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भोपाल गैस त्रासदी: पीड़ितों के बदहाल जीवन के बीच स्मारक की घोषणा

bhopal gas tragedy women

भोपाल गैस त्रासदी के लगभग 42 साल गुजरने के बाद मध्य प्रदेश सरकार घटनास्थल पर स्मारक बनवाने वाली है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 17 जनवरी को आरिफ नगर स्थित यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री का दौरा किया और घोषणा करते हुए कहा कि त्रासदी में दिवंगत व्यक्तियों के लिए स्मारक का निर्माण किया जाएगा। उन्होंने कहा कि फैक्ट्री में पड़े रासायनिक कचरे के समुचित निष्पादन के बाद भोपाल मेट्रोपोलिटन एरिया के निर्माण के साथ इस परिसर के समुचित विकास के लिए भी जरूरी प्रबंध किए जाएंगे। 

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस स्मारक को जापान के हिरोशिमा और नागासाकी में बनाए गए स्मारक की तरह विकसित किया जाएगा। अनुमान है कि लगभग 1200 करोड़ रूपए की लागत से पूरे 90 एकड़ के कैंपस को विकसित किया जाएगा। इसके लिए अलग से एक एक्शन प्लान बनाया जाएगा।

वहीं पीड़ितों के साथ काम करने वाले कार्यकर्ता कहते हैं कि सरकार ने अब तक फैक्ट्री के अंदर और आस-पास के क्षेत्रों में भूजल और मिट्टी में मौजूद हानिकारक पदार्थों का विधिवत वैज्ञानिक अध्ययन नहीं करवाया है। उनकी मांग है कि इस अध्ययन को प्राथमिकता से करवाने के बाद ही स्मारक निर्माण कार्य शुरू हो। वहीं पीड़ित इलाज और पेंशन जैसी सुविधाओं के आभाव की शिकायत करते हुए सरकार से इन मुद्दों को प्राथमिकता देने की बात करते हैं। 

Mohan Yadav in union carbide
यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री का दौरा करते हुए मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव। फ़ोटो: जनसंपर्क विभाग, मप्र

मौजूदा प्रदूषण का सवाल   

राज्य सरकार ने बीते साल 1 जनवरी की रात को भोपाल की यूनियन कार्बाइड में मौजूद 377 टन कचरा इंदौर के पास स्थित पीथमपुर निपटारे के लिए लाया था। इसका स्थानीय स्तर पर विरोध भी हुआ मगर आखिरकार इस कचरे का निपटारा कर दिया गया। भोपाल गैस पीड़ितों के साथ काम कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता रचना ढींगरा कहती हैं कि सरकार ने यह निपटारा गलत तरीके से किया है। स्मारक बनाने की घोषणा के बाद वह इस बारे में ज्यादा चिंतित हैं कि क्या स्मारक निर्माण प्रक्रिया शुरू होने से पहले सरकार यूनियन कार्बाइड के आस-पास स्थित कॉलोनियों के कथित दूषित भूजल और मिट्टी का वैज्ञानिक अध्ययन करवाएगी? 

दरअसल यूनियन कार्बाइड के आस-पास स्थित लगभग 42 कॉलोनियों में लोग दूषित पानी होने की शिकायत करते रहे हैं। 2010 में राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (NEERI) यानि नीरी ने अपने एक अध्ययन में पाया कि प्रभावित क्षेत्र की मिट्टी में 2 मीटर की गहराई तक पारा सहित बेंजीन हेक्साक्लोराइड (BHC), एल्डीकार्ब, कार्बारिल और α-नैफ्थोल मौजूद हैं। हालांकि इस अध्ययन में फैक्ट्री में मौजूद कचरे के कारण भूजल प्रदूषित होने की बात अस्वीकार कर दी गई थी। 

धींगरा कहती हैं, “यह बहुत ही घटिया रिपोर्ट है। इसे हमारे देश के 41 एक्सपर्ट्स ने यह कहते हुए रिजेक्ट कर दिया था कि यह पूरी साइंटिफिक जांच नहीं है।”

bhopal gas tragedy children
1984 की त्रासदी का दंश अब भी नई पीढ़ी भुगत रही है। फ़ोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

2023 में प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट में एक बार फिर न सिर्फ भूजल प्रदूषित होने की बात कही गई बल्कि इसके अन्य क्षेत्रों में फैलने का दावा भी किया गया। NGT ने इस पर स्वतः संज्ञान लेते हुए भूजल के जांच के आदेश दिए। इस जांच में नाइट्रेट, फास्फेट के अलावा आयरन और मैगनीज जैसे हैवी मेटल की उपस्थिति पाई गई। 

गैस पीड़ितों और उनके लिए कार्य कर रहे कार्यकर्ताओं का कहना है कि 2010 से 2025 तक एक लंबा समय बीत चुका है। इस बीच लगभग 14 साल तक कचरा फैक्ट्री में ही पड़ा रहा। ऐसे में यह ज़रूरी है कि एक बार फिर मिट्टी और भूजल की जांच करवाई जाए। वह कहते हैं कि अगर इसके बिना इस स्मारक का निर्माण किया जाएगा तो दूषित भूजल का सेवन करने से लोग प्रभावित होते रहेंगे और यह कभी स्थापित नहीं हो सकेगा कि फैक्ट्री के कारण ही ऐसा हुआ है। 

घोषणा, फंड और बदहाली

गैस पीड़ित राशिदा बी (65) अस्पतालों में अच्छा इलाज न मिलने की बात कहती हैं. गैस पीड़ितों के लिए ख़ास तौर पर 6 अस्पतालों में इलाज की सुविधा दी जाती है। 2 अगस्त 2023 को लिखे एक पत्र में इंदिरा गांधी महिला एवं बाल्य चिकित्सालय के अधीक्षक ने स्वीकार किया कि 99.07 लाख की लागत से बनाए गए ‘मॉडुलर ऑपरेशन थियेटर’ में सीपेज का गंदा पानी एकत्रित होने, नए एसी बंद होने और सीलिंग की छत टूट कर गिरने के कारण इसका संचालन बंद कर दिया गया था। 

5 फ़रवरी 2025 को भोपाल गैस त्रासदी, राहत एवं पुनर्वास विभाग ने अपने एक पत्र में बताया कि पीड़ितों के लिए 2010 में केंद्र सरकार द्वारा न्यू एक्शन प्लान के तहत कुल 272.75 करोड़ रूपए स्वीकृत किए गए थे। इसमें से 33.55 करोड़ रूपए ख़ास तौर पर चिकित्सा पुनर्वास के लिए खर्च होने थे। मगर मध्य प्रदेश सरकार केवल 9.81 करोड़ रूपए ही खर्च कर सकी है। सरकार ने इंदिरा गांधी अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर सहित अन्य अस्पतालों की मरम्मत के लिए 23.74 करोड़ रूपए की स्वीकृती का प्रस्ताव भी भेजा था। इस पत्र के अवलोकन से यह भी पता चलता है कि वर्ष 2020-21 में इन्हीं कार्यों के लिए 2.05 करोड़ रूपए खर्च किए गए थे। 

सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को बेहतर चिकित्सा सुविधा देने का आदेश दिया था। इसका पालन न करने के चलते सितंबर 2025 को कोर्ट ने भारत सरकार और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया था। राशिदा कहती हैं कि इन ‘कागज़ों’ का कोई भी असर नहीं हुआ है और हालात अब भी लचर हैं।  

गैस पीड़ित अस्पतालों की बदहाली और इलाज की अनुपलब्धता की शिकायत करते हैं। फ़ोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

पेंशन के लिए भटकते बच्चे और महिलाएं

भोपाल गैस पीड़ित निराश्रित पेंशनभोगी संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष बालकृष्ण नामदेव आरोप लगाते हैं कि पीड़ितों के सामाजिक न्याय के लिए सरकार कुछ भी नहीं कर रही है। 2010 में गैस पीड़ित विधवाओं के लिए 1000 रूपए प्रति माह की पेंशन राशि स्वीकृत की गई थी। फ़रवरी 2025 को जारी के दस्तावेज के अनुसार ऐसी 5000 विधवा महिलाएं पेंशन पाने योग्य पाई गईं। मगर इनमें से 4378 महिलाओं को ही पेंशन मिल रही है। यह महिलाएं भी शिकायत करती हैं कि उन्हें नियमित पेंशन नहीं मिलती।

कुछ ऐसी ही हालत 1984 के बाद पीड़ितों के घरों में पैदा होने वाले बच्चों का भी है। उनके लिए 600 रूपए प्रतिमाह की राशि दिए जाने का प्रावधान है मगर कई पीड़ितों को इसका लाभ नहीं मिल रहा। राशिदा कहती हैं कि सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर इन बच्चों की विकलांगता का सर्टिफिकेट बनाने में आना-कानी करते हैं। जबकि केवल इन्हीं अस्पतालों के सर्टिफिकेट ही इस सहयोग राशि का लाभ लेने में मदद कर सकते हैं।

भोपाल गैस पीड़ित लोगों का मानना है कि सरकार को पहले भूजल और मिट्टी के दूषित होने की जांच और अन्य सुविधाओं को बेहतर करना चाहिए। इनमें स्मारक को लेकर कुछ ख़ास उत्साह नज़र नहीं आता। वह मानते हैं कि इससे उनकी मूल समस्याओं का हल नहीं हो सकेगा। 

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  • Shishir identifies himself as a young enthusiast passionate about telling tales of unheard. He covers the rural landscape with a socio-political angle. He loves reading books, watching theater, and having long conversations.

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