Read in English | नागपुर के वाघोली गांव में, पेंच टाइगर रिज़र्व के सिल्लारी गेट से 3.7 किमी दूर, रविंद्र उवासराव उइके तार से अपने खेत की बाड़ाबंदी कर रहे हैं। एक सोलर पैनल से जुड़ने के बाद जल्द इस तार में 12 वोल्ट डीसी करंट सप्लाय होने लगेगा। वे हर साल अपनी 13.07 एकड़ ज़मीन को जंगली जानवरों से बचाने के लिए यह बंदोबस्त करते हैं। 700 से 800 रुपए खर्च करने के बाद एक हफ्ते में ही उनका खेत सोलर फेंसिंग से सुरक्षित हो जाएगा।

उइके 2023 से सोलर फेंस का उपयोग कर रहे हैं। इससे पहले वे “मांडा” (मचान) बनाते थे—बांस और लकड़ी से बनी एक ऊंची झोपड़ी—और रातभर खेत की रखवाली करते थे। स्थानीय लोग इसे “जागली करना” कहते हैं। दिसंबर 2022 में ऐसी ही एक रात की रखवाली के दौरान, सुबह 7 बजे, उनके खेत में एक बाघ जंगली सूअर को खा रहा था। उनकी भाभी ने शोर मचाया और उन्होंने देखा कि बाघ महज़ 150 मीटर दूर बैठा है। इस घटना के बाद उन्होंने रात की रखवाली बंद कर दी और 2023 से सोलर फेंसिंग अपनाई।
ऐसी घटनाएं डर पैदा करती हैं और खासकर रात में खेत की चौकीदारी के लिए व्यक्ति ढूंढना मुश्किल हो जाता है। दूसरी ओर, मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के सिवान कन्हार गांव के जितेंद्र दाहरवाल, खेती करने के लिए अपनी निजी नौकरी छोड़कर शहर से गांव आए थे। लेकिन जंगली जानवरों के डर से मज़दूर न मिलने और खेती में होने वाले घाटे के कारणों से वे अपनी 30 एकड़ ज़मीन बेचने का मन बना रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्ट ने उनकी कहानी विस्तार से प्रकाशित की है।
लोकेटर मैप

मध्य भारत के पेंच टाइगर रिज़र्व में 125 बाघ हैं—मध्य प्रदेश में 77 और महाराष्ट्र में 48। सोलर फेंस सीधे तौर पर बाघों से सुरक्षा नहीं करती, सिद्धांततः ये खेतों में जंगली सूअर (Sus scrofa), चीतल (Axis axis), सांभर (Rusa unicolor) और नीलगाय (Boselaphus tragocamelus) को घुसने से रोकती है।
ओमप्रकाश शासंकर (69) मध्य प्रदेश में पेंच टाइगर रिज़र्व के तुरिया गेट के पास खंडासा गांव में 18 एकड़ में धान की खेती करते हैं। 11 सितंबर को जंगली सूअरों के एक छोटे झुंड ने उनके घर के परिसर में लगी मक्का की फसल नष्ट कर दी। इससे पहले 2018 में, कटाई से ठीक पहले, उनकी 3 एकड़ में लगी सुगंधित धान (बासमती किस्म) की फसल रातों-रात जंगली सूअरों ने खा ली थी।
जंगली जानवरों द्वारा तबाह की गई फसल के एवज़ में उन्हें महज़ 13,000 रुपए मुआवज़ा मिला, जबकि उन्होंने फसल की बोवनी में 30,000 रुपए का निवेश किया था। जंगली जानवर उनकी फसलों को नियमित रूप से नुकसान पहुंचाते रहे हैं। वो कहते हैं “रबी में मैं गेहूं उगाता हूं। चीतल, सांभर और नीलगाय इसे नष्ट कर देते हैं,”।
उइके का अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा, जब ‘रंदुक्कर’ (जंगली सूअर का स्थानीय नाम) ने उनकी कटाई के लिए तैयार फसल खा ली। “बुवाई के एक से सवा महीने बाद ही चीतल और नीलगाय छोटे पौधे खा जाते हैं,” उन्होंने कहा।

छोटे किसानों के लिए यह नुकसान उनकी सालाना आय का बड़ा हिस्सा हो सकता है। उदाहरण के लिए, 55 वर्षीय (गोंड जनजाति) किसान शाहदेव टेकाम सिर्फ एक एकड़ में खेती करते हैं। इस साल मई में उन्होंने मूंग की फसल बोई और 10,000 रुपये खर्च किए। लेकिन जून में रंदुक्कर ने पूरी फसल खा ली। उनकी सालाना आय 60,000–70,000 रुपये है—ऐसे में यह बहुत बड़ा नुकसान है। गुस्से में उन्होंने कहा,
“आप पैसे लगाते हो, बीज बोते हो, दिन-रात रखवाली करते हो, और पांच मिनट में सब बर्बाद हो जाता है—आप खुद सोचिए, कैसा लगेगा? मुझे बताने की ज़रूरत क्या है?”
RTI के आंकड़ों के मुताबिक, 2020 से 2024 के बीच मध्य प्रदेश में वन्यजीव हमलों में 406 लोगों की मौत, 5,804 घायल और 72,000 से अधिक जानवरों की मौत हुई। महाराष्ट्र में 2019 से 2023 के बीच केवल बाघों के हमलों में 200 लोगों की जान गई। लेकिन फसल नुकसान का कोई केंद्रीय या राज्य-स्तरीय आंकड़ा मौजूद नहीं है। हालांकि सौर-चालित बाड़, सौर डिटरेंट और यहां तक कि सोलर पंप जैसे समाधान मौजूद हैं, जिन्हें मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ किसान अपना रहे हैं।

बार-बार नुकसान के बाद किसान नाराज़ हो जाते हैं। ‘झटका मशीन’ जैसे स्थानीय समाधान भी हैं, जो सोलर से नहीं चलते और जिनमें ज्यादा करंट होता है। लेकिन ये बाड़ें जानवरों के साथ-साथ इंसानों के लिए भी जानलेवा साबित होती हैं। 24 जुलाई को मध्य प्रदेश के पेंच इलाके में मनोज पांडे (35) और अशोक भलावी (36) ऐसे ही बिजली के तारों से करंट लगने से मारे गए।
दिल्ली स्थित NGO वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया (WPSI) की अक्टूबर 2020 की रिपोर्ट के अनुसार, 2010 से 2020 के बीच जानबूझकर या दुर्घटनावश करंट लगने से लगभग 1,300 जंगली जानवरों की मौत हुई। इसमें 500 हाथी, 220 फ्लेमिंगो, 150 तेंदुए और 46 बाघ शामिल हैं। महाराष्ट्र में 74 जंगली जानवर मारे गए, जिनमें 18 तेंदुए और 16 बाघ थे। इस साल अगस्त में मध्य प्रदेश के संजय टाइगर रिज़र्व में बाघ ‘टी-43’ की मौत खेत में लगे बिजली के तारों के संपर्क में आने से हो गई।
इसी वजह से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जन-वन विकास योजना के तहत सोलर फेंस वितरित किए गए, ऐसा सतपुड़ा फाउंडेशन के उप निदेशक मंडल पिंगले ने बताया।

फसलों की सुरक्षा के लिए सोलर फेंसिंग
महाराष्ट्र सरकार ने जुलाई 2015 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जन-वन विकास योजना शुरू की। इसके तहत संरक्षित वन क्षेत्रों से सटे गांवों के किसानों को सोलर फेंस दिए गए। सरकार लागत का 75% (15,000 रुपये) वहन करती है और किसान 25% (5,000 रुपये) देते हैं। मार्च 2023 में सरकार ने 33,000 लोगों को सोलर फेंस देने के लिए 50 करोड़ रुपये खर्च करने की घोषणा की।
उइके को इसी योजना के तहत सोलर फेंस मिला, जिसमें 3 kV से 9 kV डीसी वाला फेंस एनर्जाइज़र, 40 वॉट का 12-वोल्ट सोलर पैनल, 12-वोल्ट सील्ड मेंटेनेंस-फ्री बैटरी, 20 फीट कनेक्टिंग वायर और 10 किलोग्राम 1.5 मिमी GI तार शामिल थे।
महाराष्ट्र में अब तक 10,000 से अधिक किसानों को यह सुविधा मिली है। मध्य प्रदेश के पेंच टाइगर रिज़र्व में उप निदेशक रजनीश सिंह बताते हैं कि यहां भी यही किया जा रहा है।
“पहले हम ईको डेवलपमेंट कमेटियों को 50% सब्सिडी पर सोलर फेंस देते थे। समिति से 7,500 रुपये लेते थे और उतनी ही राशि अपने फंड से देते थे। फिर बैंक का सहयोग मिला और अब हम सिर्फ 1,000 रुपये में सोलर फेंस देते हैं। यह राशि सीधे समिति के खाते में जमा होती है।”
सिंह के मुताबिक, अब तक 1,500 से अधिक किसानों को सोलर फेंस दिए जा चुके हैं, जिससे लगभग 300–400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र कवर हुआ है।

हालांकि वन विभाग इसे समाधान मानता है, टेकाम का अनुभव इसकी सीमाएं दिखाता है। उन्हें दो साल पहले सोलर फेंस मिला था। मूंग की फसल नष्ट होने के बाद उन्होंने बाड़ लगाई। वो कहते हैं “जंगली भैंसे (Bubalus arnee) बाड़ तोड़ देते हैं। बड़े जानवरों के लिए यह कारगर नहीं है”।
पिंगले बताते हैं, हर मशीन की तरह इसे भी रखरखाव चाहिए। “जब बाड़ के नीचे खरपतवार उग आती है तो शॉर्ट सर्किट हो जाता है और सिस्टम बंद हो जाता है”।
सोलर फेंस से जुड़े दो नीतिगत मुद्दे हैं। पहला, अगर किसी किसान को सोलर फेंस मिल चुका है और फिर भी जंगली जानवर फसल नुकसान करते हैं, तो उसे मुआवज़ा नहीं मिलता। दूसरा, कई बार किसानों को सोलर फेंस तब मिलता है जब खरीफ का मौसम खत्म हो चुका होता है। सोलर फेंस मिलने में देरी भी किसानों के लिए इसे कम आकर्षक बनाती है।
बातचीत से पता चलता है कि छोटे जंगली जानवरों से निपटने में किसान बाड़ को समाधान मानते हैं, लेकिन मानसून में शॉर्ट सर्किट और बार-बार वायरिंग की ज़रूरत जैसी चुनौतियां हैं। फीडबैक के आधार पर इन कमियों को दूर किया जा सकता है।

क्या सोलर डिटरेंट लाइट विकल्प हो सकती है?
पिंगले एक और सीमा बताते हैं—सोलर फेंस जंगली जानवरों की आवाजाही रोकती है। समाधान के तौर पर उनकी संस्था ने महाराष्ट्र में पेंच और ताडोबा-अंधारी टाइगर रिज़र्व में 450 किसानों को 500 सोलर डिटरेंट लाइट्स वितरित कीं।
यह चार LED लाइट्स वाला चौकोर-शंकु आकार का उपकरण है। एक छोटा सोलर पैनल ऊर्जा बनाता है जिसे लिथियम-आयन बैटरी में संग्रहित किया जाता है। ‘कटिधान’ कंपनी द्वारा विकसित इस डिवाइस का नाम ‘पराब्रक्ष’ है—कन्नड़ शब्द, जिसका अर्थ है “जंगली जानवरों से सुरक्षा।”
इसे खंभे पर बांधा जाता है। चालू होने पर यह 250 मीटर तक रैंडम पैटर्न में रोशनी चमकाता है, जिससे जानवरों को मानव मौजूदगी का आभास होता है। एक लाइट एक हेक्टेयर तक प्रभावी होती है। कंपनी का दावा है कि यह लोमड़ी, भेड़िया, नीलगाय, जंगली सूअर, बड़े बिल्लीनुमा जानवरों और हाथियों तक से बचाव कर सकती है।
अदिति पाटिल पिछले 10 साल से वन्यजीव संरक्षण में काम कर रही हैं। 2024 में उन्होंने ‘कंज़र्वेशन इंडिका’ नामक कंपनी शुरू की। उन्होंने गुजरात के सुरेंद्रनगर में चरवाहा समुदायों और तेंदुओं के बीच संघर्ष कम करने के लिए पराब्रक्ष का इस्तेमाल किया। उनके अनुभव मिले-जुले रहे।

स्थानीय अर्ध-घुमंतू समुदाय कांटेदार शाखाओं से गोल घेराबंदी (‘वागड़ा’) बनाते हैं। उन्होंने ऐसे दो वागड़ों के आसपास चार पराब्रक्ष लगाए जहां दो नर तेंदुए आते थे। एक जगह तेंदुए की आवाजाही कम हुई, लेकिन दूसरी जगह उसने शिकार जारी रखा।
अदिति के अनुसार, “जहां दीपु (तेंदुआ) ने शिकार किया, वहां पहले से स्ट्रीट लाइट थी। संभव है कि वह रोशनी का आदी हो गया हो, इसलिए यह डिवाइस काम नहीं आई।”
पिंगले ने यह मुद्दा पहले ही पहचाना था—लाइट की जगह नियमित रूप से बदलनी चाहिए। अदिति का कहना है कि बड़े बिल्ली प्रजाति के जानवर तेज़ दिमाग वाले होते हैं; सिर्फ रोशनी से काम नहीं चलेगा। शायद आवाज़ और मूवमेंट जोड़ने से कुछ असर हो।
मानव–वन्यजीव संघर्ष के कई कारण हैं, जिनमें खेतों का जंगलों से सटा होना प्रमुख है। सोलर फेंस, सोलर पंप और सोलर डिटरेंट लाइट्स इस संघर्ष को कम करने में मदद कर रहे हैं, लेकिन सभी समाधानों की सीमाएं हैं। जानवर भी समय के साथ इनके आदी हो जाते हैं, इसलिए तकनीक को लगातार उन्नत करना होगा। साथ ही, अधिक लोगों को अपनाने के लिए सरकार को सब्सिडी के जरिए इन्हें सस्ता बनाना चाहिए।
साथ ही वन्यजीव क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप कम होना चाहिए। हमारी अगली रिपोर्ट में हम बताएंगे कि कैसे वन विभाग वन गश्त और संरक्षण में सौर ऊर्जा का उपयोग कर रहा है।
यह रिपोर्ट इंटरन्यूज़ के अर्थ जर्नलिज़्म नेटवर्क के सहयोग से तैयार की गई है।
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