष दिखे बदलाव
“पिछली बार की तुलना में इस बार व्यवस्था बेहतर लग रही है। साफ-सफाई भी दिख रही है,” महाशिवरात्रि पर तीसरी बार आए एक श्रद्धालु ने कहा। उन्होंने बताया कि कई जगह डस्टबिन लगाए गए हैं और दिनभर सफाई कर्मचारी काम करते दिखाई देते हैं।
साइट पर कार्यरत सफाईकर्मी अंकित वाल्मीकि ने बताया कि आयोजन के दौरान टीमें लंबे समय तक काम कर रही हैं। उनके अनुसार कर्मचारी सुबह जल्दी काम शुरू करते हैं और देर शाम तक कचरे को संभालने में लगे रहते हैं।
उन्होंने बताया कि इस बार एक निर्धारित कलेक्शन पॉइंट बनाया गया है, जहां पूरे परिसर से कचरा लाकर जमा किया जाता है और फिर उसे आगे निस्तारण के लिए भेजा जाता है। पहले के वर्षों में कचरे को सीधे बाहर ले जाना पड़ता था, जिससे भीड़ के समय प्रबंधन मुश्किल हो जाता था।
कचरा प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाल रही समिति ने सीहोर नगर पालिका के साथ मिलकर सात दिनों के लिए स्थानीय कचरा बीनने वालों को भी लगाया है, जो कचरे की छंटाई कर रहे हैं। एक कचरा संग्राहक ने बताया कि प्लास्टिक की बोतलें सबसे अधिक मात्रा में निकलती हैं, लेकिन हल्के प्लास्टिक की आर्थिक कीमत कम होने के कारण इतनी मात्रा होने के बावजूद इसका संग्रहण लाभकारी नहीं होता।

नागरिक जिम्मेदारी की कमी
“डस्टबिन तो हैं, लेकिन लोग फिर भी बाहर कचरा फेंक देते हैं। अगर लोग सहयोग नहीं करेंगे तो आयोजक क्या कर सकते हैं?” चौथी बार आए एक श्रद्धालु ने कहा।
डस्टबिन होने के बावजूद कई जगह कचरा जमा होता दिखा। श्रद्धालुओं ने भी माना कि सार्वजनिक व्यवहार एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। टीम ने यह भी देखा कि परिसर में गुटखा सेवन व्यापक रूप से हो रहा था, जहां कई लोग दीवारों और कचरे के पास थूकते दिखे।
हालांकि शौचालयों की संख्या 50 से बढ़ाकर 200 कर दी गई है, फिर भी कुछ लोग खुले में शौच करते दिखाई दिए।
एक दुकानदार ने बताया कि कई दुकानदार कचरा इकट्ठा कर पास के खेतों में जला देते हैं। इससे लंबे समय में पर्यावरण पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय लोगों और कामगारों का कहना है कि ऐसे आयोजनों के बाद बचा प्लास्टिक कचरा आसपास के खेतों में पहुंच जाता है, जिससे मिट्टी प्रदूषण और माइक्रोप्लास्टिक की समस्या बढ़ सकती है — जो अब पर्यावरणीय रिपोर्टिंग में बढ़ती चिंता का विषय बन रही है।

आगे की राह
पर्यवेक्षकों का मानना है कि धार्मिक नेताओं की भूमिका भी लोगों के व्यवहार में बदलाव ला सकती है। एक श्रद्धालु ने कहा, “अगर मंच से घोषणा कर दी जाए कि कचरा सही जगह डालें, तो लोग जरूर मानेंगे।”
जैसे-जैसे धार्मिक पर्यटन बढ़ रहा है, विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बड़े आयोजनों के लिए शहरी त्योहारों की तरह पर्यावरणीय योजना जरूरी होगी, जिसमें अनिवार्य कचरा ऑडिट, स्थल पर ही कचरे की छंटाई की व्यवस्था और मंदिर समितियों व नगर निकायों के बीच बेहतर समन्वय शामिल हो।
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