चार माह पहले अभयारण्य का दायरा सिमटा, नहीं बदला इको-सेंसिटिव जोन
सामाजिक कार्यकर्ता अक्षय भंडारी ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से RTI के जरिए खरमोर अभयारण्य के इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) के बारे में जानकारी मांगी थी। उन्हें शायद यह उम्मीद नहीं थी कि जवाब इतना चौंकाने वाला होगा। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा, “हमारे पास नए खरमोर अभयारण्य की कोई जानकारी नहीं है।” यह जवाब सिर्फ एक प्रशासनिक खानापूर्ति नहीं है, बल्कि एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—क्या मध्य प्रदेश सरकार जानबूझकर ESZ की अधिसूचना रोके हुए है?
मध्य प्रदेश के धार जिले के सरदारपुर में स्थित खरमोर अभयारण्य पिछले चार दशकों से एक जटिल उलझन बना हुआ है। 1983 में जब इस अभयारण्य को 348.12 वर्ग किलोमीटर में अधिसूचित किया गया था, तब शायद किसी ने यह नहीं सोचा था कि यह कभी राजनीतिक और पर्यावरणीय विवादों का केंद्र बन जाएगा।
अभयारण्य सिकुड़ा, लेकिन नहीं बदला ESZ
3 जुलाई 2025 को राज्य सरकार ने एक गजट नोटिफिकेशन जारी कर अभयारण्य के क्षेत्रफल को घटाकर महज 132.8344 वर्ग किलोमीटर कर दिया। यानी 216 वर्ग किलोमीटर से अधिक भूमि अभयारण्य से बाहर हो गई। सरदारपुर और पेटलावद के 14 गांवों (गुमानपुरा, बिमरोड, छडावद, धुलेट, पिपरनी, सेमलिया, केरिया, करनावद, सियावद, अमोदिया, सोनगढ़, महापुरा, टिमायची और भानगढ़) के किसानों में खुशी की लहर दौड़ गई। स्थानीय किसानों को 42 साल बाद अपनी जमीन का मालिकाना हक मिला।
लेकिन यह खुशी एक गहरी चिंता भी साथ लाई। केंद्र सरकार द्वारा 28 अगस्त 2020 को जारी की गई ESZ अधिसूचना (S.O. 2935(E)) अब भी पुराने 348.12 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर आधारित है। इस अधिसूचना के तहत अभयारण्य की सीमा से 0.250 किलोमीटर तक का क्षेत्र इको-सेंसिटिव जोन घोषित है, जिसका कुल क्षेत्रफल 16.97 वर्ग किलोमीटर है।
अक्षय भंडारी सवाल करते हैं,
“अब जबकि अभयारण्य का ही क्षेत्रफल बदल गया है तो ESZ की सीमाएं भी स्वतः बदल जानी चाहिए। लेकिन राज्य सरकार ने अब तक ESZ में संशोधन के लिए प्रस्ताव केंद्र को नहीं भेजा है।”
क्यों अटका ESZ का प्रस्ताव?

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने अपने जवाब में साफ किया, “ESZ की अधिसूचना राज्य सरकार से प्राप्त प्रस्तावों पर आधारित होती है।” हालांकि मंत्रालय ने भंडारी की सभी आपत्तियों और सुझावों को आगे की कार्रवाई के लिए मध्य प्रदेश सरकार को भेज दिया।
पर्यावरणविदों और स्थानीय कार्यकर्ताओं का आरोप है कि यह देरी जानबूझकर की जा रही है। भंडारी का तर्क है,
“अगर नई ESZ अधिसूचना जारी हो जाती है, तो इंदौर-दाहोद रेल लाइन परियोजना जैसी बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी की जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा।”
प्रस्तावित इंदौर-दाहोद रेल लाइन परियोजना इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह परियोजना अभयारण्य की सीमा से महज एक किलोमीटर की दूरी से गुजरने वाली है। भंडारी ने इस नए रूट पर आपत्ति जताते हुए पुराने सर्वेक्षण मार्ग को अपनाने का सुझाव दिया था, जो अभयारण्य से सुरक्षित दूरी पर है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने 4 अगस्त 2024 को पश्चिम मध्य रेलवे को आदेश दिया था कि वह इस परियोजना का गहन पर्यावरणीय मूल्यांकन करे, लेकिन अब तक कोई रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है।
ESZ क्यों महत्वपूर्ण?
इको-सेंसिटिव जोन किसी भी संरक्षित क्षेत्र के आसपास का वह बफर जोन होता है, जहां खनन, प्रदूषणकारी उद्योग और बड़े निर्माण कार्यों पर सख्त प्रतिबंध होता है। अगर ESZ लागू है तो किसी भी नई परियोजना के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड से मंजूरी लेना अनिवार्य है। अगर ESZ की स्थिति अस्पष्ट है या पुराने नक्शे पर आधारित है, तो परियोजनाओं को हरी झंडी मिलना आसान हो जाता है।
ग्राम अमोदिया में पहले ही बिना उचित पर्यावरणीय और वन स्वीकृति के एक पावर ग्रिड की स्थापना की गई थी। यह पावर ग्रिड अभयारण्य से महज 7 किलोमीटर की दूरी पर है। इससे निकलने वाली ट्रांसमिशन लाइनों ने न केवल किसानों की जमीन को प्रभावित किया है, बल्कि लुप्तप्राय खरमोर पक्षियों के लिए भी खतरा पैदा किया है।
जब तक मध्य प्रदेश सरकार संशोधित अभयारण्य क्षेत्र के अनुसार संशोधित ESZ का प्रस्ताव केंद्र नहीं भेजती, तब तक 2020 की पुरानी अधिसूचना ही मान्य रहेगी। एक तरफ किसान अपनी जमीन के मालिकाना हक से खुश हैं, दूसरी तरफ पर्यावरणविद चिंतित हैं कि कहीं विकास की आंधी में खरमोर जैसी दुर्लभ प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में न पड़ जाए।
सवाल यह है कि क्या सरकार पारदर्शिता के साथ इस मुद्दे को सुलझाएगी या फिर फाइलों की भूलभुलैया में यह मामला और उलझता चला जाएगा? यह तो समय के साथ ही स्पष्ट होगा।
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